बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट : अविश्वसनीय लेकिन भव्य है  ‘प्रेम रतन धन पायो’

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रेटिंग ***
प्रेम रतन धन पायो देखते हुये ये शिद्दत से महसूस होता है कि सूरज बड़जात्या पर समय का कोई प्रभाव नहीं पड़ा । क्योंकि उन्होंने ये फिल्म भी उसी तरह भव्य पैमाने पर बनाई हैं जैसी उनकी पहली कुछ फिल्में रही हैं जो उन्होंने ज्यातर सलमान खान के साथ ही बनाई हैं ।यहां भी उन्होंने कहानी को लेकर जो काल्पनिक संसार गढ़ा है वो अविश्वसनीय न होते हुये भी मनोहारी है।

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कहानी
प्रेम दिलवाला (सलमान खान) और कन्हैया ( दीपक डाबरीयाल) अयोध्या के ऐसे मस्त जीव है जो रामलीला के दीवाने हैं । यहां प्रेम राजकुमारी मैथिली देवी (सोनम कपूर) के सोशल कार्यो से बेहद प्रभावित है इसलिये वो उसके उपहार फाउंडेशन के लिये चंदा जमा कर उससे मिलने के लिये निकलता हैं लेकिन वहां जाकर परिस्थीतियां कुछ इस तरह बदलती हैं कि प्रेम और कन्हैया एक नई भूमिका में नजर आने लगते हैं । उस भूमिका के तहत वो देखता है कि प्रेम प्रिंस विजय सिंह (सलमान दौहरी भूमिका में) जो प्रेम के हमशक्ल हैं । उनके बीच सोतेले भाई नील नितिन मुकेश और सोतेली बहन स्वरा भास्कर को लेकर तनातनी है । नील बाहर से तो विजय सिंह को बड़ा भाई मानता है लेकिन भाई के वर्चस्व से खार खाता है । दूसरी तरफ स्वरा भास्कर और उसकी छोटी बहन आज भी अलग और सीधे सादे ढंग से जीना पंसद करती हैं । लेकिन वो भी सोतेले बड़े भाई से अपना हक मागंती है अपने वकील की तरह । इस बात का फायदा उठाता हैं उनके दूर का रिश्तेदार और राज्य का सीईओ अरमान कोहली, वो नील को विजय सिंह के खिलाफ भड़काता रहता है और एक दिन वो विजय सिंह को मारने का प्लान बनाता हैं लेकिन विजय सिंह के वफादार, दीवान अनुपम खेर और दीपराज राणा की तत्परता से उन्हें बचा लिया जाता है और एक आज्ञात जगह ले जाकर उनका इलाज किया जाता है । इस बीच दीपराज की नजर प्रेम और कन्हैया पर पड़ती हैं तो वो उन्हें अपने साथ ले आता है । दरअसल एक तो विजय सिंह की मंगेतर राजकुमारी मैथिली को स्वयं प्रिंस ने रिसीव करना हैं दूसरे चार दिन बाद उनका राज तिलक होना है । लिहाजा दुष्मनो की नजरों से विजय सिंह को बचाने के लिये प्रेम को विजय सिंह बनाकर पेश कर दिया जाता है । यहां प्रेम विजय सिहं की बहन स्वरा भास्कर को मनाकर न सिर्फ सारे गिले षिकवे दूर करता हैं बल्कि राज कुमारी जिस तरह से प्रिंस को देखना चाहती है वैसा ही बन उसके मन में विजय सिंह के प्रति प्रेम जगाता है । यहां तक अंत में वो विजय सिंह और नील के बीच की दूरियों को भी मिटाने में कामयाब होता है । यानि एक आम आदमी रजवाड़ों में भाईयों और बहन के बीच गलतफहमीयां दूर कर उनके बीच प्यार माहब्बत पैदा करने में कामयाब होता हैं ।

