सुभाष घई से खास मुलाकात.. ‘द गेम इज चेन्जिंग’ ‘जुनून और दवाब एक साथ काम नहीं कर सकते है’

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सुभाष घई (पैंतीस साल के पश्चात् आज भी शो मैन के नाम से जाना जाता है) ने जैसा चाहा था वैसा कुछ हुआ नहीं। वह चाहते तो अपने साथी फिल्म मेकर्स की तरह फिल्में बनाते रह सकते थे लेकिन वे समझ गये कि फिल्म मेंकिग का सारा ट्वेल बदल रहा है और वे तब मौका लेना चाहते थे जब उनके मन अनुसार फिल्म बनाने का वक्त आ जाये, जैसा उन्होने पहले किया था जब उन्होनें ‘हीरो’, ‘राम लखन’, ‘कर्मा’, ‘टबल खलनायक’, ‘ताल जैसी अलग-अलग जाॅनर और तरह-तरह की फिल्में बनाई थी जो सुपर हिट तो थी ही, साथ ही जिसपर सुभाष घई की मोहर लगी थी, जिसने उन्हें सिनेमा जगत में वह जगह दी जो कोई व्यक्ति, कोई इतिहास, कोई वक्त उससे छीन नही सकता, सुभाष घई जो ‘एस जी’ के नाम से फिल्म इंडस्ट्री में, उनकी स्थापित फिल्म मेकिंग प्रशिक्षण केन्द्र के छात्रो द्वारा जाने और पुकारे जाते है पिछले दस वर्षो से रिलैक्स्ड नहीं है, वे बताते है कि यह वक्त था जब उनके सेट पर बोझ के पहाड़ थे। परेशानियां वहां से शुरू हुई जब उनका सपनों का स्कूल है जिसे उन्होने उतने ही प्यार और पैशन के साथ बनाया था, कई तरह के लीगल प्रेशर्स की चपेट में आ गई। कईबार तो उनके सबसे सकारात्मक प्रशंसकों ने भी उनके उस स्कूल ‘वुड्स’ के डूबने की आशंका जताई और इस तरह उनके सपनों को चूर चूर बताया। यह वो वक्त भी था जब काॅर्पोरेट जगत में फिल्म इंडस्ट्री को टेक ओवर करने की धमकी दे डाली थी, चन्द मुट्ठी भर सूट और टाई पहने लोग जिन्हें फिल्म मेकिंग के विषय में कोई ज्ञान ही नहीं था वे इतराते फिरते और हमारे फिल्म इंडस्ट्री के ज्ञानी गुणी फिल्म मेकर्स जैसे ऋषिकेश मुखर्जी, रमेश सिप्पी को डिक्टेट करने और उन्हें पहचानने से भी इंकार करते हुए उन्हे अपनी आॅफिस की खूबसूरत रिसेप्शनिब्ट द्वारा तब लाॅबी में इंतजार करने का हुक्म भिजवाते जब वे उनसे मीटिंग करने आते थे।

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यह कार्पोरेट लोग सिर्फ एक भाषा समझते थे वह थी पैसे की भाषा। उन्हें लगा कि वे अपने पैसों के बल पर फिल्म इंडस्ट्री की सूरत ही बदल सकते है और इंडस्ट्री को सर के बल खड़ा कर सकते है। उन्हें पूरा विश्वास था फिल्म इंडस्ट्री के हर एक पहलू पर, लेखक, निर्देशक, टेक्निशियनं यहां तक की चोटी के सितारों को भी खरीद सकते हैं, ऐसा तगता था कि उन्हीं के आदेश फाइनल है, उन दिनों के कुछ सितारे, जो इन काॅर्पोरेटस् के टटू बन गये थे वे स्टार्स भी इन काॅर्पोरेट के दम पर अपना भाव दिखाने लगें, और अपनी मनमर्जी से फिल्म के कास्ट, क्रू डायरेक्टर, प्रोडयूसर यहां तक की कहानी में भी फेर बदल करने की जिद करते थे। एस जी (सुभाष घई) वह प्रथम फिल्म मेकर थे जिन्होने इन सब अत्याचारों और हस्तक्षेपों के खिलाफ आवाज उठाई थी और जब उन्हे यह एहसास हो गया कि अब लबें समय तक हालात बदलने वाले नही है तो उन्होंने अपने फिल्म मेकिंग से एक लंबा ब्रेक लेलिया। इसी उहापोह के दौरान उन्होंने ‘किसना’,‘ब्लैक’, एण्डव्हाइट युवराज कांची जैसी फिल्में बनाई थी, उन्हे इन फिल्म मेकिंग के दौरान यह एहसास होने लगा कि उसका मन नहीं है इन्हें बनाने में। उस दौर के बारें में बात करते हुये शोमैन सुभाष जी बताते है, ‘बतौर फिल्म मेकर वह दौर मेरे जिन्दगी का सब से खराब और घनघोट अंधेरे वाले दिन थे, मैं अपने मन के उस फ्रेम में नहीं था जो फ्रेम में पहले था जब मैं अपनी मन की फिल्में बनाता था द विसलिंग वुडस का मामला मेरे सर पर भारी था, मै लायर्स, एडवाइसर्स, गवनमेन्ट आॅफिशिपल्स से हर वक्त घिरा रहता था और कोर्ट के चक्कर काटता रहता था यह हरगिज वैसा माहौल नहीं था जैसा मेरी तरह पैरानेट फिल्म मेकर को मिलना चाहिए फिल्मे बनाने के लिए जो मेरी जिंदगी का हिस्सा था, मेरे कैरियर का हिस्सा था मै समझ गया कि सुभाष घई (यानी मैं) के साथ कुछ जरूर गलत हो रहा है और ना मेरे पास वक्त था ना इच्छा थी कि इन बातों की गहराई तक जाऊं।

