एक प्रसिद्ध हीरो जिन्हें कभी गंभीरता से नहीं लिया गया

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कपूर परिवार के पास करने के लिए ऐसा कुछ न था। जिससे के वो प्रसिद्ध कपूर खानदान कहलाते। वह एक मध्यम वर्ग परिवार था जो कि भीड़ भाड़ वाले इलाके गिरगाँव के सेन्ट्रल आॅफ मुम्बई में रहते थे। गिरगाँव एक ऐसा इलाका हैं जहां वह लोग रहते थे जो कि पास की मिल (मुम्बई की मशहूर मिलों में से) में काम करते थे। मिस्टर अमरनाथ कपूर और उनका परिवार एकमात्र ऐसा पंजाबी परिवार था जो कि रामचंद्र चाॅल (100 साल से अधिक पुरानी) के गंदे से कमरे में रहते थे। मिस्टर अमरनाथ कपूर अपनी पत्नी, बेटों के साथ रहते थे (बडा बेटा-प्रसन, छोटा बेटा-रवि) परिवार ऐसे माहौल में ढलने के साथ-साथ वहां की मराठी भाषा भी सीख गया था ताकि वहां के लोगों के साथ बातचीत कर सकें। मिस्टर अमरनाथ कपूर एक छोटे बिजनेसमैन थे जो कि फिल्म-स्टूडियोज में आर्टिफिशयल ज्वैलरी की सप्लाई करते थे। वो तकरीबन सभी स्टूडियो के चक्कर लगाया करते थे पर राजकमल, वी.शान्ताराम उनका प्रिय स्टूडियो था। मिस्टर कपूर सभी हीरोज को अलग-अलग स्टूडियोज में देखा करते थे और उनकी तुलना अपनें बेटे रवि के साथ किया करते थे तब उन्होंने महसूस किया कि रवि उन हीरोज से बेहतर हैं। घर सें निकलनें से पहलें मिस्टर कपूर अपनें पर्स में रवि की फोटोग्राफ रखते थे।शुरू में वह लोंगो को फोटोग्राफ दिखाने में हिचकते थे।
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आखिरकार उन्हें सही अवसर मिल ही जाता हैं जब वी. शान्ताराम ने फोटो देखने के लिए मांगा। मिस्टर कपूर नें वी. शान्ताराम को बताया कि यह फोटो उनके बेटे रवि का हैं। शान्ताराम नें मिस्टर कपूर सें पूछा क्या उनके बेटे की एक्टिंग में दिलचस्पी हैं। तब उन्होंनें जोर से ‘हां’ में सर हिलाया। उस समय शान्ताराम ‘सेहरा’ फिल्म बना रहे थे। और मिस्टर कपूर से कहा कि ‘‘कल सुबह अपने बेटे को स्टूडियो लेकर आना’’। अगली सुबह पिता, पुत्र शान्ताराम से मिले और रवि को पसंद भी किया गया साथ ही रवि को दोबारा स्टूडियो आने को कहा। उन्हें एक बस में बिठाया गया जिसमें जूनियर- आर्टिस्टस जयपुर जा रहे थे। उन्होंने किसी से कोई सवाल नहीं किया और जयपुर पहुंच गए। उन्हें पहननें के लिए धोती-कुर्ता दिया गया और भीड वालें सीन में सबके साथ जाने को कहा जिसमें पहले से हजारों जूनियर-आर्टिस्टस मौजूद थे पर शान्ताराम की नजरें कहीं न कहीं रवि पर थी शान्ताराम को रवि दिलचस्प लगें और इस बात को उन्होंने अपने दिमाग में बिठा लिया।

