संगीतकार शाम जी घनश्याम जी

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051-13 shyamji ghanshyamji

मायापुरी अंक 51,1975

उभरते हुए संगीतकार श्याजी घनश्यामजी से मैं उनके म्यूजिक रूम में मिला। कमरे में चारों ओर इंग्लिश पॉप सिंगर्स की तस्वीरें लगी हुई थीं। और आम संगीतकारों की तरह वहां चमचों और साजिदों को भीड़ नहीं थी। मैंने पहला प्रश्न उनसे किया।

आप आदमी तो एक हैं मगर नाम डबल रखा हुआ है इसका क्या कारण है?

यह इस फिल्म नगरी की देन है। मैं इस लाइन में अकेला ही आया था और आज भी अकेला ही हूं। लेकिन भाग्य इस डबल नाम से ही हूं। लेकिन भाग्य इस डबल नाम से ही चमका है। यह नाम मुझे निर्माता-निर्देशक बी.के आदर्श ने दिया है। और इस नाम ने अपना असर भी दिखाया है। श्याजी ने बताया।

आपका यह सफर कहां से और कब से शुरू हुआ? मैंने उनके करियर से संबधित विस्तार में जानने के लिए पूछा।

मैं चार साल की आयु से गा रहा हूं। मुझे स्कूल में सर्वश्रेष्ठ गायक के पुरस्कार भी मिले हैं। आज से कोई 8 साल पहले मैं गायक बनने मुंबई आया था। और संगीतकार एस.डी बर्मन से मिलकर अपनी इच्छा प्रगट की थी। उन्होंने मुझसे गाना सुनाने की फरमाइश की। मैंने गाने सुना दिये। वे गानों से प्रभावित हुए। पूछने लगे इनकी कम्पोजिशन किसने की है? मैंने उन्हें जब यह बताया कि ये मेरी ही कम्पोज़ की हुई है तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। तब मुझे लगा कि मैं संगीतकार बन सकता हूं। और उसके बाद मैंने इस मैदान में संघर्ष शुरू कर दिया। 1962 में मुझे ‘हमें गले लगालो’ में संगीत देने का अवसर मिल गया। मैंने उसके लिए दो गीत भी रिकॉर्ड किये। लेकिन वह फिल्म बंद हो गई। उस समय उन गानों के लिए लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने मेन्डोलिन और वायलन बजाया था। संगीतकार लाला सत्तार ने रिदम और सुमनराज ने फ्लूट बजाई थी। तब मेरा नाम केवल श्याम था। तब मेरा करियर शुरू होते हुए भी खत्म हो गया। मैं थक हार कर दिल्ली वापस चला गया। 1968 में मैं फिर वापस आया और फिर वापस चला गया। 1970 में बी. के. आदर्श और निर्माता स्वर्णसिंह से लेखक चरणदास शोख की मार्फत मुलाकात हुई। सरदार जी ने अपनी आगामी फिल्म ‘ठोकर’ में मुझे संगीत देने के लिए अनुबंधित कर लिया। इस प्रकार मैं संगीतकार बनने में सफल हो गया।

आपकी फिल्म ‘ठोकर’ में मुझे संगीत देने के लिए अनुबंधित कर लिया। इस प्रकार मैं संगीतकार बनने में सफल हो गया।

आपकी फिल्म ‘ठोकर’ के गाने तो बड़े ही लोकप्रिय हुए थे। क्या आप उस फिल्म के किसी ऐसे गीत के बारे में बतायेंगे जिसकी कम्पोजीशन बड़े कम समय में और गैर मामूली तौर पर हुई हो। जिसे आप न भूल सके हों! मैंने गानो की पृष्ठभूमि जानने के लिए पूछा।

फिल्म ‘ठोकर’ का सुप्रसिद्ध गाना अपनी आंखो में बसाकर कोई इकरार करूं।

जी में आता है कि जो भरके तुझे प्यार करूं की धुन बस एकाएक ही बन गई थी। मैं मुंबई की एक पार्टी में आमांत्रित था कि एकाएक मुझे लगा कि जहन में कोई ट्यून कुलबुला रही है। मैं पार्टी छोड़कर म्यूजिक रूम में आ गया। और जब तक नोटेशन नहीं कर लिया मुझे चैन नहीं आया। यह गीत पार्टी में मौजूद एक हसीना को देखने के बाद उभरा था। उसकी खूबसूरती ने मुझे मोहित कर लिया था। उसी से प्रेरणा लेकर इस गीत की रचना की थी। दरअसल धुन बनाने में कोई खास समय नहीं लगता। मैं किसी भी गाने की धुन 10 से 15 मिनट में बना लेता हूं। मेरा जहन हर पल बस धुन की तलाश में खोया रहता है।