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मै समझ गया कि मेरे मन पर इन बातों को विनाशकारी असर पड़ चुका है जब मैं ‘कांची’ बना रहा था, फिल्म बनाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि ऐसी मनःस्थिति में मैंने फिल्म बनाई ही क्यों जिसके प्रति मेरी दिलचस्पी फिल्म पूरी होने के पहले ही खत्म हो गई। लगातार फ्लाॅप होती मेरी फिल्मों का कारण कोई समझ नहीं पाया, लोगों ने यह सोचे बिना कि उस दौरान मैं मेन्टली, क्रियटिवली, फाइनेन्शियली किस बुरे दौर से गुजर रहा था, आसानी से कहना शुरू कर दिया ‘सुभाष घई’ का खेल खत्म हो चुका है मै उन लोगों का शुक्रगुजार हूं खासकर मेरे परिवार का जो उस बुरे दौर में भी मेरे साथ खड़े थे। वक्त लगा, कुछ मुद्दे मैंने खो भी दिए लेकिन कुछ कुल मिलाकर न्याय के लिये मेरी लम्बी लड़ाई और उसे जीतना, इन प्रक्रियाओं ने मुझे एक मजबूत और समझदार इंसान बना दिया है। अब वही मजबूत और समझदार शो मैन अपने ड्रीम कम ट्रू प्रोजेक्ट को और ज्यादा शानदार बनाकर विश्व के दस सर्वश्रेष्ठ फिल्म मेकिंग स्कूल का रूप देने के प्रति काम कर रहा है अब सुभाष घई अपना ज्यादातार वक्त अपने स्कूल के छात्रों, फैकल्टी के साथ इंटर-एक्शन में बिताते है जो उनके अनुसार उन्हें शिक्षा देते हुए खुद भी नये वक्त के नये शिक्षाओं से अवगत होने का मौका देते है, उन्होंने जो पांच वेदों को विस्लिंग वूडस के करिकुलम में शामिल किया है वह बहुत ही उत्साह पैदा करने वाला बन पड़ा है।

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‘क्या सुभाष घई कोई फिल्म निर्देशित करेंगे?’ यह पूछने पर वे कहते है, ‘यह तो वह बात हुई कि किसी को पूछा जाय कि उन्हें सांस लेना पसंद है या नहीं’ फिल्मों ने ही दिल्ली से आये हुये एक लड़के को तो बना दिया जो वह आज है फिल्में मेरी जिन्दगी है मैंने तो सिर्फ फिल्मों के बारे में सोचा, फिल्मों को जीया, ओढा, सांस लिया उस पर काम किया है जीवन भर, मैं तो सिर्फ सिस्टम के अनुसार काम कर सकता हूं और उन बैल्यूज के अनुसार जिन्हें मै पिछले पैंतीस वर्षो से फाॅलो कर रहा हूं और मुझे नहीं लगता कि मैं अपने जुनून के साथ किसी भी प्रेशर में काम कर सकता हूं। जो एक चीज काॅरपरेट ने आकर मुझे सिखाई है वह यह है जुनून कभी प्रेशर के तहत काम नहीं कर सकता। सुभाष घई आज उसी पहले वाले जोश, ऊर्जा और एन्थुसियाज्म महसूस कर रहा है और वे कहते है कि आज भी वे वैसा ही सोचने के काबिल है जैसा उस वक्त सोचते थे जब वे युवा थे और आसमान की ऊचांई पर थे और वे आने वाले कल के निर्देशक की तरह भी सोच रख सकते है, यदि उनका एग्जिस्टेन्स कोई मायने रखे तो, उन्होंने उन कई विषयों पर काम करना शुरूकर दिया है जिनपर भविष्य में वह स्क्रिप्ट लिखने की सोच रहे है, पर यह सबकुछ उनके अपने को चुनौती देने की योग्यता पर निर्भर करेगा। कि वे अपने आप से मुकाबला करे, और विजेता साबित हो बतौर एक फिल्म मेकर जो कि फिर से ऐसी फिल्में बना सके जो बीस साल बाद फिर से रीमेड होने की ताकत रख सके (उनकी दो क्लासिक फिल्में हीरो तथा राम लखन फिर से रीमेड हो रही है) उन्होंने डब्लू डब्लू आई के लिये, ‘लव व्हाट यू डू’ मोटो रखा है और यह कहते हुये उन्हें गर्व है कि यही मोटो उनका जीवन भर रहा है जो उनका पथ प्रदर्शक रहा है और इन्हें यहां तक ले आया है और उन्हें विश्वास है यही मोटो उन्हे आसमान की ऐसी ऊंचााई तक ले जायेगा जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।


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Mayapuri

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