‘‘साहिर- वो शायर जो हर परिस्थिति का है, हर मौसम का है और हमेशा रहेगा’’

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कुछ लोग उन्हें ‘आम आदमी की आवाज’ कहते थे, कोई उन्हें ‘आम इंसान का कवि’ मानते थे। कुछ लोग उन्हें ‘विप्लवी कवि’ कहते थे और कुछ उन्हें ‘आम इंसान के वक्त के साथ बदलते मूड’ मानते थे। कोई कुछ भी कहते रहें उन्हें लेकर, या फिर आज के कवि, अथवा वे कवि जो आज उनकी कविताओं पर शोध कर रहे हैं, वे सब उनकी कविताओं पर चाहे कुछ भी कर रहे हो, साहिर लुधियानवी तथा उनकी कविताएं आज से साठ वर्ष पहले भी सामयिक थी। आज और भी ज्यादा सामयिक है और बदलते वक्त के साथ-साथ और भी ज्यादा सामयिक रहेंगी, क्योंकि साहिर किसी एक समय में बंधे कवि नहीं थे या उस समय के कवि नहीं थे, वे अंतहीन समय के कवि थे और समय चक्र के पार के कवि रहेंगे। उनकी कविता संग्रह ‘ताल्खियाँ’, ‘परछाईयाँ’ तथा उनकी अन्य उक्तियाँ आम आदमी के जीवन के उतार चढ़ाव प्यार मुहब्बत, को लेकर थी, मजदूरों और मजलूमों, अमीर, गरीब के बीच के भेदभाव, करप्ट पाॅलिटिशियन और मालिक द्वारा अपने मातहतों पर जुल्म की दास्तान होती थी उनकी शायरी में। साहिर साहब इंतजार करते रहें कि वक्त बदलेगा भारत का, वक्त बदलेगा हर भारतीय का, वे उस सुबह का इंतजार करते रहे (वह सुबह कभी तो आयेगी)।
आज साठ वर्ष हो गये उन्हें आम आदमी के लिए अपनी भावनायें, उम्मीदें सपने व्यक्त किए हुए, गरीबों, रास्ते में गिरे लाचारों के जीवन के सुधरने की उम्मीदें जाहिर किए हुए लेकिन आज भी वही सारी समस्याएं देश के कोने-कोने में बिखरी पड़ी हैं, आज भी देश के सारे लोग ‘वो सुबह कभी तो आयेगी’ के इंतजार में बैठे हैं, चीख चीख कर पूछ रहे हैं ‘वो सुबह कब आयेगी?।

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कोई आश्चर्य नहीं कि साहिर लुधियानवी इन्हीं वजहों से आज भी सब से ज्यादा इज्जत, मान, प्यार पाने वाले कवियों में से एक है। उनके जीवनकाल के दौरान भी उन पर और उनकी कविताओं, शायरी पर किताबें लिखी जाती रही हैं। उन दिनों एक साहित्य पत्रिका में सबीर दत्त नामक एक कवि ने तो पूरा एक अंक ही उन पर निकाला था, जिसका उनवान था ‘फन और शख्सियत’। ढेर सारी और किताबें उर्दू, हिन्दी तथा विभिन्न अन्य भाषाओं में उनकी कविताओं पर लिखी गई और बहुत से छात्र साहिर की कविताओं पर शोध करके डाॅक्टरेट की उपाधि पा रहे हैं। लेकिन इन दिनों अचानक ही साहिर तथा साहिर ने अपनी कविताओं में जो सपना देखा था उस पर नये सिरे से दिलचस्पी ली जा रही है। अंग्रेजी में एक किताब है जिसका टाइटल है ‘साहिर लुधियानवी- द पीपल्स पोयट’। इस किताब के लेखक ने साहिर की जिन्दगी, उनकी सोच, उनकी कविताएं, शायरी, उनके वक्त पर आठ वर्षों से ज्यादा का शोध समय लिया लेकिन फिर भी किताब के अंत में सबको ऐसा महसूस हुआ कि अब भी लेखक द्वारा बहुत कुछ अनछुआ छोड़ा गया है। साहिर को समझने का प्रयत्न इसमें अच्छा था पर क्या सचमुच बढि़या था, शायद नहीं।

