एक सुखद सपने का दुखद अंत शैलेन्द्र

1 min


shailendra

 

मायापुरी अंक 14.1974

सत्ताइस वर्ष पहले की उस रात को राज कपूर बहुत खुश था। उसकी कम्पनी में एक ऐसे गीतकार ने कदम रखा था जिसका राज कपूर दिल से सम्मान करता था गीतकार का पहला गीत उस दिन रिकॉर्ड हुआ था और राज कपूर बहुत खुश था। गीत के बोल थे

बरसात में तुम से मिले हम सजन हमसे मिले तुम बरसात में

क्या सीधी-सादी शब्द रचना थी?

राज कपूर को विश्वास था कि यह नया गीतकार उनकी फिल्मों का एक आधार स्तम्भ बनेगा। राज कपूर का विश्वास कभी झूठा हुआ है भला। यह गीतकार था शैलेन्द्र शैलेन्द्र ने ‘बरसात’ के साथ जो आर.के. स्टूडियो में कदम रखा तो फिर अपनी जिन्दगी के अंतिम सांस तक राज कपूर का साथ निभाया। आखिर शैलेन्द्र में ऐसी क्या विशेष बात थी?

क्यों उसके गीत एक नशा बन कर जनता के दिलो-दिमाग पर छा जाते थे?

शैलेन्द्र का यह गुण था सीधे सरल शब्दों का प्रयोग। वह जनता का गीतकार था और उन्ही की भाषा में गीत लिखता था। यही कारण था कि उसके गीत सीधा जनता की जुबान पर चढ़ जाते थे। दूसरी तरफ शैलेन्द्र के गीत फिल्म को गति प्रदान करते थे, कहानी को आगे बढ़ाते थे। ऐसा नही होता था कि उसके गीत फिल्म में पैबंद की तरह लगते हो। राज कपूर की प्रत्येक फिल्में में शैलेन्द्र का एक गीत अवश्य ही ऐसा होता था जो फिल्म राज कपूर के चरित्र को खोल कर सामने रख देता था। जरा देखिये, क्या ये गीत सुन कर अंदाजा नही लग जाता कि फिल्म का हीरो सीध-सादा मासूम युवक है ! इन गीतों से हीरो की पूरी इमेज दर्शक के दिमाग में बन जाती है

मेरा जूता है जपानी, ये पतलून इंगलिस्तानी सिरपर लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी (फिल्म श्री 420)

सब कुछ सीख हमने, न सीखी होशियारी सच है दुनिया वालों कि हम है अनाड़ी (फिल्म अनाड़ी)

मेरा नाम राजू घराना अनाम बहती है गंगा जहां मेरा धाम (फिल्म जिस देश में गंगा बहती है)

आवारा हू, आवारा हूं या गर्दिश में हू, आसमान का तारा हूं (फिल्म आवारा)

शैलेन्द्र को जनता के मनोविज्ञान की गहरी समझ थी। कब कौन-सी चीज जनता के मर्म पर असर करेगी उन्हें खूब मालूम था। जीवन के आरंभिक वर्षों में ही उन्होनें तमाम दुख झेल लिये थे। कोई मानवीय अनुभूति ऐसी नही थी जो उनसे अछूती बची हो। वे जनता के सुख-दुख समझते थे प्रेमिका का विरह् इस गीत में कैसे झलकता है

आजा रे परदेशी, मैं तो कब से खड़ी इस पार आंखिया थक गई पंथ विहार (फिल्म मधुमती)

और जब प्रेमिका सबकुछ पा जाती है

कांटों से खींच के ये आंचल तोड़ के बंधन बांधी पायल

आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है (फिल्म गाइड) तो उसकी खुशी को व्यक्त करने के लिए इससे अच्छे शब्द कहां मिलेगे ?

निराश प्रेमी के दिल पर कैसी बीतती है, सुनिये

टूटे हुए ख्वाबों ने हमको ये सिखाया है दिल ने जिसे पाया था आंखो ने गंवाया है (फिल्म मधुमती)

शैलेन्द्र साम्यवादी धारा में विश्वास करते थे। उन्हें दिवा-स्वप्न देखने की आदत पड़ चुकी थी। सामाजिक सुधारों पर आधारित फिल्मों के गीत वे विशेष रुचि से लिखते थे। फिल्म ‘पतिता’ में उन्होनें कितने ही हिट गीत लिखे। जो गीत बच्चों पर फिल्माया जाने वाला हो, उसे लिखते समय तो शैलेन्द्र की बांछे खिल उठती थी। बच्चों में उन्हें देश का भविष्य नजर आता था। ‘बूट-पॉलिश’ का यह गीत अपने भीतर कितना गहरा अर्थ लिए हुए है