एक दूसरा गाना जो मैंने धुयें की लकीर के लिए खुद गाया है गोरी की मांग में सिंदूर, कहीं दूर बजे शहनाई । यह गाना केवल चार साजिदों के साथ टेक किया था। और उस पर केवल नौ सौ रूपये खर्च आया था। मैं समझता हूं कि इससे सस्ता कोई गाना रिकॉर्ड नहीं हुआ। यह गीत मेरे जीवन में बीती एक घटना का प्रतिबिम्ब है। मेहबूबा की शादी किसी और से हो रही है। और ये सिच्युएशन ऐसी थी कि पुरानी यादें पुरानी चोटें उभर आई। इसीलिए इस गानें में जो दर्द है, वह बड़ा स्वाभाविक है।

एक बात और बता दूं कि 72 से 75 तक मेरी तीन फिल्में रिलीज़ हो गई हैं। लेकिन इन फिल्मों में लता या आशा का कोई गीत नहीं है। इसके अलावा मैंने धुंये की लकीर में नितिन मुकेश, अजीत सिंह, गाल गुलाबी नयन शराबी में प्रीति सागर को ब्रेक दिये हैं इसी प्रकार मैंने इस्टबलिश शायरों की बजाए नये-नये शायरों से गीत लिखवाए हैं। ठोकर में साजन देहलवी, धुये की लकीर में खालिश देहलवी और रामेश्वर त्यागी, डाकू में चमन लाहौरी और अमृता प्रीतम के गीत इसका प्रमाण है। नये लोगों से गीत इसलिए लिखवाता हूं कि मैं ट्यून पर गीत नही लिखवाता बल्कि गीत को धुन बनाता हूं। और ऐसे गीतों में भाव अच्छे होते हैं। और नये नये लोग अपने गीतों में नये-नये भाव और ख्यालत पेश करते हैं। इसीलिए मैं उन्हीं से गीत लिखवाता हूं। श्याजी घनश्यामजी ने बताया।

हमें ऐसे गीतों के बारे में बताइये जिनकी रचना अपने अंदर कोई दिलचस्प कहानी रखती हो। जैसे कि अभी आपने दो गीतों के बारे में बताया है। मैंने कहा।

ऐसे दो गीत फिल्म ‘डाकू’ के लिए रिकॉर्ड हुए हैं। एक नरेन्द्र चंचल की आवाज़ में है।

कभी गम से दिल लगाया, कभी अश्क के सहारे।

कभी शब गुजारी रो के कभी गिन के चांद तारे!!

इस गीत की कहानी यह है कि जमाने में पाकिस्तान की जिप्सी सिंगर ‘रेशमा’ का बड़ा नाम था। उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन डायरेक्टर सतीश भाटिया के पास रेशमा को टेप आई थी। उस दिन मैं उसके गाने सुनकर ऐसा खो गया कि सारा दिन न कुछ खाया न पिया। बस दिमाग में धुनें गूंजती रही। आखिर मैंने अपने एक दोस्त शायर चमन देहलवी को बुलाया। और उससे कहा कि वह कुछ बोल लिखकर दो। और बोल मिलते ही गाना तैयार हो गया।

चौथा गीत भी बड़ा ही ऐेतिहासिक है। वह अमृता प्रीतम ने ‘डाकू’ के लिए लिखा और लता जी ने गाया है। यह वह गीत है कि जिसे गाते गाते लता जी रो पड़ी थी। इससे पूर्व एक बार फिल्म ‘बैजु बावरा’ का एक गीत मोहे भूल गए ‘सांवरया’ गाते हुए रोने लगी थी। दूसरे इस गाने की सिच्युएशन बड़ी करूणा जनक है बिंदू के बच्चा होने वाला है। वह डाकू है। इसलिए जंगलो में बच्चा पैदा होता वह तड़प उठती है। ऐसी ही स्थिति में यह गीत लिखा और कम्पोज़ किया है।

तू आज अपने हाथ से कुछ बिगड़ी संवार दे।

ऐ खुदा मेरे जिस्म से मेरा साया उतार दे।

तू रोशनी का सपना मेरी कोख में क्यों आया।।

मैं बे दरो दीवार हूं तुझे कहा छुपाऊं।

और तू जहां पे खेले वह घर कहां से लाऊं।


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Mayapuri

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