सितारा देवी

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नृत्य साम्राज्ञनी सितारा देवी के चैरानवे वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह देने से जैसे छन से घुंघरु टूट कर बिखर गये। यूँ तो उम्र हो जाने पर इंसान को यह दुनिया छोड़नी ही पड़ती है लेकिन सितारा देवी की सदाबहार, ऊर्जा से परिपूर्ण, जोश से भरे नृत्य के कार्यक्रमों को देखते हुए दर्शक उनकी शारीरिक उम्र का अंदाजा ही नहीं कर पाते थे, अभी कुछ समय पहले भी उन्होंने कत्थक का लम्बा प्रोग्राम पेश किया था और आने वाले महीनों में (फरवरी 2015) भी उनके एक कार्यक्रम की रूप रेखा बन रही थी। मेरी उनसे कई मुलाकातें हुई थी, पहली मुलाकात अस्सी के दशक के अंतिम वर्ष 1989 में हुई थी जो स्व. रामानन्द सागर जी ने करवाई थी। वैसे तो उन्हें अपने नृत्य प्रैक्टिस, कत्थक शौध कार्य और नृत्य सिखाने तथा रंगमंच में नृत्य प्रोग्राम पेश करने से फुर्सत नहीं मिलती थी परन्तु मायापुरी के तत्कालीन संपादक श्री ए.पी. बजाज जी को वे बहुत मान देते थे इसलिए मैं जब तब उनसे मिलकर बातचीत करने का सुख लूट लेती थी, मुझसे विशेष लगाव इसलिए भी था क्योंकि मैं भी कत्थक नृत्य सीख रही थी। आईये उनके जीवन के खट्टे मीठे पलों का स्वाद आप भी चखिये: नृत्य शिरोमणी सितारा देवी का जन्म आठ नवंबर 1920 को कोलकाता ( ब्रिटिश इंडिया उस वक्त ) में बनारस के एक ब्राह्मण परिवार में दीपावली से कुछ दिन पहले धनतेरस के दिन हुआ था। पिता सुखदेव महाराज वैष्णवाइट पंडित थे संस्कृत के, वे देश भर में घूम घूम कर संस्कृत तथा कत्थक नृत्य छात्रों को सिखाते थे। सितारा देवी की माता मत्यकुमारी, नेपाल के राजसी परिवार से संबंधित थी। धनतेरस के दिन पैदा होने के कारण सितारा देवी का नाम पहले धनलक्ष्मी रखा गया और प्यार से सब उन्हें धन्नों पुकारते थे। सितारा देवी ने बताया कि उन दिनों अच्छे घरों की लड़कियों को नृत्य सीखने की मनाही थी, नर्तकियों को पतुरिया का नाम दिया जाता था लेकिन पिता सुखदेव जी ने कत्थक नृत्य में भक्ति भाव का रस भरते हुए यह कहा कि अगर श्री कृष्ण के लिए राधा नृत्य कर सकती थी तो हमारी बेटियाँ क्यों नहीं कर सकती है? पिता ने नृत्य की कई शालाएं शुरू की और कई लड़के लड़कियों को नृत्य सिखाया, यहां तक की कई रक्कासाओं की बेटियों को भी नृत्य सिखाया, उन्होंने कई बार नृत्य नाटिका द्वारा महाभारत पेश किया जिसे नन्हीं धनलक्ष्मी चाव से देखती रही और उस नन्हीं उम्र में सिर्फ आँखों से देख कर कत्थक सीखने लगी आठ वर्ष की उम्र में उनके विवाह की बातचीत होने लगी लेकिन उन्होंने सख्ती से इंकार करते हुए स्कूल में पढ़ने की इच्छा जताई तो उन्हें कामछंगढ़ हाई स्कूल में दाखिल करा दिया गया। वहाँ स्कूल के प्रोग्राम्स में वह नृत्य पेश करने लगी। एक बार स्कूल के एक उत्सव में सावित्री सत्यावान नृत्य नाटिका में उन्होंने इतना अच्छा नृत्य पेश किया कि वहाँ के ‘दैनिक आज’ अखबार में उनकी खूब तारीफें छपी। जब पिता ने बेटी धन्नों को अखबार की सुर्खियों में देखा तो समझ गये। कि नृत्य आकाश में एक नई सितारा का उदय हुआ है और तभी उन्होंने बेटी का नाम धनलक्ष्मी से बदल कर सितारा रख दिया। दस वर्ष की उम्र में ही सितारा देवी रंगमंच पर सोलो कत्थक नृत्य पेश करने लगी और नृत्य को और गहरायी से सीखने सिखाने में इतनी व्यस्त हो गयी कि स्कूल की पढ़ाई छूट गई। ग्यारह वर्ष की उम्र मंे सितारा देवी परिवार सहित मुंबई शिफ्ट हो गई एक बार मुंबई के अतिया पैलेस में कुछ चुनिन्दे महान हस्तियों जैसे गुरूदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर, सरोजिनी नायडू, सर कावसजी जहांगीर के सामने कत्थक पेश किया तो सबने उनकी खूब तारीफ की। तब रविन्द्रनाथ जी ने सितारा से टाटा पैलेस में भी एक नृत्य पेश करने का आग्रह किया, और सितारा ने तीन घंटे तक कत्थक नृत्य टाटा पैलेस मंे प्रस्तुत करके सबको विस्मृत कर दिया। सितारा जी ने मुझे बताया कि नृत्य के बाद गुरूदेव रविन्द्रनाथ जी ने उन्हें एक शाॅल और पचास रूपये भेंट किए, वह हाथ फैलाकर वह भेंट लेने जा ही रही थी कि उनके पिता ने कानों में फुसफुसा कर कहा, ‘‘धन्नों, रविन्द्रनाथ जी बहुत महान व्यक्ति हैं, उनके पाँव छू कर आशीर्वाद ले लो।’’ उस दिन के बाद से सितारा के प्रसिद्धी का नया अध्याय शुरू हो गया। उन्होंने उन दिनों के मेट्रो कल्चरल जिन्दगी का गढ़ माने जाने वाले जहांगीर हाॅल में लगातार प्रोग्राम पेश करना शुरू किया। बारह वर्ष की उम्र में उन दिनों के प्रसिद्ध फिल्म मेकर निरंजन शर्मा ने उनसे कई फिल्मों में नृत्य करने का अवसर दिया जैसे ‘ऊषा हरण’ (1940), नगीना (1950), रोटी, वतन (1954) अंजली 1957 (महबूब खान) मदर इंडिया। फिल्म मदर इंडिया में सितारा जी ने अंतिम बार फिल्मी नृत्य किया (होली वाला डान्स जिसमें उन्होंने पुरूष के भेष में डान्स किया) इस फिल्म के बाद उन्होंने शास्त्रीय नृत्य कत्थक में और ज्यादा महारथ हासिल करने और कत्थक नृत्य पर गहरा शोध करने के लिए फिल्म दुनिया को त्याग दिया।

