रोमांस का वो दौर ‘दिल वाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे’ की धड़कने आज भी जवां हैं, जवां ही रहेंगे, सदा के लिए रहेंगी !

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दिल वाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे’ (2)

95 का वह दौर ही कुछ और था, जब फिल्म मेकिंग में एक वृहद बदलाव की आंधी शुरू हुई थी, उस एक फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के साथ, जो आज भी फिल्म मेकिंग के क्षेत्र में एक मिसाल और टॉर्च बियरर बनकर नए फिल्म मेकर्स को दिशा दिखाती नजर आ रही है, वह दौर एक सपने जैसे था, ना मोबाइल, ना सोशल मीडिया की रेलपेल, ना इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की इतनी पुशअप्स, मैं खुशनसीब हूं कि मैंने उस दौर और ‘दिलवाले दुल्हनिया’ के ऐतिहासिक मेकिंग को अपनी कमसिन आंखों से जाना परखा और उस फिल्म के कई किरदारों से इस बारे में चर्चा भी की थी।

हालांकि इस फिल्म की लगभग पूरी शूटिंग हिस्सों- हिस्सों में ट्राफलगर स्क्वेयर लंदन, साउथहाॅल लंदन, किंग्स क्रॉस रेलवे स्टेशन लन्दन, सेंट मॉरीशस चर्च, सानेंन स्विट्जरलैंड, गस्टाड स्विट्जरलैंड, जंगफ्रॉजोच स्विट्जरलैंड, लेक लुंगरें स्विट्जरलैंड में की गई थी और सिर्फ कुछ एक दृश्य पंजाब तथा बताया जाता है कि सिर्फ एक क्लाईमेक्स दृश्य, (जा सिमरन जा वाला दृश्य) रायगढ़ डिस्ट्रिक्ट ऑफ महाराष्ट्र के पनवेल रोहा रोड में पड़ने वाला आप्ता स्टेशन में शूट किया गया था, लेकिन फिर भी उस फिल्म की मेकिंग के सारे किस्से फिल्म के टीम मेंबर्स द्वारा कुछ इस खूबी से जारी किया जा रहा था वह किसी चलचित्र की तरह सामने घटित होती हुई नजर आती थी, जिसे ढेर सारे मसालों के साथ उन दिनों पत्र-पत्रिकाएं लपक रही थी, एक दिन अचानक मेरी मुलाकात ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के निर्माता यश चोपड़ा के बड़े भाई साहब सुप्रसिद्ध सिनेमाटोग्राफर धर्म चोपड़ा के साथ अंधेरी पश्चिम स्थित ढाके कॉलोनी के एक डेंटिस्ट के क्लीनिक में हो गई।

बातचीत दिलवाले दुल्हनिया की शूटिंग के बारे में उठी तो वे बोले थे, ‘यह फिल्म इतिहास रचने वाली है, एक टिकट के पैसे में आपको विदेश के ऐसे-ऐसे खूबसूरत लोकेशन नजर आएंगे कि पैसा वसूल हो जाएगा और वाकई जब वह फिल्म बन कर रिलीज हुई तो धर्म चोपड़ा की बात अक्षरस सच साबित हुई। 40 मिलियन में बनी यह फिल्म 20 अक्टूबर 1995 को जब रिलीज हुई, तो बॉलीवुड के सारे अनुभवी डाइरेक्टर्स की आँखे खुली रह गई, कि एक चैबीस वर्ष का नौजवान ऐसी फिल्म कैसे बना गया जिसने सिनेमा जगत में मुहब्बत का नया इतिहास रच डाला, कैसे लव स्टोरीज को आधुनिकता के रंग में ढालकर भी भारतीय परम्परा और संस्कृति का दामन थामे रखा? जब बॉलीवुड फिल्मों में हीरो हीरोइन के घर से भागकर शादी करने का ढर्रा आम था, ऐसे समय में आदित्य ने नायिका के रूढ़िवादी पिता के आशीर्वाद से ही विवाह करने की कहानी कैसे बना डाली और वो चमत्कारिक रूप से विश्व की सबसे लंबी समय तक चलने वाली फिल्म के रूप में वल्र्ड रिकॉर्ड कैसे बना लिया? उन दिनों सबकी जुबान पर एक ही सवाल था कि मोहब्बत के देवता कहे जाने वाले फिल्म मेकर यश चोपड़ा ने खुद यह फिल्म ना बना कर यह जिम्मेदारी अपने 24 वर्षीय बेटे को क्यों सौंप दी?

