पहले एक्ट्रेसेज़ की स्कर्ट पर विवाद होता था, अब शाहरुख के चश्में पर हंगामा हो गया

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बीते बुद्धवार इंडियन फिल्म इंडस्ट्री ने अपना दिग्गज कलाकार खो दिया। कहते हैं कि मेथड एक्टिंग के जनक ही दिलीप कुमार साहब थे। हर कोई उनकी बहुत इज्ज़त करता था। इतने बड़े दिग्गज का यूँ छोड़कर चले जाना कुछ ऐसा ही जैसे अचानक किसी बूढ़े बरगद की छाँव खत्म हो जाना।

अब ऐसी ख़बर सुनने के बाद भला एक्टर्स को ये फुरसत कहाँ मिली होगी कि वो कपड़े जूते क्या पहनने हैं इसका ध्यान रखें? ख़ासकर शाहरुख खान, जिन्हें दिलीप साहब अपने बेटे की तरह मानते थे। अपने पितातुल्य शख्सियत के विदा होने की ख़बर सुनकर शाहरुख़ तुरंत घर से ब्लू जींस और वाइट टी-शर्ट में निकले और आँखों पर धूप का चश्मा लगा लिया।

बस इतनी सी बात पर बेशर्म सोशल मीडिया खलिहरों ने हंगामा बरपा दिया। अब कोई इनसे पूछे कि ये कोई समय है किसी की टांग खिंचाई का? किसी के पिता की डेथ हो जाती है तो क्या उससे ये पूछा जाता है कि उसने चश्मा क्यों लगाया? बाल क्यों लटक रहे हैं? टी शर्ट हाफ क्यों है?

फिर जो शाहरुख को जानते हैं वो ये भी भली भांति जानते हैं कि शाहरुख लेट शिफ्ट काम करते हैं और देर से सोने के आदी हैं। शाहरुख कई बार सुबह 4-5 बजे भी सोते हैं। दिलीप साहब की डेथ सुबह साढ़े सात बजे हुई थी। फिर दिलीप साहब के पार्थिव शरीर को घर लाया गया था। तभी शाहरुख 9 बजे से पहले घर में हाज़िर हो गए थे और उन्होंने हर संभव तरीके से दिलीप साहब की पत्नी सायरा बानों को हौसला देने की कोशिश की। अब शाहरुख खान के चश्मा पहने होने की वजह ये भी तो हो सकती है कि वह सो के उठे ही हों और तुरंत दिलीप साहब के घर पहुँच गए हों।

 

पर सोशल मीडिया ट्रोलर्स का कोई ईमानधर्म कहाँ है? वह तो इस बात पर भी हंगामा कर सकते थे कि देखो शाहरुख़ की आँखें सूजी हुई हैं, रात को पार्टी करके आया होगा इसलिए ऐसा दिख रहा है। अरे कुछ नहीं तो चश्मा ही लगा लेता।

ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज के समय में हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि किसी की मौत पर भी फैशन और घड़ी चश्मा देखने लगे हैं।

बीते बुद्धवार शाम 5.30 बजे दिलीप साहब के पार्थिव शरीर को जुहू कब्रिस्तान में पूरे सम्मान के साथ, तिरंगे झंडे में लपेटकर सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। वहाँ बॉलीवुड हर बड़े सितारे समेत अमिताभ बच्चन और उनके सुपुर्द अभिषेक को भी देखा गया।

हम दिलीप साहब की आत्मा को शांति मिले ऐसी प्रार्थना करते हैं।

-सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’

 


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