स्व.बी.आर चोपड़ा की पुण्यतिथि पर खासः

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‘‘स्व. बी आर चोपड़ा साहब जितने बेहतरीन निर्देशक थे,उतने ही बेहतरीन इंसान थे..’’

-रेणुका इसरानी,‘महाभारत’की गांधारी

22 अप्रैल 1914 के दिन ब्रिटिष षासन के दौरान वर्तमान में पाकिस्तान के राहोन में जन्में पद्मभूषण और दादा साहेब फालके अवार्ड से सम्मानित फिल्मकार स्व.बलदेव राज चोपड़ा उर्फ स्व.बी आर चोपड़ा का 94 वर्ष की उम्र में मुंबई में देहान्त हुआ था.बी आर चोपड़ा ने अपने कैरियर की षुरूआत 1944 में लाहौर में बतौर फिल्म पत्रकार की थी.वह लाहौर में ही ‘‘अरोड़बंस प्रेस’’में नौकरी की थी,बाद में 1974 में इसी प्रेस ने ‘मायापुुरी’ साप्ताहिक फिल्म पत्रिका का प्रकाषन षुरू किया.1947 में देष के बंटवारे के वक्त वह लाहौर से दिल्ली और फिर मुंबई आ गए मुंबई में उन्होने फिल्म निर्माण व निर्देषन के क्षेत्र में कदम रखा.उन्होेने एक ही रास्ता’,‘गुमराह’,‘नया दौर’, ‘साधना’,‘धूल का फूल’,‘कानून’,              ‘धुंध’, ‘इत्तेफाक’,‘इंसाफ का तराजू’, ‘निकाह’और ‘बागवान’जैसी विचारोत्तेजक फिल्में और ‘महाभारत’ जैसा धारावाहिक बनाया.आज वह हमारे बीच नही है.आज उनकी 106 वीं पुण्यतिथि है.ऐसे मौके पर स्व. बी आर चोपड़ा के धारावाहिक ‘‘महाभरत’,जिसका पुनः प्रसारण इन दिनों दूूरदर्षन के ‘भारती’चैनल पर हो रहा है,में गांधारी का किरदार निभाने वाली अदाकारा रेणुका इसरानी से जब हमने एक्सक्लूसिब बात की,तो उन्होने स्व.बी आर चोपड़ा को याद करते हुए ऐसा कुछ कहा,जिसे ‘‘मायापुरी’’के पाठकों को जरुर जानना चाहिए..
आपको ‘‘महाभारत’’में ‘‘गांधारी’’ के किरदार में काफी पसंद किया गया था.किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली थी?आपके अभिनय को लेकर बी आर चोपड़ा की क्या राय थी?
-लोगों हमेशा इस बात की तारीफ की कि मैंने गांधरी जैसा किरदार सषक्त ढंग से निभाया.यह बहुत ही कठिन किरदार था.क्योंकि गांधारी की आंखों पर पट्टी थी.फिर भी उसके  एक्सप्रेशन से दर्षकों को पता चलता है कि वह क्या बोलना चाह रही है. गांधारी क्या बोलना चाह रही है,इसे वह अपने हाव भाव से आँखों में पट्टी बंधी होने के बावजूद व्यक्त करती है और दर्षक महसूस करता है कि गांधरी के अंदर क्या चल रहा है.तो यह मेरे लिए एक बहुत बड़ा  कंप्लीमेंट था.मेरे लिए यह एक तरह का रिकॉर्ड था.लेकिन आज हमारे बीच बी आर चोपड़ा साहब नही हैं,पर मुझे अभी भी याद है,इसके लिए बी आर चोपड़ा साहब ने मुझे जो रिवॉर्ड दिया था.यह रिवार्ड मिला था,पुनः प्रसारित हो रहे ‘महाभारत’में 20 अप्रैल को प्रसारित द्रौपदी चीर हरण के बाद का दृष्य.जब गांधारी,द्रौपदी को श्राप देने से रोकती है.यह दृष्य हर कलाकार और निर्देषक
के लिए भी चुनौतीपूर्ण था.धारावाहिक ‘महाभारत’का सबसे महत्वपूर्ण सीन है.इसमें मेरा डेढ़ दो पेज का लंबा सीन था.
मैं मेकअप रूम में बठकर रिहर्सल कर रही थी.मुझे नहीं पता था कि बाहर सेट पर क्या हो रहा है? मुझे तो एकदम से आकर अपना संवाद बोलना था.तो मुझे कुछ भी नहीं पता था कि वहां क्या हुआ है? किस तरह से शूटिंग हुई है.कैसे और किस एंगल पर कैमरा लगा हुआ है.मगर मुझे पटकथा पता थी.मैंने अपने दृष्य की षूटिंग की.उसके दो-तीन दिन के बाद जब मैं बी आर चोपड़ा साहब के ऑफिस गई,तो वहां महफिल जमी हुई थी.स्व.बी आर चोपड़ा,स्व.रवि चोपड़ा,डाॅं राही माससूम रजा,पं.नरेंद्र षर्मा और कुछ पत्रकार भी बैठे हुए थे.जैसे ही मैं अंदर घुसी,बी आर चोपड़ा साहब एकदम से खड़े हो गए और उन्होंने सीटी बजाकर मेरा स्वागत किया.उनके इस रवैए से मैं एकदम हैरान हो गई,वैसे उनका स्वभाव ऐसा ही था.वह कलाकार की प्रसंशा करने में कभी भी कंजूसी नही बरतते थे. खैर,फिर उन्होेने मुझेे अपने पास बुलाया और मेरे सिर पर बी आर चोपड़ा साहब ने बड़े प्यार से हाथ फेरा.उसके बाद मुझसे कहा-‘‘यह जो एपीसोड है,जिसे तुमने शूट किया है,यह पहले चीरहरण के साथ वाला एपीसोड था.लेकिन तुम्हारी जबरदस्त परफार्मेंस के चलते हमने इसे अलग एपीसोड बना दिया है.यह हमााी तरफ से तुम्हारे लिए रीवार्ड है.क्योंकि तुमने इतना अच्छा शॉट दिया है.’’