जब मैंने भी उन्हीं दिनों यश चोपड़ा जी से यही सवाल किया था, तो उन्होंने कहा था, हो सकता है मैं एक बार लव स्टोरी किंग फिल्म मेकर कहलाता हूँ, लेकिन आदित्य एक बॉर्न स्टोरी टेलर है। हो सकता है कि लोग मुझे जुनूनी रोमांटिक मानते हैं लेकिन जब-जब मैं अपने बेटे की इस फिल्म को देखता हूं, उनकी उपलब्धियों को परखता हूं तो मन में गुलाबों का एक चमन खिल जाता है। मैं आदित्य की प्रतिभा को अंडरलाइन करते हुए कई बार अपनी पत्नी (जानी-मानी प्लेबैक सिंगर पामेला चोपड़ा) को साहिर साहब की लिखी शायरी सुनाता हूँ,

‘तू अपनी अदाएं बख्श इन्हें,

मैं अपनी वफाएं देता हूं,

अपने लिए जो सोची थी कभी,

वह सारी दुआएं देता हूं’

यश जी से इस मुलाकात के पश्चात फिल्म के निर्देशक, लेखक आदित्य चोपड़ा से जब मेरी मुलाकात हुई तो मितभाषी और शर्मीले आदित्य ने अपने बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज उस तूफान को बयां

कर रही थी, जो एक स्टोरी टेलर के रूप में उनके जज्बातों में निहित थी, आदित्य सरापा सिनेमा के जादू से सम्मोहित थे, पता चला कि किशोरावस्था के उम्र से ही वे फिल्मों और फिल्म मेकिंग को लेकर पर्सनल नोट बुक में बहुत कुछ लिखते रहते थे। हर शुक्रवार, वे हर रिलीज होने वाली फिल्म देखते थे और अपनी नोटबुक में उन्हें रेट करते थे। खुद उन फिल्मों की समीक्षा करते और उनके बॉक्स ऑफिस रेटिंग का अनुमान लगाते थे और फिर असल रेटिंग से मिलान भी करते थे। शायद उनका फिल्मों के प्रति ये जुनून और रूबरू सिनेमाघरों में जाकर पब्लिक प्रतिक्रिया को समझने की प्रक्रिया ने ही उन्हें ‘दिलवाले दुल्हनियां’ जैसी अद्भुत, अतुलनीय और अकल्पनीय फिल्म निर्देशित करने की शक्ति दी!

आदित्य भी अपने हमउम्र दोस्तों की तरह एक उच्च वर्गीये किशोर के जैसे पाश्चात्य शिक्षा और युग में पॉप, हिप हॉप गानों को सुनते हुए बड़े हुए लेकिन धीरे-धीरे उन्हें ये एहसास हो गया कि उन्हें हिंदी फिल्में ज्यादा आकृष्ट कर रही है, हिंदी गाने ज्यादा भा रहें है, उन्हें फिल्म शुरू होने के साथ एक मेलोडियस बैक ग्राउंड में म्यूजिक की लेयरिंग अच्छी लगती है, इस एहसास के साथ आदित्य ने अपनी सारी पाश्चात्य गानों की सीडीज कचरे में फेंक दी।