नन्हे-मुन्ने बच्चे, तेरी मुट्ठी में क्या है? मुट्ठी में है तकदीर हमारी हमने किस्मत को बस में किया है।

शैलेन्द्र ने अधिकांश फिल्मों में शंकर-जयकिशन के लिए ही गीत लिखे हालंकि उन्हें प्रत्येक संगीतकार अपने गीतों के लिए लेना चाहता था। सलिल चौधरी के लिए उन्होनें मधुमती में गीत लिखे तो फिल्म के दसों गीत हिट गये। शैलेन्द्र को उनके गीतों पर तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। किन्तु वे पुरस्करों की ओर से उदासीन ही रहते थे। पुरस्कार मिल गया तो क्या, न मिला तो क्या वे इस तमाम प्रसिद्धि के तो अधिकारी थे मगर फिल्म-जगत ने उन्हें जैसी विदाई दी, उसके वे कतई अधिकारी नही थे। सन 1960 का जिक्र है। शैलेन्द्र और बासु भट्टाचार्य की उन दिनों खूब निभ रही थी। दोनों ही सपने देखने के आदी जो थे। तब बासु भट्टाचार्य विमल राय प्रोडक्शन से अलग हो गये थे और एक छोटी सी कोठरी में रह रहे थे। सौ वर्ग फुट की वह कोठरी शैलेन्द्र का दूसरा घर बन गई थी। अपने अधिकांश गीत वे वही लिखते थे। वहां रहते हुए बासु ने एक सपना देखा।

वही सपना शैलेन्द्र ने भी देखा।

दोनों ने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी पढ़ी ‘तीसरी कसम’ दोनों को लगा कि तीसरी कसम पर यदि फिल्म बनाई जाये तो वह गजब की आर्ट फिल्म बनेगी और दर्शकों को पसंद भी खूब आयेगी। दो दीवानें मिल बैठे थे और ख्याली पुलाव पका रहे थे।

शैलेन्द्र ने पूछा “बासु दा, कितना रुपया खर्च आयेगा फिल्म बनाने में?

बासु दा कितने ‘तजुरबेकार’ रहे होगें, उसका अदांजा उनके उत्तर से लगा लीजिये “दो ढाई लाख रुपये में काम चल जाएगा। हमने कौन से चोटी के हीरो-हीरोइन लेने है कैमरामैन सुब्रत मित्रा हो जायेंगे बस कच्ची रील का खर्च है। सेट सब सस्ते और स्वाभाविक लगायेंगे। हमें कोई तड़क-भड़क थोड़ें ही दिखानी है।

यह बनिये वाला नही, एक लेखक का हिसाब-किताब था। उस पर शैलेन्द्र का साथ। योजना सुन कर शैलेन्द्र उछल पड़े बोले एक लाख रुपया तो मेरे पास है ही, शेष का भी कुछ न कुछ इंतजाम हो जाएगा। एक लाख से तो हमारी गाड़ी चल निकलेगी।

“जरूर चल निकलेगी” और अपने उत्साह में बासु ने शैलेन्द्र को गले लगा लिया दोनों कतई भूल गये थे की एक लाख रुपया तो तीन दिन की शूटिंग में साफ हो जाता है।

राज कपूर को जब पता लगा कि शैलेन्द्र फिल्म बनाने जा रहा है तो वह चौंक गया उसे थोड़ा डर भी लगा की आर.के. स्टूडियो में यह बगावत कैसी ? मगर राज कपूर ने फिल्म की कहानी सुनी तो वह मन ही मन खूब हंसा होगा। ऐसी कहानी में रुपया फंसाने बजाय वह कहानी को अरब सागर में फेंक देना अधिक पसंद करता। राज कपूर को विश्वास हो गया कि आर.के. बैनर को शैलेन्द्र की फिल्म से कोई खतरा नही तो उसने स्वंय ही शैलेन्द्र की फिल्म में मुफ्त काम करने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना शैलेन्द्र की महान भूल थी जिसकी कीमत वे जीवन भर न चुका सके।

राजकपूर का प्रस्ताव लेकर शैलेन्द्र दौड़े हुए बासु के पास पहुंचे बासु सीधे-सादे ग्रामीण युवक की भूमिका के लिए राज कपूर को फिट नही पा रहा था मगर उनके दिल में यह बात जरूर थी कि राज कपूर के नाम से फिल्म चल निकलती है। बासु ने राज कपूर को हीरामन की भूमिका दे दी। अब राज कपूर के लिए उपयुक्त हीराबाई की तलाश होने लगी। हीरो चोटी का है तो हीरोइन भी चोटी की होनी चाहिये। हीरोइन वहीदा रहमान को ले लिया गया।