मुझे अभी भी याद है कि इस दृष्य में एक जूनियर आर्टिस्ट था,जिसका नाम मुझे अभी याद नहीं आ रहा,पर उसने मेरे साथ विनोद पांडे के सीरियल ‘रिपोर्टर’ में भी काम किया था और उसमें वह टैक्सी ड्राइवर बना था.वह कई दिग्गज कलाकारों के साथ काम कर चुका था.रात में हम लोग कमालिस्तान स्टूडियो में शूटिंग कर रहे थे.तब उसने मुझे कहा-‘‘मैडम,मैं आपके साथ चीरहरण वाले दृष्य में था.मैं तकरीबन 12 बहुत बड़े बड़े एक्टरों के साथ भी काम कर चुका हूं.लेकिन मैंने अपनी जिंदगी में एक शॉट इस तरह का नहीं देखा.’’मैने कहा कि इसे तो रीटेक भी किया गया था.इस पर उसने कहा-‘‘आपको नही पता, मगर आपकी जबरदस्त परफार्मेंस में निर्देषक रवि जी भी इतना मगन हो गए थे कि वह ‘कट’करना भूल गए थे,इसलिए उन्हें फिर से रीटेक लेना पड़ा था.’’फिर मुझे याद आा कि इस दृष्य को करते समय मेरी ‘नोज पिन’गिर गई थी,जिसे मैंने अपने हाथों से बनाई थी.तो मैंने कहा था कि जब तक मुझे मेरी ‘नोज पिन’नहीं मिल जाती,मैं रीटेक नही दूँगी मैं दूसरी नोज पिन लगाकर सीन नही करना चाहती थी.मेरा अपने द्वारा बनायी गयी ‘नोज पिन’ही नही कहीं ना कहीं मुझे अपनी हर छोटी ना छोटी चीज से चीज से जुड़ाव था कि मेरा गांधारी का जो करैक्टर है,उसमें मुझे यह सारी चीजें इस्तेमाल करनी हैं. खैर,दस पंद्रह मिनट बाद पंकज धीर ने वह नोज पिन मुझे कहीं से ढूंढ कर दी.उसके बाद वह सीन रीटेक हुआ.इस दृष्य में सभी कलाकार, यहाँ तक कि जूनियर आर्टिस्ट भी  रो रहे थे.अब न तो बी आर चोपड़ा साहब हैं और न ही फिर से उस तरह का माहौल आएगा.
स्व बी आर चोपड़ा से जुड़ी कोई दूसरी घटना?
-स्व. बी आर चोपड़ा सिर्फ बहुत बड़े और उत्कृष्ट निर्देषक ही नही बल्कि उससे भी अधिक व बेहतरीन  इंसान थे.उनको पता था कि उन्हें कलाकारों से कैसे अच्छा काम करवाना है.मैं तो ‘‘महाभारत’’के समय एक नई कलाकार थी.‘हम लोग’के बाद यह मेरा दूसरा धारावाहिक था.मगर चोपड़ा साहब जानते  थे कि नए कलाकारों को कैसे प्रोत्साहित किया जाता है.
‘‘महाभारत’के सेट पर मैं सहायक निर्देषक से एक दिन पहले पूछ कर अपने घर पर रात में उस सीन की तैयारी कर लेती थी.मेेर घर पर महाभारत ग्रंथ था,जिससे मैं उस सीन के बारे में पढ़ती थी कि कैसे क्या हुआ है.और आवष्यक होमवर्क कर लेती थी.एक सीन के लिए मैं होमवर्क करके गयी थी और मैने सोच लिया था कि गांधारी इस तरह से बैठेगी.इस तरह से वह सोचेगी.और वह अपने कमरे में खुद से बात कर रही है.मगर जब मैं सेट पर गई,तो मैने देखा कि बी आर चोपड़ा साहब ने षाट इस तरह से लगाया था और कैमरा लगाया हुआ था,जिसमें गांधारी पलंग पर लेटी हुई है और वह सोच रही है,अपने आप से बातें कर रही है.मतलब मैने जो सोचकर गयी थी और जिस तरह से षाॅट लगा हुआ था,उसमंे बहुत बड़ा अंतर था.बतौर कलाकार मेरी तो हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि मैं अपनी सलाह दे सकूं.पर पता नही मेेरे अंदर क्या हुआ कि मैंने हिम्मत जुटा कर चोपड़ा साहब से बात की.मैंने उनसे कहा कि गांधारी यदि इस तरह बैठ जाए,तो कैसा रहेगा?चोपड़ा साहब ने मुझे कोई जवाब नही दिया और कैमरामैन स्व.धर्म चोपड़ा जी से कहा कि शॉट बदल दो.धर्म जी ने मेरी सोच के अनुरूप पुनः दस मिनट के अंदर पूरा शॉट,पूरा कैमरा एंगल बदलकर लगवाया.फिर जिस तरह से मैने सोचा था,उसी तर हसे वह दृष्य फिल्माया गया.यह बी. आर.चोपड़ा साहब का अपना बहुत बड़ा बड़प्पन था.वह एक एक्टर को कैसे प्रोत्साहित किया जाता है,यह समझते थे.इस दृष्य को लेकर हो सकता है कि उनका सोचना मुझसे बेहतर रहा होगा,पर उन्होंने मेरे हिसाब से उसको फिल्माकर न सिर्फ मेरा हौसला बढ़ाया,बल्कि मुझ पर अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि वह आज नही है,मगर ‘महाभारत’देखते समय मुझे बार बार उनकी याद आती है.आज भी मेरे मन में उनके लिए बहुत बड़ी इज्जत है.मैं इस घटना का बार बार जिक्र करती हूँ उन्होंने अपने आप को एक सफलतम निर्देशक बताने की बताय एक नए नवेले कलाकार के लिए दृष्य बदलवा दिया था.आज उनके जैसा निर्देशक और इंसान कहां है?उस दिन उन्होने पूरा सेट सिर्फ मुझे प्रोत्साहित करने के लिए बदलवा दिया था.