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रवि काम करने के बाद काफी खुश थे और उन्हें काम के पैसे भी मिले। मिस्टर कपूर हमेशा शान्ताराम से मिला करते थे और एक दिन वह चैक पड़ें जब शान्ताराम ने यह कहा कि ‘‘रवि को दुबारा स्टूडियो लेकर आना। मैं ‘गीत गाया पत्थरों ने’ बना रहा हूं जिसमें मेरी बेटी राजश्री अभिनेत्री हैं और रवि को मैंने अभिनेता के लिए चुना हैं’’। शान्ताराम नें शर्त रखी कि रवि बहुत ही साधारण नाम हैं और रवि को एक नया नाम दिया जितेंद्र। इस नाम से किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। जितेन्द्र नें फिल्म में एक मूर्तिकार की भूमिका निभाई जो कि राजश्री से प्रेम करने लगे थे और जब फिल्म अलग कहानी, खूबसूरत गानों के साथ रिलीज हुई तो एक बड़ी हिट साबित हुई। सबसे ज्यादा दिलचस्प बात यह रही कि फिल्म-मेकर्स ने जितेन्द्र को साइन किया पर वह फिल्में सफल नहीं हुई। तब जितेन्द्र एक डर का सामना करने लगे कि कहीं उन्हें भुला तो नहीं दिया गया। साउथ के निर्माता सुंदरलाल नहाटा नें जितेन्द्र को कुछ फिल्मों में देखा था और वह काफी प्रभावित भी थे।

