INTERVIEW: ‘‘सबसे पहले तो आप फीमेल और मेल फिल्में न बोले… फिल्में तो फिल्में ही है??’’ – सोनाक्षी सिन्हा

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लिपिका वर्मा

सोनाक्षी अपनी फिल्म,‘नूर’ से इस लिए भी खुश है कि उन्हें अपने शहर मुम्बई की कुछ ऐसी जगहों पर भी जाने का मौका मिला जहां वह कभी नहीं गयी और न ही जा पाती। सोनाक्षी एक बहुत  ही स्पष्टवादी अभिनेत्री  है और समय समय पर बहुत कुछ बोल जाती है। किन्तु सही मायने में यह स्पष्टवादी अभिनेत्री अमूमन शांत रह कर सब की बात इत्मिनान से सुनना पसन्द करती है। अक्सर महिला प्रधान किरदारों में एवं एक्शन करते हुए भी सोनाक्षी अपनी हाल में रिलीज  हुई फिल्मों में नजर आ रही है। फिल्म ‘नूर’ ‘‘में एक पत्रकार का किरदार निभा रही सोनाक्षी अपने आप को किस तरह मुम्बई शहर में काम पर निकलती है और क्या कुछ शक्ति है, यही  सब इस फिल्म में दिखाया गया है। उनकी जिन्दगी में ऐसा क्या मोड़ आ जाता है कि  वह एक आम लड़की नार्मल, से खास बन जाती है। एक हादसे से वह अपने आप को बदल लेती है ?? यह तो फिल्म ‘नूर’ देख कर ही आप को पता चलेगा ??

पेश है सोनाक्षी सिन्हा के साथ  लिपिका वर्मा की बातचीत के कुछ अंश

आप अब मुम्बई को कैसे देखती है?

जी हाँ, यही कहूँगी की मै मुम्बई में पैदा हुई, पली और बड़ी भी हुई हूँ , किन्तु अब मुम्बई को मैंने करीब से देखा है। मैं-वाशी, वडाला  साल्ट पैन, और मानखुर्द और सीमेंट फैक्ट्री में भी गयी हूँ -अपनी छोटी सी पीली ननो में। ऐसा मैं सिर्फ इस फिल्म ‘नूर’ से जुड़ने के बाद ही कर पायी हूँ। जब मैं यहीं से बिलोंग करती हूँ, लेकिन बहुत सी जगह नहीं देख पायी थी। मेरे लिए यह बेहद ही सुखदायक और सीखने जैसा अनुभव रहा। sonakshi_noor

इस किरदार को हामी भरने के लिए आपने कितना समय लिया ?

जैसे ही निर्देशक मुझे कहानी सुना कर अभी ग्राउंड फ्लोर पर पहुंचे ही होंगे -मैंने उन्हें फोन करके यह बात बता दी – मैं ‘नूर’ बनने के लिए तैयार हूँ। मतलब कुछ ही सेकेंड में फिल्म करने के लिए हामी भर दी थी मैंने। मुझे इस किरदार में हर शेड  नजर आया, वह इमोशनल है, एक नार्मल व्यक्तित्व रखती है। हर व्यवसाय जैसे उतार जढ़ाव होता है, वह भी है इस किरदार में. और तो और बहुत फनी कैरक्टर भी है। इस लिए मैंने ‘नूर’ बनना पसंद किया।

सीमेंट फैक्ट्री में काम करने वालों में क्या बदलाव लाना चाहेंगी आप?

मेरे ख्याल से यह परिस्तिथि भी इस फिल्म में छुई गयी है। जो लेबर लोग दिन रात सीमेंट फैक्ट्री में काम करते हैं, वह बेचारे तो दिन रात प्रदूषित हवा ही साँस द्वारा लेते हैं। मेरे हिसाब से यहां ऐसी कार्यकारी परिस्तिथियां जरूर बदलनी चाहिए। मुझे वहां धूल -मिट्टी की वजह से तकलीफ हुई तो उन  का क्या हाल होता होगा। यही नहीं हमारे यहाँ स्टूडियोज की परिस्तिथियां भी अच्छी करनी जरुरी है। कम से कम जहाँ कही भी कोई काम करते हैं वहां हाईजेनिक स्वेच्छिक, परिस्तिथिया होना अनिवार्य कर देनी चाहिए। आशा करती हूँ आगे चलकर सीमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों को एक अच्छा स्वेच्छिक माहोल काम करने के लिए मिलेगा।noor_sonakshi sinha

आपकी सबसे पसंदीदा जगह कौन-सी रही बचपन में जहाँ आप ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहती थी?

सोनाक्षी  गणित में भले अच्छी न हो लेकिन उन्हें स्कूल में रहना क्यों पसन्द था? … पढ़िए जानने के लिए-‘‘मुझे अपने स्कूल शुरू होने के पहले जल्दी जाना पसंद हुआ करता था। और स्कूल खत्म होने के बाद भी मैं स्पोर्ट्स हेतु स्कूल में  ही कुछ समय के लिए रहा करती थी। स्पोर्ट्स की प्रैक्टिस करना मुझे बहुत पसंद था। इसके इलावा मुम्बई के जॉगर्स पार्क -जुहू और बैंडस्टैंड  भी अक्सर जाया करती थी। सो आज भी इन सभी जगहों  से तुरंत कनेक्ट कर लेती  हूँ।  ’’

मुम्बई की कौन-सी चीजें पंसद नहीं है आपको?

