सुनील दत्त की फिल्मों में जिंदगी

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मायापुरी अंक 01.1974

 

वक्त कितनी जल्दी बदल जाता है और विषम परिस्थितियों में भी चट्टान जैसी दृढ़ता का परिचय देने वाले किस प्रकार अपने भाग्य का निर्माण करते है इसका सबसे ताजा उदाहरण सुनीलदत्त है। कौन जानता था कि अंधेरे की गुफा में कैद सुनीलदत्त फिर यकायक फिल्माकाश पर चमकने लगेगा। लगातार बॉक्स ऑफिस पर पिटती हुई फिल्मों ने सुनीलदत्त को कही का नही छोड़ा था। उvकी स्वयं की फिल्में ‘रेशमा और शेरा’ तथा एक प्रयोगात्मक नायिकाहीन चित्र ‘यादें’ को बुरी तरह असफलता का मुंह देखना पड़ा। ‘रेशमा और शेरा’ एक कलात्मक एवं सुन्दर चित्र था जो दर्शकों को पसन्द नही आया और जिसकी असफलता ने दत्त साहब को बुरी तरह झंझोड़ कर रख दिया। आर्थिक संकटों में घिर कर भी सुनीलदत्त ने धीरज नही खोया। उनका आत्मविश्वास रह-रह कर उन्हें आगे और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहा और वे अनेकों रचनात्मक योजनाओं को क्रियान्वित करने में संलग्न हो गए। जो निर्माणाधीन फिल्में थी उनके प्रति पूर्ण सतर्कता बरतने लगे और प्रयास करने लगे कि उनके आसपास फैला हुआ अंधेरा कम हो जाए।

अंधेरा कम हुआ और सुल्तान अहमद का ‘हीरा’ उन्हें रास आ गया। ‘हीरा’ फिल्म की सफलता ने फिल्मोद्योग में सुनीलदत्त की वापसी की घोषणा कर दी। ‘प्राण जाये पर वचन जाये’ और ‘गीता मेरा नाम’ फिल्मों की सफलता ने भी सुनीलदत्त के आस-पास फैला हुआ अधेंरा कम कर दिया। एक प्रकार से सुनीलदत्त को अब फिल्मों में नई जिंदगी मिली है। उनकी खोई हुई लोकप्रियता फिर से लौटी है।

एक साथ मिली इस अपार सफलता से किसका दिमाग खराब नही होता। पिछले दिनों एक निर्माता ने सुनीलदत्त को अपनी कहानी सुनाने का आग्रह किया। सुनील ने कहा कि वह बेहद व्यस्त है। कहानी सुनने की उनके पास फुर्सत नही है, हां, वह एक काम कर सकता है कि निर्माता महोदय उन्हें अपनी कहानी मुंबई से कलकत्ता के हवाई सफर में सुना दें। सुनीलदत्त को एक अन्य निर्माता की शूटिंग के लिए कलकत्ता जाना था इसलिए उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। सुनीलदत्त को अपनी कहानी सुनाने का इच्छुक निर्माता इस बात के लिए सहमत हो गया और उसने स्वयं अपने सहित कहानी लेखक और निर्देशक की सीटें भी उस सफर के लिए बुक करा दी। सुनीलदत्त ने हवाई जहाज में कहानी सुनी और कहा कि उसे कहानी पसन्द नही आई। बेचारे निर्माता का इस यात्रा में क्या कुछ खर्च नही हुआ होगा आप अनुमान लगा सकते है। इससे तो अच्छा होता कि सुनीलदत्त उस कहानी को अपने स्टोरी डिपार्टमेंट के विचारार्थ भेज देते। अपने अंधेरे समय में सुनीलदत्त ने जिस धैर्य और दृढ़ता का परिचय दिया है, जैसे संतुलन उन्होंने उस समय बनाए रखा वैसा ही उन्हें इन खुशी के दिनों में भी चाहिए। ज्यादा फल से लदा हुआ वृक्ष नीचे को ही झुकता है और सुनीलदत्त से इसी की अपेक्षा है

सुनीलदत्त स्वयं एक फिल्म बना रहे है ‘नहले पर दहला’ इस फिल्म की नायिका सायराबनो है। दत्त साहब ने इस चित्र के निर्देशन का भार राजखोसला को सौंपा है यद्यपि वे चाहते तो स्वयं भी निर्देशन कर सकते थे। सुनीलदत्त ने सायरा को ग्लैमरस और सैक्सी रोल में प्रस्तुत किया है। कहने वालों का कहना है कि ‘नहले पर दहला’ बॉबी से भी एक कदम आगे है और उसकी हर वितरक अधिक से अधिक गारन्टी देने को उत्सुक है।

सुनीलदत्त का स्वयं का जीवन अत्यन्त संघर्षपूर्ण रहा है। विभाजन से पहले झेलम नदी के तट पर स्थित एक छोटे से कस्बे झेलम में सुनीलदत्त का जन्म हुआ। लगभग 6 वर्ष की आयु में ही वे मातृ स्नेह से वंचित हो गए। सुनीलदत्त ने वे दिन भी गुजारे है जब कि वे मुंबई की फुटपाथ पर खाली पेट सोते थे और उनके पास पहनने के लिए पर्याप्त वस्त्र तक न थे। आज भी जब सुनीलदत्त को उन दिनों की याद आती है तो वे सिहर उठते है। उनका अतीत रह-रह कर उन्हें झकझोर देता है। अभी भी ‘हीरा’ फिल्म के प्रदर्शन से पूर्व जब वे निराशा के कुहासे में घिरे थे तो उन्होनें ‘मन जीते जग जीता’ जैसी फिल्में भी अपनाई और अपने बंगले में स्थित डबिंग थियेटर के किराए से काम चलाया।

आज सुनीलदत्त की मांग फिर पहले जैसी है। एक से एक नई भूमिका में वे अवतरित हो रहे है हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी हीरोइन सुनीलदत्त के साथ अभिनय करने को लालायित है सायराबानो, प्रवीन बॉबी, राधा सलूजा, मल्लिका साराभाई, प्रेमनारायण और जरीना वहाब उनकी आगामी फिल्मों की हीरोइनें है। सुनीलदत्त को चाहिए कि अब कम फिल्मों में व्यस्त रहकर प्रभावशाली अभिनय करें क्योंकि उन्हें पता है कि आदमी को हमेशा वक्त से डर कर रहना चाहिए। इस वक्त का मिजाज न जाने कब बदल जाये किसे पता है?

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Mayapuri