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सुंदरलाल ने पहले से बबीता को अभिनेत्री के रूप में चुन लिया था और जितेन्द्र को हीरो के लिए साइन करने का फैसला किया। जितेन्द्र को नया लुक दिया गया(हेयर-स्टाइल, व्हाइट टाइट-ट्राउजर, सारे रंग के शर्ट, सकार्वस)। उन्हें शशि कपूर की तरह नाचना सिखाया गया और वह जल्दी ही सीख गए। गिरगाँव के सभी त्यौहारों में जितेन्द्र एक पाॅपुलर-डांसर के रूप में जानने लगे। ‘फर्ज’ सेन्ट्रल थियेटर में 50 दिनों तक चलनें वाली बडीं हिट साबित हुई और सेन्ट्रल थियेटर उनके घर के करीब था और जितेद्र नें इस फिल्म को अनेकों बार देखा। बहुत से आलोचकों नें यह तक कहां कि वह एक्टर नहीं बल्कि ‘जपिंग जैक’ हैं और उन्हें और भी नाम दिये जिससे जितेद्र अंदर तक टूट गए पर उन्होंने इसी तरह की और भी फिल्में की जो कि बड़ी हिट साबित हुई। जितेन्द्र ने अपने करियर के दस सालों में 150 से भी ज्यादा हिट फिल्में दी। वह ‘गिरगाँव’ से ‘कोजिहोम’ (पाली हिल) में रहने चलें गये। जहा उनके पड़ोसी गुलजार और राखी थे।
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यह वो समय था जब उन्हें खुद में बदलाव चाहिए था। तभी उनके पिता ने गुलजार से जितेन्द्र को एक ऐसा अभिनेता बनाने को कहा जिन्हें दर्शक हमेशा पसंद कर सके। गुलजार की फिल्मों में जितेन्द्र ‘परिचय’, ‘खुशबू’, ‘किनारे’ में गंभीर किरदार में दिखे पर ‘जपिंग जैक’ के रूप में नहीं सीरियस रोल्स में जितेन्द्र ने फिल्मी-जगत व दर्शकों को चैंका दिया। उन्होंने सबसे बेहतरीन अदाकारी दिखाई पर गुलजार द्वारा बनाई गई फिल्मों में वो बात नहीं थी जो कि दर्शक चाहते थे। उसके बाद जितेन्द्र ने नाचने गाने वाली फिल्में की जो दर्शक ‘जितू भाई’ के रूप को चाहते थे। एक समय ऐसा भी आया जब जितेन्द्र का खुद का बंगला था पाली-हिल में और वह सबसे लोकप्रिय व बिकने वालें स्टार थे। जितेन्द्र की दिलचस्पी फिल्मों सें खत्म होती चली गई और वह सिर्फ और सिर्फ पैसों के लिए फिल्में करने लगें। साउथ के बहुत से फिल्म-मेकर्स हिन्दी में फिल्म बनाना चाहते थे और एक अजीब कारण सें वह जितेन्द्र को अपनी सारी फिल्मों मे लेना चाहते थे। उनके पास साउथ में इतना काम हो गया कि उन्होंने हैदराबाद में खुद का बंगला ले लिया। और शोभा (पत्नी), एकता (बेटी), तुषार (बेटा) के साथ समय बिताने विकेन्डस में आते थे।
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जितेन्द्र इतने व्यस्त रहने लगे कि उन्होंने अपने निर्माता दोस्त से कहा कि संजीव कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ- बच्चन को क्यों नहीं फिल्म में लेते पर निमार्ता सिर्फ जितेन्द्र को ही चाहते थे। उनकी प्रसिद्धी नें उन्हें 40 से भी ज्यादा अच्छी और बुरी अभिनेत्रियों के साथ काम करने का मौका दिया। मुम्बई के कई कलाकार साउथ आ गए क्योंकि साउथ में पैसे अच्छे मिलते थे और कलाकारों को कोई फर्क भी नहीं पड़ता था कि उन्हें किस तरह का रोल मिलेगा। यहां तक की गीतकार और संगीतकार को भी काम मिला। पर 90 के शुरूआती दौर में फिल्म-मेकर्स को ऐसा लगने लगा कि मुम्बई से जैसे लोगों को सवारी के लिए लाया गया पैसों के लिए। फिल्म-मेकर्स ने फिर एक धमाका किया सभी नें एकमत होकर हिन्दी फिल्में बनाने व बंद करने का निणर्य लिया। जितेन्द्र और उनके दोस्तों ने साउथ को छोड़ दिया। मुम्बई आने के बाद उन्हें ऐसा लगा कि वो किसी अन्य देश में आ गये हैं। जितेंद्र के पास कोई भी काम न था पर इन्हें एक बड़ा सरप्राइज मिला। शोभा (पत्नी) नें घर (जुहू के बंगले) को नये महल जैसा बना दिया और एकता (बेटी) के साथ मिलकर बालाजी टेलीफिल्मस टी.वी सीरियल्स बनाने शुरू किए और साथ ही तुषार को उच्च शिक्षा के लिए भेजा। जितेन्द्र बालाजी के प्रेजिडेंट के लिए नियुक्त किये गए और आज तक वह प्रेजिडेंट के पद पर हैं। जितेन्द्र को बहुत से पिता और दादाजी के रोल का प्रस्ताव मिला और उन्होंने अपने आखिरी फिल्मों मे इसी तरह का किरदार भी निभाया जिनमें से एक फिल्म में काजोल का रोल बहुत ही दिलचस्प रहा। अब जितेन्द्र अलग तरह का जीवन जीनें लगे हैं। वह दोहपर 2:30 से 6:00 तक आॅफिस रहते तथा सारे जरूरी कागज दस्तखत करते। 6: 00 बजे आॅफिस से निकलने के बाद वह ड्राइव करते तथा जिम जाते हैं, बार में शराब पीते और घर जाकर ‘चमत्कार्स’ देखते जो कि शोभा, एकता द्वारा किया गया काम था।
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जितेन्द्र की ऐसी बातें जो कुछ ही लोग जानते हो उनकी सफलता की राह वहां से शुरू होती जब-जब वह घर बदलते रहे। उन्होंने चाॅल से शुरूआत की फिर वह पुरानी बिंल्डिग ‘उषा कुंज’ जो कि कोलाबा में स्थित हैं। जहा प्रेम चोपड़ा और संघर्ष करने वाले अभिनेता उनके पड़ोस में रहते थे। फिर वह कोजिहोम (पाली हिल) रहने गए उसके बाद उन्होंने खुद का बंगला बनवाया। अब वह पलाटियल ‘कृष्णा’ बंगला (जुहू) में रहते हैं जो कि उनकी पत्नी व बेटी द्वारा डिजाईन किया गया।