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निर्देशन
जैसा कि पहले भी बताया जा चुका हैं कि सूरज बड़जात्या अगर बदले हैं तो सिर्फ इतने कि इस बार उन्होंने अपने किरदारों का थोड़ा आधुनिक बना दिया हैं लेकिन उनके बीच संस्कार, परपंरा तथा रिति रिवाज वैसे ही रखे हैं । सूरज ने इस बार जिस कहानी का चुनाव किया है उसमें बताया गया है कि राजे रजवाड़ों में आज भी राजा रानीयों और उनकी और ओलादों में हक और संपत्ति के प्रति डाह और जलन बरकरार है जबकि एक आम आदमी इन सारी चीजों से परे है । लिहाजा उन्होंने उसी के द्धारा राज परिवार के सदस्यों के बीच सालों से पड़ी दुश्मनी की गांठ को खुलवाया है ।फिल्म क्योंकि राजा रजवाड़ों के बीच की हैं इसलिये कुछ तो राजस्थान की रीयल लोकेशने हैं लेकिन जब उन्हें लगा कि वहां दर्शक शूटिंग में व्याधान पैदा कर रहे है तो उन्होंने एन डी स्टूडियो में एक विषाल महल का सेट लगाकर बाकी शूटिंग उसी महल में की ।कहानी में बेशक कितनी ही तर्कहीन चीजें हैं लेकिन सूरज द्धारा की गई भव्यता में दर्शक सब कुछ भूल कर फिल्म के करदारों के साथ हो लेता है और अंत तक उनके साथ बना रहता हैं फिल्म खत्म होने के बाद ही उसकी तंद्रा टूटती हैं और वो एक तिलस्मी दुनिया से बाहर आता है । दर्षक को ऐसी चकाचैंध भरी भव्यता के जरिये सिर्फ सूरज ही बांध सकते हैं। इसलिये ये फिल्म भी काल्पनिक किरदारों को लेकर ऐसा अद्भुत संसार रचती हैं जिसमें दर्शक तीन घंटों तक खोया रहता है ।

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अभिनय
सलमान खान इस बार दौहरी भूमिका में हैं । लेकिन वे दोनों किरदारों में इस तरह घुसे दिखाई देते हैं कि अपनी अन्य फिल्मों के सलमान कहीं नजर नहीं आते । नजर आते हैं तो प्रिंस विजय सिंह या मस्तमौला प्रेम दिलवाला के रूप में । सबसे बड़ी बात कि इस बार दोनों सलमान एक जैसे होते हुये भी एक जैसे नहीं लगते । यानि उन्होंने दोनों भूमिकाओं में अभिनय नही किया बल्कि उन्हें जीया है। सोनम कपूर वाकई सौंद्रय से भरपूर कहीं की राजकुमारी ही लगती है । उसकी भाषा, चलना फिरना या पोशाकें उसे पूरी तरह से एक राजकुमारी में तब्दील कर देती हैं । सोनम ने अपनी भूमिका को पूरी शिद्दत से जीया है । नील नितिन मुकेष को इतना स्पेस ही नहीं मिल पाया जो उनकी भूमिका को लेकर अच्छी या बुरी राय कायम की जा सकेे लेकिन वे जितने भी फिल्म में दिखाई देते हैं अच्छे लगते हैं । इसी तरह अरमान कोहली को बतौर खलनायक पेश किया गया हैं लेकिन उनकी भूमिका भी इतनी विस्तृत नहीं थी कि जिसमें वे खलनायिकी के रंग भर सकते । लेकिन एक अरसे बाद उनके लिये ये एक अच्छा अवसर साबित हो सकता है । बड़े भाई यानि प्रिंस से नाराज बहन को स्वरा भास्कर ने सही आयाम दिये । दीपक डोबरीयाल, अनुपम खेर, दीपराज राणा, मनोज जोशी तथा सुहासनी मूले आदि सहयोगी कलाकारों का सहयोग बढि़या रहा ।

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संगीत
इस बार राजश्री ने हिमेश रेशमिया को मौंका दिया लेकिन फिल्म की भव्यता में उनके सारे गीत न जाने कहां खोकर रह जाते हैं । याद रहता है सिर्फ ‘प्रेम रतन धन पायो’ जो शीर्षक गीत है ।

क्यों देखें
फंतासी से भरपूर साफ सुथरी पारिवारिक फिल्म देखने वाले दर्शक इस फिल्म को पूरे परिवार के साथ देखेंगें तो फिल्म देखने में और ज्यादा आनंद आयेगा,लेकिन यूथ फिल्म से शायद ही जुड़ पाये।


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Mayapuri

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