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सितारा देवी का विवाह पहले के. आसिफ के साथ हुआ था लेकिन बात बनी नहीं। उसके बाद उन्होंने प्रताप बारोट से विवाह किया जिनसे उन्हें एक पुत्र रणजीत बारोट भी है।
उनका शादीशुदा जीवन ठीक नहीं चला। सितारा देवी ने अपना जीवन पूरी तरह नृत्य को समर्पित कर दिया। उनमें भरपूर ऊर्जा थी, उन्होंने अपने पिता की कविताओं, नृत्य के थीम और अपनी खुद की स्टाइल को मिला कर कत्थक नृत्य में पिरोया और दुनिया को चमत्कृत कर दिया। सितारा जी ने मुझे बताया था कि 75 वर्ष की उम्र में भी उनके फिजिकल ट्रेनर उन्हें कठिन से कठिन व्यायाम कराते थे जैसे गुलाटियाँ मारना, लट्टू की तरह घूमना, रेस्टलिंग, एक बीम से लटक कर उसके इर्द गिर्द ऊपर नीचे घूमना वगैरा। सितारा जी के अनुसार उनके पूरे परिवार (तीन बहनें, दो भाई, बहन का बेटा महान नर्तक गोपी कृष्ण) ने कत्थक नृत्य को आसमान की ऊँचाई पर पहुंचाया, कत्थक की खोई प्रतिष्ठा को फिर से कायम किया। सितारा देवी घंटों घंटों कत्थक नृत्य में लीन रहती, ठुमरी भजन को नृत्य को एक सूत्र में पिरोने का महान काम भी उन्होंने किया। सितारा देवी को कई अवाॅर्डस से भी सम्मानित किया गया, जैसे संगीत नाटक अकादमी अवाॅर्ड (1969) पद्मश्री (1973) कालीदास सम्मान (1995) नृत्य निपुण अवाॅर्ड परन्तु जब उन्हें पद्म भूषण अवाॅर्ड दिया गया तो उन्होंने यह कहते हुए उसे ठुकरा दिया कि सरकार को शायद पता नहीं कि मैंने कत्थक नृत्य के लिए क्या क्या किया है, मैं भारत रत्न से कम कोई अवाॅर्ड नहीं स्वीकारुंगी। सितारा देवी को वैसे तो कई सम्मान मिले लेकिन सर्वश्रेष्ठ सम्मान उन्हें गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर द्वारा उन्हें दिये गये नाम ‘नृत्य साम्राज्ञनी’ से मिला जब वह महज सोलह साल की थी। सिर्फ कत्थक ही नहीं बल्कि वे भरतनाट्यम, फोक नृत्य रशियन बैलेट में भी पारंगत थी। उन्होंने और उनके पिता ने कत्थक पर जो रीसर्च किया वह कभी भुलाया नहीं जा सकता। सितारा देवी ने कई फिल्म सितारों जैसे मधुबाला, माला सिन्हा, रेखा, काजोल को भी नृत्य सिखाया। सही मायने मंे सितारा देवी कत्थक नृत्य की अंतिम रचना थी। उनका अंतिम संस्कार सत्ताइस नवंबर को रखा गया क्योंकि उनके बेटे रणजीत बारोट को विदेश से आना था। मायापुरी परिवार सितारा देवी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती है।

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Mayapuri