मुम्बई के  हर स्थान पर जो खुदाई होती रहती है साल भर, यह तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। दूसरे  इसकी वजह से ट्रैफिक थम सा जाता है और हम सब जगह लेट पहुँचते हैं यह भी बहुत बेकार  लगता है। हमारा शहर बहुत अच्छा है यहाँ पर इंफ्रास्ट्रक्चर को और बेहतर किया जा सकता है। सबसे पहले तो जो खुदाई शुरू करते हैं और उसे बन्द करने का नाम ही नहीं लेते यह सबसे बुरा लगता है मुझे। रोड्स को बेहतर करना बहुत ही अनिवार्य है सब जगह पॉट होल्स रहते है जिनकी वजह से गाड़ियों की स्मूथ  रनिंग नहीं हो पाती  है । sonakshi sinha

पत्रकार बनी है कौन सा पेपर पढ़ा करती थी बचपन में और अब कौन-सा पढ़ती है ?

अब तो सब कुछ डिजिटल हो गया है सो मैंसब कुछ मोबाइल और ट्विटर पर ही पढ़ लिया करती हूँ। लेकिन हाँ बचपन में पेपर हमें इसलिए पढ़ने के लिए कहा  जाता, ताकि हम अपने शब्दकोष सशक्त कर सके।  बाकि तो ज्यादा कुछ याद नहीं है। लेकिन हां मैंने अपने घर पर  कुछ अंग्रेजी पत्रिकाओं की एंट्री बिल्कुल से बंद करवा दी है !! हंस कर बोली सोनाक्षी।

अपने इस फिल्मी सफर से क्या कुछ सीखा है आपने?

देखिये काफी सारी फिल्में कर ली है अब तो। सो जिस किसी अभिनेता, निर्देशक एवं अन्य टेक्निशन्स के साथ काम किया है तो उन सब से बहुत कुछ सीखा  भी है हमने. सीखने की कोई सीमा  नहीं होती है। हाँ में अपनी इस छोटी सी यात्रा से बहुत सन्तुष्ट हूँ। बस यही चाहती हूँ अच्छे  किरदार जिस तरह मिलते आये हैं वैसे ही मिलते रहे, काम करती रहूँ। यह भी मेरा सौभाग्य है की निर्देशक एवं फिल्मकार मुझे अलग अलग किरदार में देख पाते हैं। मुझे अपने फिल्मी  करियर से कोई  भी गिला शिकवा नहीं है। और तो और मैंने अपनी गलतियों से बहुत कुछ सीखा  है। हर इंसान अपनी गलती को सुधार कर  ही आगे बढ़ता है। अब नूर के निर्देशक सुनील सिप्पी को ले लीजिये – इनके साथ काम किया बस इनके लिए मैं सोनाक्षी नहीं अपितु केवल, ‘नूर’ ही थी। वह सेट पर मुझे नूर कह कर ही बुलाते हैं। फिर चाहे वो अपनी पहली फिल्म निर्देशित कर रहे है। मेरी बाकि सारी  फिल्मों से उन्हें कोई भी लेना देना नहीं था , बस वो चाहते थे बतौर ,‘नूर’ मैं  उनके किरदार को हु बू हू उनके हिसाब से पर्दे पर उतार  सकूँ।  इनका यह विश्वास अच्छा लगा मुझे।

 आप के अंदर की वह कौन सी शक्ति है जो आपको अपने किरदारों को हु बू हू पर्दे पर उतारने में मदद करती हैं?

अब इस फिल्म के निर्देशक सुनील जी को ही लेले -बतौर निर्देशक और वैसे भी वह बहुत बोलते हैं , और मेरे अंदर दूसरों को शान्ति से सुनने की क्षमता है। सो यही  शांत स्वाभाव  जो है मेरा दूसरो को शांति से सुनना- शायद यही मेरी शक्ति भी है।  sonakshi

आप अमूमन फीमेल ओरिएंटेड फिल्में ही हाल में ज्यादा कर रही है क्या वजह है इसकी?

ऐसी कोई बात नहीं है। सबसे पहले तो आप फीमेल और मेल फिल्में न बोले. फिल्में तो फिल्में ही है। हम सब  अभिनेता  है सो हम सब को बतौर  अभिनेता  ही तुलना की जानी चाहिए. .यह हम सभी महिलाओं के लिए भी एक बहुत अच्छी बात है। हम सब भी ऐसे किरदार करना चाहते थे. अब ऑडिनस भी और फिल्मकार भी ऐसी फिल्में बना रहे हैं। दरअसल, में देखा जाये तो महिला हो या पुरुष अभिनेता सब अलग किरदार रियल लाइफ से प्रेरित रोल्स  ही पर्दे पर उतारते है। जहाँ  महिला प्रधान किरदार है तो पुरुष प्रधान भी। इस में अलगाववादी  सोच लाना सही नहीं है। अब पिछले कुछ शुक्रवार ही देख ले। …सारी  की सारी महिला अभिनेत्रियों की फिल्में ही  रिलीज हुई है। कुछ वर्षों  में आशा करती हूँ महिला  प्रधान या पुरुष प्रधान रोल्स कहना बन्द हो जायेगा।

सोनाक्षी ने अपनी पहली तमिल फिल्म लिंगामें भी तमिल भाषा में डबिंग की थी। क्या वो अमूमन अपनी डबिंग खुद करना चाहती है ?

जी बिल्कुल, मेरे चेहरे पर किसी और की आवाज हो यह मुझे बिल्कुल भी पसन्द नहीं है। मुझे याद है यदि  एक पंक्ति का भी कमर्शियल्स हो, तो भी- उस पर अपनी ही आवाज देना पसन्द करती रही हूँ मैं। हाँ यदि मैं कोई भी भाषा में फिल्म करुँगी तो यही चाहूंगी की अपनी ही आवाज उस किरदार को दूँ। बस पागल मेड साउंड, की तरह नहीं लगना चाहिए। यह जरूर है कि -मैं सही उच्चारण करने के पूरी कोशिश और अभ्यास  भी करना चाहूंगी।


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Mayapuri

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