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एक और नयी किताब आ रही है जिसे दो स्काॅलर्स, गौरव वर्मा तथा डाॅ सलमान आबिद प्रस्तुत कर रहे हैं और जो फस्र्ट पर्सन के रूप में लिखा गया है जिसका टाइटल है ‘मैं साहिर हूँ’। इस किताब में साहिर की कहानी कुछ इस तरह कही गयी है जैसे साहिर साहब खुद अपनी कहानी कह रहे हों, या कहते, अगर वे आज हमारे बीच होते। इस पुस्तक में कुछ बहुत ही दुर्लभ तस्वीरें भी हैं और जिस तरह से उनके जीवन की कहानी परत दर परत खुलती चली जाती है ऐसा लगता है जैसे वे अपने दोस्तों के साथ बैठकर अपने जीवन के अच्छे, बुरे, सुखद, दुखद घडि़यों की कहानी कह रहे हो और उनके जीवन की कहानी को सटीकता देते हुए उनकी कुछ बेहतरीन कविताएं भी इसमें शामिल है। साहिर पर एक बायोपिक बनाने की बातें भी हो रही है और विश्वास योग्य खबर यह है कि एक्टर इरफान खान साहिर की भूमिका में होंगे, यह एक बहुत चुनौतिपूर्ण और संवेदनशील कहानी होगी भारत तथा विश्व के महानतम कवियों में से एक कवि साहिर की।

 

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जो भी इस बायेपिक को बनाने की सोच रहे हैं उन्हें साहिर की कहानी की सच्चाई और साहिर के जीवन तथा कविताओं की आत्मा को छूने की जरूरत होगी। यदि थोड़ी सी भी हेर फेर करने की कोशिश की जाये साहिर के विषय को लेकर तो वह सब गलत, नकली झूठी कहानी की शीर्ष में पहुंच जायेगी। इस वक्त मुंबई में एक नाटक खेला जा रहा है जिसका नाम है ‘एक मुलाकात’ जिसमें शेखर सुमन साहिर और दीप्ति नवल, अमृता गिल की भूमिका निभा रहे हैं, अमृता गिल वो महान पंजाबी कवियत्री थी जिन्हें साहिर से जुनूनी हद तक उतना ही प्यार था जितना साहिर का अमृता के साथ प्यार था लेकिन यह प्रेम वो प्रेम था जिसने साहिर को ताउम्र प्रेरित तो किया लेकिन वह अनरिक्वेटेट प्रेम था। साहिर ने जीवन में सब कुछ जीता ही जीता लेकिन प्रेम में हर वक्त हारता रहा। साहिर का एक बहुत ही पैनेनेट फैन है जिनका नाम है मनोहर अय्यर जो एक म्यूजि़कल ग्रुप ‘कीप एलाइव’ चलाते हैं और साहिर के प्रत्येक गीत, उनका बैकग्राउन्ड उनके जीवन की हर घटना, हर कविता से वाकिफ है और प्रत्येक गीत के पीछे छुपी उनके जीवन की कोई घटना के बारे में भी जानते हैं। इस साहिर फैन का एक ही गोल है जिन्दगी में, वे तब तक जीना चाहते हैं जब तक कि साहिर के नाम एक मंदिर नहीं बना लेते।

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आना है तो आ…, उडे जब जब जुल्फेें तेरी.., साथी हाथ बढ़ाना…(नया दौर), जाने क्या तूने कही…, जाने वो कैसे…, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.. (प्यासा), तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा.. (धूल का फूल), ये इश्क इश्क है…, ना तो कारवाँ की तलाश.. (बरसात की रात), अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम..(हम दोनो), चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों..(गुमराह), तुम अगर साथ देने का वादा करो…(हमराज़), मन रे तू काहे ना धीर धरे?…(चित्रलेखा), तोरा मन दर्पण कहलाए…(काजल), ईश्वर अल्लाह तेरे नाम…(नया रास्ता), मै पल दो पल का शायर हूं.., कभी कभी…(कभी कभी), ऐ मेरी जा़ेहराजबां…, आगे भी जाने ना तू…(वक्त), मेरे दिल में आज क्या है…(दाग), मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया…, अभी न जाओ छोड़कर…(हम दोनो), औरत ने जन्म दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाजार दिया…(साधना), वो सुबह कभी तो आयेगी…
‘‘साहिर सिर्फ एक बार चलता है इस दुनिया में लेकिन उनकी शायरी और उनकी दास्तान जिन्दगी भर रहेगी, ता कयामत’’


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Mayapuri

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