जिस सपने को बासु और शैलेन्द्र ने एक ‘लो बजट फिल्म’ के रूप में देखा, उसकी शुरूआत एक बड़ी फिल्म की तरह हुई। फिल्म में छोटे-मोटे सितारे होते तो वह झटपट बन कर तैयार हो जाती मगर राज कपूर के पास डेट कहां ? वह तो ‘जिस देश में गंगा बहती है का ओवर-फ्लो बटोर कर ‘संगम’ का निर्मान करने में व्यस्त था। शैलेन्द्र जब भी राज कपूर के पास डेट के लिए पहुंचे राज कपूर का उत्तर होता “मैं तो घर का ही आदमी हूं जब कहो, आ जाऊंगा। बस जरा संगम पूरी हो जाये”

इस ‘घर के आदमी’ कारण ही ‘तीसरी कसम’ रूकी रही ‘संगम’ पूरी हो गई तो उसके प्रदर्शन की तैयारी होने लगी। बड़े आदमी की फिल्म थी न संगम प्रदर्शित हो गई तो मेरा नाम जोकर की कहानी फाइनल होने लगी। शैलेन्द्र को इस टालमटोल से बेहद नुकसान हो रहा था। उसका रोम-रोम कर्जे में फंस गया था। मगर ‘घर के आदमी’ के सामने मुंह कौन खोलता है? फिर राज कपूर जैसा महान कलाकार फिल्म में मुफ्त काम कर रहा था !

किसी तरह रो-पीट कर ‘तीसरी कसम’ पूरी हो गई। अब उसके प्रदर्शन का सवाल उठा। राज कपूर का वितरकों पर कितना प्रभाव है, सबको मालूम है। उसने इस प्रभाव का जरा भी लाभ शैलेन्द्र को नही दिया। वितरकों ने ‘तीसरी कसम’ देखी तो कहा “यह कैसी फिल्म है? फिल्म में फाइट कहां है ? हीरमन कसम खा लेता है, किसी बाई को अपनी बैलगाड़ी में नही बिठाऊंगा और फिल्म खत्म। इसे कौन देखेगा ? एंड में हीरमन की जमींदार के करिंदों ने ढिशुँग-ढिशुँग दिखाओ हीरामन ‘फाइट’ में घायल हो जाए, हीराबाई उसे खून दे ऐसे दो चार सीन डालो तो फिल्म चलेगी।

शैलेन्द्र यह सुनकर भौंचक्के रह गये थे उन्हें फिल्म का डिब्बे में बंद हो स्वीकार था मगर वे किसी भी तरह से फणीशवर ‘रेणु’ की कहानी की ‘हत्या’ करने को तैयार नही हुए। ‘तीसरी कसम’ डिब्बे में बंद थी और राज कपूर ‘संगम’ का ओवर-फ्लो बटोर रहा था। वह चाहता तो शैलेन्द्र को कर्जे से मुक्त करवा सकता था। वह चाहता तो ‘तीसरी कसम, का प्रदर्शन करवा सकता था।

यदि वह ऐसा कर देता तो शैलेन्द्र को फिल्म बनाने की सजा कैसे मिलती ? किसी तरह शैलेन्द्र ने वितरकों से बिना गारंटी का धन लिए फिल्म का प्रदर्शन करवाया प्रचार के अभाव में फिल्म फ्लॉप हो गई। शैलेन्द्र का दिल टूट गया।

हसरत जयपूरी शैलेन्द्र का जोड़दार रहा है दोनों शंकर-जयकिशन के लिए गीत लिखते थे हसरत को इस बात से चिढ़ लगती थी कि शैलेन्द्र के गीत हिट हो जाते है और मेरे गीत दब कर रह जाते है उसने भी उन्ही दिनों शैलेन्द्र के विरुद्ध विष विमन करना शुरू कर दिया।

शैलेन्द्र हैरान था। वही आदमी जो कल तक उसके दोस्त होने का दम भरते थे। आज उसके जले पर नमक छिड़क रहे थे उसकी पीठ में छुरा घोंप रहे थे। उसका कोमल कवि मन इस सब को सह न सका और 14 दिसम्बर को शैलेन्द्र यह संसार छोड़ गया विधि का क्रूर हास्य देखिये 14 दिसम्बर राज कपूर का जन्म दिन है।

बाद में ‘तीसरी कसम’ को वर्ष का सर्वश्रेष्ठ चित्र ठहराया गया। इसे राष्ट्रपति स्वर्ण पदक दिया गया। अब वितरक चेते, दर्शकों को भी होश आई। दर्शकों ने ‘तीसरी कसम’ को और सराहा।

इस समय ‘तीसरी कसम’ का निर्माता सुदूर स्वर्ण में बैठा सोच रहा था कि यदि इस सम्मान का एक अंश भी मुझे जीते-जी मिल जाता तो मैं पृथ्वी छोड़ता ही क्यों ?


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये