मूवी रिव्यू: नये अंदाज की थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री फिल्म ‘तीन’

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रेटिंग***

निर्देशक रिभू दासगुप्ता की फिल्म ‘तीन’ एक थ्रिलर मर्डर मिस्ट्री है कोरियन फिल्म ‘मोंटास’ से प्रेरित ये अन्य इसी जॉनर की फिल्मों से कतई अलग है। क्योंकि न तो यहां बदला है और न ही रोमांच। हर बात में वास्तविकता दर्शाने वाली इस फिल्म में एक हद तक सब ओरिजनल दिखाई देता है।

कहानी

जॉन बिसवास यानि अमिताभ बच्चन पिछले आठ साल से अपनी नाती के अगवा होने और उसके मर्डर की गुत्थी सुलझाने के लिये प्रयासरत है जबकि उस केस से संबंधित पुलिस ऑफिसर मार्टिन यानि नवाजूद्दीन सिद्दिकी अब एक चर्च का फादर बन चुका है और आज भी जॉन से मुंह छिपाता फिर रहा है। अचानक एक बार फिर आठ साल पहले वाला किडनेप दोहराया जाता है बिल्कुल उसी तरह जिस प्रकार आठ साल पहले जॉन की नाती एंजीला का किडनेप और मर्डर हुआ था। इस केस की ऑफिसर विद्या बालन हैं जो मार्टिन से पहले मदद मांगती हैं लेकिन बाद में मार्टिन खुद ही केस में दिलचस्पी लेना शुरू कर देता है। इसके बाद किस प्रकार आठ साल पुराने केस की एक एक करके परतें खुलनी शुरू होती हैं जो असली अपराधी को उजागर करने के बाद ही दम लेती हैं।

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निर्देशन

रिभू दासगुप्ता की सबसे बड़ी खासियत ये रही कि उन्होंने फिल्म बिल्कुल हट कर बनाई है। कोरियन फिल्म ‘मोंटास’ पर आधारित इस फिल्म में थ्रिलर और मर्डर मिस्ट्री होने के बाद भी न तो गति है न ही रोमांच। फिर भी दर्शक फिल्म से जुड़ा रहता है। उन्होंने मुख्य किरदारों को बड़े वास्तिवक अंदाज में पेश किया है। फिल्म में किडनेप और मर्डर है लेकिन उसके लिये बदला नहीं बल्कि इंसाफ पाने की आशा है। बरसों बाद फिल्म में अमिताभ एक अलग लुक में दिखाई दे रहे हैं। कोलकाता की पुलिस उसका काम करने का तरीका तथा पुलिस स्टेशन की गतिविधियां रीयल लगने वाली हैं यही नहीं निर्देशक ने अपने मुख्य किरदार के जरिये कोलकाता की संकरी गलियों, बाजार तथा मुख्य स्थानों के अलावा यातायात को बड़े प्रभावशाली ढंग से दिखाया है। सिपंल सी फिल्म के सिपंल से किरदारों के साथ निर्देशक एक अच्छी फिल्म बनाने में पूरी तरह कामयाब हैं।

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अभिनय

बेशक अमिताभ बच्चन की फिल्मी गैलरी में उनके अलौकिक अभिनय से सजी एक और फिल्म शुमार हो गई है। बरसों बाद वे अपने पारंपरिक लुक को त्याग एक अलग लुक में दिखाई दिये हैं। एक नाना जिसकी अपनी नाती के अंजाम को खुद दोषी मानते हुये असली अपराधी तक पहुंचने की ललक दर्शक को आंदोलित किये रहती है और जब वे असली अपराधी तक पहुंचते हैं तो उससे अपराधी से उसका अपराध कबूलवाने के बाद पूरी तरह से सहज हो जाते हैं। ये सब अमिताभ ही कर सकते हैं। इसके बाद नंबर आता हैं नवाजूद्दीन का। ये एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने बरसों के कठोर संघर्ष में अपने आपको खोने नहीं दिया। उनके अभिनय में इतनी सहजता और मौलिकता है कि वो कहीं से भी एक्टिंग करते नहीं दिखाई देते। विद्या बालन एक पुलिस अधिकारी के तौर पर पूरी तरह से मिसफिट हैं। उनके चेहरे पर एक पुलिस ऑफिसर की कठोरता, दृढ़ता एक बार भी दिखाई नहीं देती। वैसे भी फिल्म में उनका छोटा किरदार है। इनके अलावा कुछ बंगाली कलाकार हैं जो अक्सर हिन्दी फिल्मों में नजर आते रहते हैं उन्होंने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है।

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संगीत

‘हक है मेरा अंबर पे, अपना हक ले के रहूंगा’ जैसा अमिताभ द्वारा गाया तथा क्लिंटन सेरेजो द्वारा संगीतबद्ध किया गया गीत फिल्म में उनके किरदार के बारे में बताता रहता है। इसके अलावा एक दो गीत और हैं जो कहानी का ही हिस्सा हैं।

क्यों देखें

अमिताभ और नवाजू के प्रशंसकों के लिये फिल्म में काफी कुछ है जिसे देखना वे शायद ही मिस कर पायेगें ।

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Mayapuri