‘‘पढ़ी लिखी लड़की है, घाघरा कुर्ता तो नहीं पहनेगी न’’- सीमा विश्वास

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बेंडिड क्वीन के बाद सीमा विश्वास ने फिल्में तो की लेकिन बहुत कम । यहां उनका कहना है कि मैं हर फिल्म में फिट नहीं हो सकती । दूसरे मैं वही फिल्म करना पसंद करती हूं जो कुछ कहना चाहती हो । वरना मैं थियेटर में बहुत खुश हूं  । उनकी आने वाली फिल्म का नाम है ‘ जय हो डेमोक्रेसी’ । इस फिल्म के अलावा कुछ सवालों को लेकर उनसे एक मुलाकात ।

आपने हाल ही में कौन सी फिल्म में काम किया था ?
आप गलत सवाल कर रहे हैं। आपको पूछना चाहिये कि मेरी कौन सी फिल्में हैं जो पिछले दिनों रिलीज हुई ? चलिये सवाल भी मेरा और जवाब भी मैं ही दे रही हूं । मैने इससे पहले दो साउथ की फिल्में की, एक ममूटी के साथ दूसरी सलीम कुमार के साथ । इसके अलावा हिन्दी में चार फुटिया छोकरे तथा मंजूनाथ आदि फिल्में रिलीज हुई तथा एक अमेरिकन फिल्म ‘ सोल्ड’ भी पिछले साल ही रिलीज हुई ।

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इन दिनों आप जम कर थियेटर कर रही हैं ?
हां जी । पता नहीं क्यों थियेटर करने में इतना मजा आ रहा है कि पिछले तीन सालों में मुश्किल से मुबंई में मैं पचास दिन भी नहीं रही  । पिछले दिनों ऑल इडिंया गांव गांव में जाकर इतना थियेटर किया कि इतना तो एन एस डी के लिये भी विजिट नहीं की थी । हर जगह डेडीकेटिड  तथा थॉटफल रंगकर्मी मुझे देखकर इंसपायर हो रहे थे और में उन्हें देखकर ।
 क्या आप किसी ग्रुप में शामिल हैंं ?
नहीं मैं किसी ग्रुप में नहीं हॅं बल्कि मेरा खुद का थियेटर गु्रप है जिसका नाम जगमीरा है । जंहा मैं  सोलो परफार्म करती हूं । मेरे अलावा ये  तीन चार लोगों का छोटा सा ग्रुप है ।

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 आपने अपने नाटकों  द्वारा क्या कुछ कहा ?
मेरे नाटक संदेशात्मक होते हैं उनमें ओरतों की अवरनेस के बारे में ज्यादा बातें होती है । हम नाटक करने के बाद भी स्थानीय लोगों के  साथ घंटों कितनी ही बातों को लेकर सलाह मषवरा  करते थे । हमारे साथ कितनी ही बुर्जग ओरतें अपनी बात खुल कर कह जाती थी । ओरतों की समस्याओं को लेकर हम कितने ही जिम्मेदार लोगों के साथ चर्चा करते रहते थे । एक बार  एक गांव में एक महिला ने बताया कि उसकी बेटी जीन्स और कुर्ता पहन कर बाहर निकलती है तो उसे बाकायदा छेड़ा जाता है । वह पढ़ी लिखी लड़की है तो अब वो घाघरा कुर्ता तो नहीं पहनेगी । ऐसी ही ढेर सारी बातों को लेकर हमारा खूब डिस्कशन होता था । मैं खुश हूं  कि ओरतों को लेकर हमारे ढेर सारे सुझावों पर लोगों ने अमल करने का वादा किया ।
आपकी नजर में यह फिल्म क्या कहना चाहती है ?
दरअसल ये एक पॉलीटिकल सटायर है । आज के हालातों को हल्के फुल्के फनी तरीके से दिखाया गया है ये सब देखते हुये हंसते हंसाते आपको भी लगता है कि आज हर तरफ यही तो हो रहा है । लेकिन हमने किसी राजनैतिक पार्टी या किसी नेता को टारगेट नहीं बनाया । बल्कि देश के नेताओं की मानसिकता और आज के हालात के बारे में हास्य के रूप में दिखाने की कोशिश की है । इसी के साथ ही यहां सोषल ह्यूमन को लेकर मैसेज  है ।

