उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मर्दों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर बिताई – असल योद्धा शौकत कैफ़ी 

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अली पीटर जॉन

शौकत कैफी की 22 नवंबर को 91 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गई । वो लंबे समय से बीमार चल रही थी। शौकत प्रतिष्ठित कवि कैफी आज़मी की पत्नी,शबाना आजमी और बाबा आजमी की मां, जावेद अख्तर और तनवी आज़मी की सास,फरहान अख्तर और जोया अख्तर की नानी और तब्बू की दादी थी. मेरी शौकत कैफ़ी और अब्बास साहब से काफी अच्छे रिश्ते थे। वो अब्बास साहब को भाईजान कह कर बुलाती थी और मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे अब्बास साहब, कैफी आजमी और शौकत कैफ़ी के लिए काम करने का मौका मिला जहां मैं इन लोगों के घर किताबें और आर्टिकल्स पहुंचाया करता था।

इन्हीं कामों के चक्कर में मुझे इतने महान लोगों से मिलने का मौका मिला। मेरी मुलाकात कैफी आजमी से हुई और तब मैं इस जोड़े के बारे में और अच्छे तरीके से जान पाया। कैफी से मिलने की वजह से मुझे भारत में लेफ़्टिस्ट मूवमेंट के बारे में भी काफी कुछ पता चला। मुझे यह समझ में आया कि थिएटर और साहित्य का  लेफ़्टिस्ट मूवमेंट में क्या योगदान है। मुझे इस जोड़े के के साथ उनके जानकी कुटीर के छोटे से घर में समय बिताने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस घर का समुद्र की तरफ रुख था। इस घर में कोई महंगे  नहीं बल्कि जीवन जीने के लिए जरूरतों के  सामान थे और साथ-साथ अच्छी कविताएं और अच्छा माहौल था ।  इसी घर में  मैं पहली बार उस कॉलेज गर्ल से मिला था जो ‘फासला’ फिल्म से बॉलीवुड में डेब्यू करने वाली थी। यह फिल्म अब्बास साहब इसलिए बना रहे थे क्योंकि उन्होंने 12 साल की शबाना को यह वादा किया था कि वो उन्हें अभिनेत्री के तौर पर बॉलीवुड में लॉन्च करेंगे।

शौकत कैफ़ी 

शौकत और कैफी की कहानी एक काल्पनिक कहानी जैसी है। शौकत एक युवा लड़की थी जो  कैफी आज़मी द्वारा लिखी गई गई रोमांटिक और क्रांतिकारी कविताओं के प्यार में पड़ गई थी। कविताओं  के प्रति उनका प्यार इतना बढ़ता चला गया कि वो इन कविताओं के कवि के ही प्यार में पड़ गई और नतीजतन दोनों की शादी हो गई। शौकत ये जानती थी कि लेफ़्टिस्ट और क्रांतिकारी विचार के कवि से से से से शादी करना आसान नहीं होगा पर फिर भी उन्होंने शादी की। यह नवविवाहित जोड़ी जोड़ी सेंट्रल बॉम्बे के मदनपुरा के छोटे से रूम में रहा करती थी। यह जगह हाउसिंग सोसाइटी की तरह थी जहां पर कम्युनिस्ट विचारधारा के लेखक, कवि, अभिनेता और यहां तक कि कि नेता तक रहते थे। यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि ऐसी स्थिति में जहां सिर्फ एक शौचालय और एक नल हो वहां इस जोड़े ने कैसे गुजारा किया होगा।

कैफी के अंदर जो कवि थे उन्होंने शौकत को इंस्पायर किया कि वो समाज और देश के बदलाव के लिए अपने नाटकों के द्वारा कुछ संदेश दे पाएं। उन्होंने अपने नाटकों में बहुत ही महत्वपूर्ण और मजबूत किरदार निभाया हैं। कैफी ने शौकत के लिए एक कविता लिखी थी ‘उठ मेरी जान’ वो कविता ना सिर्फ शौकत को बल्कि सभी औरतों को जगाने की कविता थी कि वो सिर्फ घर पर सजावट के लिए नहीं है बल्कि उन्हें घर से निकलना चाहिए, मर्दों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर चलना चाहिए अगर उन्हें अपना लक्ष्य पाना है तो। इस कविता ने शौकत की जिंदगी बदल दी और शौकत ने जिंदगी बदल दी और शौकत ने शौकत की जिंदगी बदल दी और शौकत ने और शौकत ने कई और औरतों की जिंदगी बदल दी। शौकत ने सभी महिलाओं को यह संदेश दिया कि उन्हें उन मर्दों के चंगुल से निकलना है जो उन्हें उनकी इज्जत नहीं दे सकते जिसकी वो योग्य हैं। वह एक कविता आज भी औरतों के हक और लड़ाई के लिए एंथम (गान) माना जाता है।