शर्मीले आदित्य चोपड़ा सर से पाँव तक रोमांस में भीगे थे, और भीगे हैं, ये वो निर्देशक हैं जिसने उस दौर में शाहरूख खान को बतौर हीरो मुहब्बत का देवता बना दिया, जब शाहरुख, विलेन की भूमिकाओं में हिट पर हिट दिये जा रहे थे। शाहरुख खुद भी इस इटरनल लवर की भूमिका निभाने से डर रहे थे और कतरा रहे थे, लेकिन आदित्य ने शायद अपने जिगर से मुट्ठी भर रोमांस शाहरुख के सीने में पिरो दिया, और अचानक शाहरुख को लगा, अरे, ‘दिलवाले दुल्हनिया- – -’ की कहानी तो उसकी और गौरी की कहानी है, कुछ इसी स्थिति में शाहरुख ने गौरी से शादी की थी, और फिर बाकी सब इतिहास बन गया,

आज शाहरुख कहतें हैं कि ‘दिलवाले दुहनियाँ- – -’ फिल्म उन्हें बतौर एक्टर डिफाइन करता है। मजे की बात तो ये थी कि काजोल भी इस फिल्म के कॉन्सेप्ट से चैंकी हुई थी, और सबसे ज्यादा चैंकी हुई थी इस फिल्म के नाम से, भला ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ भी कोई फिल्म का टाइटल हुआ? वह खूब हंसी थी इस नाम को सुनकर।

दरअसल अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर ने आदित्य चोपड़ा को, एक पुरानी फिल्म ‘चोर मचाए शोर’ के गीत ‘ले जाएंगे दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में से यह लाइन, बतौर टाइटल रखने को कहा था, जो काजोल की समझ में नहीं आ रही थी। यह कैसा टपोरी नाम है? काजोल ने सोचा था और सिमरन का चरित्र भी उसके अपने चरित्र से काफी अलग था, लेकिन उसने सिर्फ इसलिए फिल्म में काम करना स्वीकारा क्योंकि आदित्य चोपड़ा उनके बहुत ही अजीज दोस्त थे।

दिल वाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे’

आदित्य चोपड़ा ने शाहरुख और काजोल को बतौर नायक और नायिका क्यों चुना? शायद इसलिए कि दोनों की ऑनस्क्रीन और ऑफ स्क्रीन केमिस्ट्री लाजवाब है, दोनों एक दूसरे के साथ इतने कम्फर्टेबल थे और आज भी हैं कि पूरी शूटिंग के दौरान उन्होंने किसी भी दृश्य का रिहर्सल नहीं किया, दोनों ने कभी बैठकर किसी दृश्य की चर्चा भी नहीं की थी। उन लोगों ने सीधे कैमरे के सामने जाकर डायरेक्ट परफॉर्म किया, इतना विश्वास था उन्हें एक दूसरे पर।

एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में आदित्य अपने कलाकारों को गहराई से ऑब्जर्व करते थे, और ऐसे में उन्हें एहसास हुआ कि काजोल जब भी शॉट देती है, तो प्रथम दो टेक्स में सबसे अच्छा परफॉर्म करती है लेकिन उसके बाद अपना धैर्य और स्वाभाविकता खोने लगती है, इसलिए आदित्य ने कुछ इस से काजोल को डायरेक्ट करना शुरू किया कि प्रथम दो टेक में ही सही शॉट कैमराबद्ध हो जाए।

आदित्य सिर्फ एक बेहतरीन निर्देशक ही नहीं बल्कि बेहतरीन म्यूजिक सेंस के धनी भी है। उन्होंने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के सारे गीतों को कई कई बार रिजेक्ट करके फिर अंतिम सबसे बढ़िया गीतों को अप्रूव किया और इस तरह दिलवाले दुल्हनियां ने हर क्षेत्र में, तरह तरह के अवाॅर्ड्स जीतकर आज भी बॉलीवुड का सबसे सफल फिल्मों के रिकॉर्ड में उत्तम है!


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Mayapuri

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