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रवि सेंट सेबिस्टियन हाई स्कूल में पढ़ते थे। उसी स्कूल में एक लड़का जतिन खन्ना भी पढ़ता था। जो कि बडा होकर सुपरस्टार राजेश खन्ना बना।
जितेन्द्र का भगवान गणपति में अटूट विश्वास रहा है उन्होंने भगवान गणपति की मूर्ति गिरगाँव के घर में रखी जो कि गणेश चतुर्थी के दौरान उन्होंने बनवायी थी जो कि उन्होंने अभी तक नहीं बेचा। जितेन्द्र शिरडी के साई-बाबा जाते तथा साल के सबसे बड़े सबरीमलाई तीर्थयात्रा पर जाते तथा 40 दिनों का व्रत भी रखते जिसमें वह सिर्फ काले कपड़े पहनते, चप्पल पहननें से दूर रहते तथा सेक्स, शराब से दूर रहते हैं।

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जितेन्द्र शोभा से प्यार करते थे जो कि एयर- हाॅस्टेस थी। पर लम्बे समय तक उन्होंने शोभा से शादी नहीं की उसके बाद फिल्म ‘दुल्हन’ के दौरान वो हेमा मालिनी से प्यार करने लगे और मद्रास में शादी करने की सोचने लगे पर शोभा को सब पता लग गया और शादी खत्म सी हो गई। अब जितेन्द्र शोभा को ‘घर का स्तंभ’ कहते हैं।
रेखा जो कि प्यार में पागल थी जितेन्द्र के जब वह पहली बार मुम्बई आई और कहा कि ‘माई गाॅड इन वाइट’।
जितेन्द्र कभी अपनें बच्चों को बढ़ते हुए नहीं देख पाए पर उन्हें विश्वास था कि शोभा अच्छी तरह पालेंगी। वह हमेशा ही एकता को लेकर चिंतित रहा करते थे कि पता नहीं करियर में वो आगे क्या करेंगी और साथ ही तुषार को लेकर वह विश्वासपूर्ण थे। तुषार क्लास में हमेशा ही प्रथम आते थे तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे।

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जितेंद्र को बडा सरप्राइज तब मिला जब उन्होंने देखा कि एकता नें पूरी तरह सें बालाजी टेलीफिल्मस को संभाला और महिला व पुरूष किस प्रकार एकता के फैसले से डरते थे। कभी-कभी जितेन्द्र कहते ‘‘एकता बाॅस है, मैं बस उसकी कम्पनी में काम करता हूं और मैं वही करता हूं जो मेरी पत्नी व बेटी करने को कहती है’’।
जितेन्द्र के बहुत ही कम दोस्त हैं जिन पर वह भरोसा किया करते है। राकेश रोशन, ऋषि कपूर, प्रेम चोपड़ा उनमें से कुछ है। वह यह जान कर बेहद खुश है कि सभी के बच्चे अच्छा काम कर रहे हैं तथा इस बात से भी खुश हैं कि प्रेम की दोनों बेटियों की शादी हो गई तथा अपने शादी शुदा जीवन में अच्छे से बस गई है।
उनके बेटे तुषार ‘प्रशिक्षित काॅर्पोरेट-मैन’ रहे और फिल्मों में उनकी बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं थी जब तुषार नें पिता की फिल्में देखी तो उन्होंने अपनी राय बदल दी और आज वह मुख्य अभिनेताओ में से एक हैं। जितेंद्र की दिलचस्पी कभी भी राजनीति में नही रही और न ही उनके बच्चों की। वह अपने बच्चों को देश के प्रति ईमानदार रहने को कहते तथा देश की तरक्की में अपने तरफ से सहयोग करने को कहते।


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Mayapuri

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