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अपनी भूमिका के बारे में क्या कहेगीं  ?
मैं विपक्ष की नेता हूं । किसी खास मुद्दे को लेकर सारे राजनैतिक पार्टीयों के नेता जमा जमा हुये हैं। जिस प्रकार किसी मुद्दे को लेकर पक्ष विपक्ष संसद में सब नेता इक्कटठे होते है । यहां भी ऐसा ही है लेकिन यहां मुद्दे को छौड़ सब आपस में एक दूसरे पर जूता उछाल रहेे है । जैसा कि आज संसद में आम होता दिखाई देता है।
 आपके अलावा और कौन कौन कलाकार हैं ?
ऐसा पहली दफा हुआ है जब एक साथ एन एस डी के इतने सारे आर्टिस्ट एक फिल्म में काम कर रहे हैं जैसे ओम पुरी, अनु कपूर, सतीश कौशिक, मुकेश तिवारी, आदिल हुसॅन तथा बेन्जामिन गिलानी आदि सभी पॉलीटिकल नेता है तथा कुछ कलाकार दिल्ली और पंजाब के रंगमंच से लिये गये हैं ।
ऐसी फिल्मों का दर्षक पर प्रभाव पड़ता है?
क्यों नहीं । बिलकुल फर्क पड़ता है । आप इसे छोड़िये, आज मीडिया बहुत स्ट्रांग हो चुका है, इसलिये काफी सारा काम तो वही कर देता है । दूसरे कुछ ऐसी फिल्में है जो बहुत ही असरदार ढंग से अपनी बात कहती है, दर्शक भी उन बातों पर सोचता है ।
 रंजीत कपूर थियेटर का जाना माना नाम है जिनके नाम ढे र सारी बड़ी फिल्में हैं जो उन्होंने लिखी हैं । उनके साथ काम करना कैसा रहा ?
बहुत कम लोगों को पता है कि मैने उनके साथ बहुत काम किया है । एनएसडी में वह मेरे पंसदीदा निर्देशक रहे हैं । उनके नाटक  ‘खपसूरत बहू’ में मैं लीड रोल करती थी ।  उसी नाटक को देख  शेखर कपूर ने मुझे ‘बेंडिड क्वीन’ में फूलनदेवी की भूमिका के लिये कास्ट किया था ।
 थियेटर में ज्यादातर लाउड अभिनय किया जाता है आप इस बात से किस हद तक सहमत है ?
मैने हमेशा स्वाभाविक अभिनय को ही प्राथमिकता दी है । लेकिन ऐसा भी नहीं है कि थियेटर एक्टर लाउड एक्टिंग ही करते हैं। लाउड भी किया जाता है लेकिन वहां कंविन्शन, थॉट और सोच की जरूरत होती है । लाउड का मतलब यह भी नहीं कि आप  चिल्ला चिल्ला कर डायलॉग बोले ।
 टीवी के बारे में आपका क्या सोचती हैं ?
यहां सबसे पहले अपनी गुरू सुरेखा सीकरी जी की बात करना चाहूंगी, क्योंकि मैं उन्हीं से इंसपायर एक्टर हूं । मैं जब एक्टिंग के गुर सीख रही थी, तब  उन्हें अभिनय करते हुये देख सोचा करती थी कि काष मैं भी कभी उनके जैसा अभिनय कर पांउगी । इसमें कोई दो राय नहीं कि टीवी पर जो भी बदलाव आया है उसमें उनका बहुत बड़ा हाथ हैं क्योंकि उन्होंने टेलीवीजन पर एक्टिंग की परिभाषा बदल दी है।


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