शौकत कैफ़ी 

शौकत ने अभिनय को करियर चुना और और पृथ्वीराज कपूर और आईपीटीए के नाटकों में मुख्य और  मजबूत किरदार निभाया। शौकत  वो अभिनेत्री थी जिन्होंने ‘गर्म हवा’, ‘उमराव जान’ सहित  अपनी कई और फिल्मों के द्वारा समाज बदलाव लाया। इन फिल्मों में उन्होंने एक मजबूत महिला का किरदार निभाया था। जब शबाना को लगा कि उन्हें एक ही तरह के किरदार करने को मिल रहे हैं तो उन्होंने उन्होंने यहां से कदम पीछे कर लिया और अपने पति और अपनी बेटी पर ध्यान केंद्रित कर लिया। शबाना आज जो कुछ भी हैं वो अपनी मां के मजबूत  मार्गदर्शन की वजह से हैं। शबाना के पिता एक महान लेखक थे पर फिर भी उन्होंने अभिनय को अपना करियर चुना यह उनकी मां के बदौलत ही हैं।

ये 2000 की बात है, जब उनमें उम्र से जुड़ी  बीमारियों के पहले लक्षण दिखने लग गए थे। मैं उनसे  जानकी कुटीर में डॉ आर.के.अग्रवाल की क्लीनिक में  नियमित रूप से मिलता था जहां वो बड़े ही सभ्य तरीके के परिधान में आया करती थी जो उनके उम्र के साथ काफी जंचता था।

शौकत कैफ़ी 

कुछ बहुत अच्छा तब हुआ, जब उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी ‘कैफी और मैं’ यह बेस्टसेलर किताबों में से एक रही है, जिसका जावेद अख्तर ने बाद में नाट्य  रूपांतरन भी किया था। इसमें शबाना ने अपनी मां का और जावेद अख्तर ने कैफी का किरदार निभाया था। ‘कैफी और मैं’ नाटक को मेरे दोस्त रमेश तलवार ने निर्देशित किया था और यह नाटक भारतीय थियेटर की दुनिया में ब्लॉकबस्टर की दुनिया में ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। दुनिया के प्रमुख देशों में इसका मंचन भी किया गया था। इस नाटक के प्रस्तुतियों के दौरान ही शौकत को अंतिम बार  स्वस्थ और अपने सुसज्जित वेशभूषा,में देखा गया था।

उसके बाद वो काफी बीमार पड़ गई थी। पिछले 5 सालों से वह बिस्तर पर ही थी। शौकत कैफ़ी ने मौत से काफी लड़ाइयां लड़ी पर वो  कहते हैं न कि इंसान छोटा या बड़ा, मौत के सामने सब हार मान जाते हैं। अगर जीवन है तो मृत्यु भी अटल है. उन्होंने 22 नवंबर को शाम 5:00 बजे अंतिम सांस ली और अपने पति की तरह उन्होंने यह पहले ही कह दिया था कि उनकी  मृत्यु के बाद कोई रस्मो रिवाज ना किए जाएं और उनको वहीं पर दफनाया जाए जहां पर आम लोगों को दफनाया जाता है.  कैफी साहब को भी सांताक्रुज के एक  बहुत ही साधारण से कब्रिस्तान में दफनाया गया था और शौकत को भी उसी कब्रिस्तान में दफनाया गया है। पर मुझे यह नहीं पता कि दोनों के कब्र आसपास है या नहीं क्योंकि है या नहीं क्योंकि कब्रिस्तानों में जगह की बहुत कमी होती है।’

शौकत कैफ़ी 

मेरे दूसरे गुरु देव आनंद मुझसे हमेशा पूछते थे कि मौत के बाद भी एक और जिंदगी क्यों नहीं मिलती और मैं यह सोच लगता था कि सारे  लेफ़्टिस्ट्स जिन्हें अलग-अलग कब्रिस्तान में दफनाया गया है, उनको दूसरी जिंदगी क्यों नहीं मिल सकती जहां वो मरने के बाद भी समानता, भाईचारा और  स्वतंत्रता के लिए अपनी लड़ाई जारी रख सकें।

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