शम्मी कपूर

1 min


सच्चे प्रेमी और महान अभिनेता थे शम्मी कपूर

1950-60 के दशक में सदाबहार अभिनेता थे। जो इंडियन सिनेमा में अपनी विशिष्ट याहू शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे हिंदी फ़िल्मों के पहले सिंगिंग-डांसिग स्टार शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को मुंबई में हुआ था।शम्मी का वास्तविक नाम शमशेर राज कपूर था वह महान फ़िल्म अभिनेता और थिएटर कलाकार पृथ्वीराज कपूर और रामसरनी ‘रमा’ मेहरा के दूसरे पुत्र थे। पृथ्वीराज कपूर के दो और बेटे शशि कपूर और राजकपूर थे।शम्मी कपूर की जिंदगी में दो ‍पत्नियां आईं। गीता बाली और नीला देवी।

शम्मी अपनी पत्नी गीता को बेहद चाहते थे। शादी के बाद बेटा आदित्य राज कपूर और बेटी कंचन का जन्म हुआ 1965 में चेचक की वजह से गीता बाली की मृत्यु हो गई जिसका शम्मी को गहरा झटका लगा। उन्होंने अपने आप पर ध्यान देना छोड़ दिया। वजन बहुत बढ़ गया और इससे बतौर हीरो उनका करियर भी प्रभावित हुआ।शम्मी के बच्चे छोटे थे, इसलिए घर वालों ने दूसरी शादी का दबाव बनाया। शम्मी बमुश्किल राजी हुए। गीता की मृत्यु के चार वर्ष बाद 1969 में उन्होंने भावनगर की रॉयल फैमिली की नीला देवी से शादी की लेकिन शाद्दी से  पहले शम्मी ने गीता के सामने शर्त रखी कि वे मां नहीं बनेंगी। उन्हें गीता के बच्चों को ही पालना होगा। नीला देवी मान गई। वे ताउम्र अपने बच्चों की मां नहीं बनी और गीता के बच्चों को ही अपना माना। बाद में शम्मी के बेटे आदित्य राज कपूर ने भी फिल्म इंडस्ट्री में आने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। बेटी कंचन की शादी मनमोहन देसाई के बेटे केतन देसाई से हुई।

शम्मी कपूर ने वर्ष 1953 में फ़िल्म ‘ज्योति जीवन’ से अपनी अभिनय पारी की शुरुआत की। वर्ष 1957 में नासिर हुसैन की फ़िल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ में जहां अभिनेत्री अमिता के साथ काम किया वहीं वर्ष 1959 में आई फ़िल्म ‘दिल दे के देखो’ में आशा पारेख के साथ नजर आए। बॉलीवुड के लिहाज़ से हालांकि वह बहुत सुंदर अभिनेता तो नहीं थे बावजूद इसके शम्मी कपूर अपने अभिनय क्षमता के बल पर सबके चहेते बने। वर्ष 1961 में आई फ़िल्म (जंगली) ने शम्मी कपूर को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। इस फ़िल्म के बाद ही वह सभी प्रकार की फ़िल्मों में एक नृत्य कलाकार के रूप में अपनी छवि बनाने में कामयाब रहे। ‘जंगली’ फ़िल्म का गीत ‘याहू’ दर्शकों को खूब पसंद आया। उन्होंने चार फ़िल्मों में आशा पारेख के साथ काम किया जिसमें सबसे सफल फ़िल्म वर्ष 1966 में बनी ‘तीसरी आंख’ रही। वर्ष 1960 के दशक के मध्य तक शम्मी कपूर ‘प्रोफेसर’, ‘चार दिल चार राहें’, ‘रात के राही’, ‘चाइना टाउन’, ‘दिल तेरा दीवाना’, ‘कश्मीर की कली’ और ‘ब्लफमास्टर’ जैसी सफल फ़िल्मों में दिखाई दिए। फ़िल्म ‘ब्रह्मचारी’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला इसके अलाव सन 1968 में फ़िल्म ‘ब्रह्मचारी’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था। चरित्र अभिनेता के रूप में शम्मी कपूर को 1982 में ‘विधाता’ फ़िल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला,1995 में फ़िल्म फेयर लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला,1999 में ज़ी सिने लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किये गये, 2001 में स्टार स्क्रीन लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजे गये।

 शम्मी कपूर ने अपनी फ़िल्मों में बग़ावती तेवर और रॉकस्टार वाली छवि से उस दौर के नायकों को कई बंधनों से आज़ाद कर दिया था। हिंदी सिनेमा को ये उनकी बड़ी देन थ। ये बात और है कि उनके जैसे किरदार दूसरा कोई नहीं निभा पाया। शम्मी कपूर बड़े शौकीन मिज़ाज थे। इंटरनेट की दुनिया में आगे रहते थे, तरह-तरह की गाड़ियाँ चलाने का शौक़ वे रखते थे, शाम को गोल्फ़ खेलना, समय के साथ चलना वे बख़ूबी जानते थे। फ़िल्मों में शम्मी कपूर जितने ज़िंदादिल किरदार निभाया करते थे, उतनी ही ज़िंदादिली उनके निजी जीवन में दिखती थी।इस महान कलाकार और हिंदी सिनेमा को नया डोर देने वाले अभिनेता ने 14 अगस्त, 2011 को मुंबई के ब्रीज कैंडी अस्पताल में सुबह 5:41 बजे अंतिम सांस ली।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये