अंतरंग स्मृतियों का आंकलन

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ये बातें लिख रहा हूं 21 दिसंबर की सुबह आठ बजे… और लिखने की वजह ‘मायापुरी’ के अंक 2098 के न्यूज़रील में छपी खबर ‘फिल्म अभिनेत्री साधना अस्पताल में भर्ती’। वे 73 वर्ष की हैं और मैंने जाॅय मुखर्जी के साथ इनकी पहली फिल्म ‘लव इन शिमला’ देखी है। ब्लैक एंड व्हाइट यह फिल्म संगीत प्रधान थी। इसमें वे प्रारंभ में एक ऐसी लड़की थीं जिसे शायद ही कोई अपना प्रेम समर्पित करके अपने रातों की नींद गंवाये किंतु यही नायिका जब फिल्म की एक सर्पोटिंग एक्ट्रेस के सहयोग से एक नये लुक में पर्दे पर सामने होती है तो हिंदुस्तान के करोड़ों सिने दर्शकों के दिल में उतर जाती हैं- उस दौर में उनके बालों के स्टाइल का एक चलन बन गया था- जिसे ‘साधना कट’ बाल कहे जाते थे। उस जमाने की लड़कियां अब बूढ़ी हो चुकी हैं। प्रिय पाठकों! अपनी किसी बूढ़ी दादी-नानी से साधना की लोकप्रियता और उनकी कातिलाना मुस्कुराहट के बारे में पूछें तो ये किस्से कितने रस भरे होंगे, इसका बयान शब्दों में संभव नहीं। बूढ़े दादा-नाना, जो फिल्में देखने के शौकीन रहे हैं, उन्होंने साधना की हुस्न परस्ती का जो मजा लिया है, उसका अपना अंदाज है।

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बाॅक्स आॅफिस पर साधना जहां देव आनंद साहब की ‘हम दोनों’ में थी और उन पर चित्रित गीत अभी ना जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं… अभी अभी तो आई हो, बहार बनकर छाई हो… की याद अभी भी मन मस्तिष्क में कायम हैं।

कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद की ‘गबन’ के उपन्यास पर आधारित फिल्म इसी नाम से बनी थी, जिसमें भारतीय स्त्रियों के आभूषण- प्रेम को कथ्य बनाया गया है जिसके लिए नायक (सुनील दत्त) को गबन का अपराध करना पड़ता है। ‘गबन’ की याद की वजह फिल्म का एक लोकप्रिय गीत है- ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तो… जहां तक साधना के सौंदर्या में फंसे उस जमाने के फिल्म दर्शकों का हाल है वह बेहाल करने वाला तो है ही, किंतु एक बात विशेष तौर पर उल्लेखनीय है कि वे रहस्य-प्रधान फिल्मों की पहली पसंद उस जमाने के निर्माता-निर्देशकों की थीं। उनकी कुछ सुपरहिट फिल्मों में ‘वो कौन थी’ (जिसका एक गीत बेहद सुरीला था…लग जा गले से…नायक बने थे मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार) ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में गाने ने खूब धूम मचाई थी। एच एस रवेल निर्देशित फिल्म ‘मेरे महबूब’ जिसके हीरो राजेन्द्र कुमार थे ने तो धूम ही मचा दी थी, राज कपूर के साथ ‘दुल्हा-दुल्हन’ और रामानंद सागर की फिल्म आरजू में हीरो राजेन्द्र कुमार थे यह एक यादगार फिल्म बन गई थी और विमल राय की परख, बी.आर. चोपड़ा की वक्त।

इस पत्रकार को भी उनसे बैंड स्टैंड के उनके आवास में मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैंने उनसे उनके अतीत के बारे में पूछा था…तब क्या कहा था यह मायापुरी के पुराने पन्नों में कहीं छपा है। मैं सिर्फ उनके सौंदर्य को निहारता रहा जबकि वे प्रतिभाशाली निर्देशक आर.के. नैय्यर की पत्नी थीं और फिर एक फिल्म ‘गीता मेरा नाम’ में पर्दे पर देखने को मिलीं थीं। फिल्म के निर्देशक आर.के. नैय्यर थे और इस फिल्म में सुनील दत्त नायक के बजाय खलनायक बने थे। इस आलेख को समापन से पहले यह बताना जरूरी है कि ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ के संगीतकार ओ.पी. नैय्यर थे जो अब नहीं हैं और फिल्म के सारे गाने हिट थे। ओ.पी. नैय्यर भी इस शख्स के मित्रों में थे जिनके साथ अंतरंगता के कई दिलफरेब किस्से हैं जिसका बयान फिर करूंगा…इसे प्रकाशित होने के बाद अगले किसी अंक में….

साधना जी! आपके स्वास्थ्य के लिए सारा ‘मायापुरी’ परिवार चिंतित है और आपको बता दें- आप जहां भी हैं- अपने प्रशंसकों के दिलों में रहेंगी।?


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Mayapuri

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