सुना है कि आपके आंखों पर पट्टी को लेकर भी बी आर चोपड़ा साहब ने कुछ कहा था?
-जी हाॅ!शायद उस दिन उन्होने मजाक किया होगा.एक दिन हम लोग बी आर चोपड़ा साहब के आफिस में बैठे हुए थे.तभी वहां कुछ पत्रकार आ गए.उन पत्रकारों ने मुझसे  पूछा था कि आंखों पर पट्टी क्यों बांधी है?तो मैंने कहा कि यह बात आप चोपड़ा सर से ही पूछिए,क्योंकि वही निर्माता व निर्देषक हैं.पता नही इन्होने मुझमें ऐसा क्या देखा कि मुझे पट्टी वाला किरदार दिया.तब चोपड़ा साहब ने जवाब दिया था,अब वह मजाक में था या नहीं,यह नही कह कहती.पर उन्होेने जवाब दिया था कि,‘इनकी आंखें बहुत खूबसूरत हैं.’पर मुझे लगा कि ‘महाभारत’’में एक दृष्य में गांधारी अपनी आंखो की पट्टी हटाकर दुर्योधन को देेखकर षक्ति देती है.तो हम दर्शकों के लिए एक सस्पेंस भी रखना चाहते हैं.इस पट्टी के पीछे उनकी गांधारी की आँखे कैसी हैं यह दर्शकों के लिए सस्पेंस है,यह बात भी हो सकती है.
शान्तिस्वरुप त्रिपाठी

 


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