फिल्म ‘भुजः द प्राइड ऑफ इंडिया’ महिलाओं के शौर्य, लगन और देश भक्ति को सेलिब्रेट करती है-अभिषेक दुधैया

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टीवी सीरियलों का निर्देषन कर बतौर निर्देषक अपनी पहचान बनाने के बाद जब भी किसी निर्देषक ने फिल्म निर्देषन में कदम रखा, तो उनकी फिल्मों में छोटे कलाकारों ने ही अभिनय किया।मगर अब एहसास, अग्निपथ, सिंदूर तेरे नाम का,लाइफ का रीचार्ज,हम तुमको न भूल पाएंगे,दिल के रिष्ते सहित करीबन बीस से अधिक टीवी सीरियलों का निर्देषन कर चुके अभिषेक दुधैया ने इस लीक को तोड़कर नया इतिहास रचा है। अभिषेक दुधैया बतौर सह निर्माता,सह लेखक और निर्देषक अपनी पहली फिल्म “भुजः द प्राइडऑफ़ इंडिया” लेकर आ रहे हैं, जिसमें अजय देवगन, संजय दत्त,सोनाक्षी सिन्हा,नोरा फतेही, शरद केलकर सहित कई दिग्गज कलाकार हैं,जो कि तेरह अगस्त को डिज्नी हॉट स्टार पर आएगी।

फिल्म “भुज: द प्राइड आफ इंडिया” भारत के 1971 के एक सत्य ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधारित है। 1971 में भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान गुजरात के भुज एअरबेस के रनवे को पाक सेना ने बमबारी करके तहस नहस कर दिया था। उस वक्त भुज एअरबेस के तत्कालीन प्रभारी आईएएफ स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक और उनकी टीम ने गुजरात के मधापर व उसके आसपास के गांव की 300 महिलाओं की मदद से वायुसेना के एयरबेस का पुनः निर्माण किया था।

‘‘मायापुरी पत्रिकाके लिए अभिषेक दुधैया से एक्सक्लूसिब बातचीतः अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं? आपको फिल्मों का चस्का कैसे लगा?

मैं गुजरात मैं जामनगर का रहने वाला हूँ और मेरी षिक्षा दिक्षा भुज में हुई है।मेरे परिवार से कला के क्षेत्र से किसी का कोई जुड़ाव नही रहा। लेकिन मेरी मां व पिता जी ने मुझे मन माफिक काम करने की पूरी छूट दी।एक दिन मंैने उनसे कहा कि मुझे फिल्मों में काम करना है,तो उन्होने मुझे इजाजत दे दी। तब मैं 2004 में जामनगर से मंुबई आ गया। मंुबई में षुरूआती दौर में मैने स्ट्ीट प्ले किए। फिर गुजराती भाषा के कई नाटक किए। फिर  फिल्म ‘दस’ में मुकुल आनंद के साथ बतौर सहायक निर्देषक काम किया। इसके बाद मैने रमण कुमार के साथ बतौर सहायक निर्देषक काम किया। रमण कुमार के साथ काफी फिल्म व टीवी सीरियल किए। रमण कुमार जी मेरे गुरू हैं। फिल्म ‘भुजःद प्राइड ऑफ़ इंडिया’के लेखकों में रमण कुमार भी हैं।

फिल्मों का चस्का कैसे लगा?

मुझे फिल्में देखने का षौक रहा है। पर फिल्मांे से जुड़ने का चस्का तो अमिताभ बच्चन को देखकर लगा। अमिताभ बच्चन को देखकर मेरे मन में ख्याल आया था कि मुझे इस महान कलाकार को निर्देषित करना है। स्कूल के दिनों से ही मैने नाटक लिखने व स्ट्रीट प्ले करने षुरू कर दिए थे। मेरे पास एक अच्छी स्क्रिप्ट थी,तो मुझे लगा कि मुझे इस इंसान को निर्देषित करना है। मैं 2004 से लगातार काम करता आ रहा हॅूं।

2007 से 2016 के बीच मैंने दूरदर्षन के लिए कई सीरियल निर्देषित किए। यह दौर पूरी तरह से दूरदर्षन का था। 2010 में मेरा सीरियल ‘‘हम तुमको न भूल पाएंगे” काफी लोकप्रिय हुआ था। फिर “यह दिल के रिष्ते” लोकप्रिय हुआ। 2015 में मेरी दो सीरियल “बेटी का फर्ज” और ‘‘उम्मीद नही दॅूंगा” सफल हुई। इस बीच में मैने एक सीरियल ‘इम्तिहान’ किया था। 2017 में ‘लाइफ का रीचार्ज’ नामक सीरियल निर्देषित किया था। उसके बाद मैने फिल्म ‘भुजः द प्राइड आफ इंडिया’ निर्देषित करने का बीड़ा उठाया,जो कि अब 13 अगस्त को हाॅट स्टार डिज्नी पर आएगी।

फिल्मभुज: प्राइड ऑफ़ इंडियाबनाने का ख्याल कैसे आया?

यह फिल्म एक सत्य ऐतिहासिक घटनाक्रम पर आधारित है। 1971 में भारत व पाकिस्तान युद्ध के वक्त गुजरात के भुज हवाई अड्डे के एअरबेस को पाकिस्तानी वायुसेना ने बमबारी से ध्वस्त कर दिया था। तब भुज हवाई अड्डे के तत्कालीन प्रभारी आईएएफ स्क्वाड्रन लीडर विजय कर्णिक और उनकी टीम ने मधापर व उसके आस पास के गांव की 300  महिलाओं की मदद से वायुसेना के एयरबेस का पुनः निर्माण किया था। इन तीन सौ औरतों में मेरी नानी मां लक्ष्मी परमार भी एक थीं। यानी कि मेरी नानी मां लक्ष्मी परमार ने भुज के इस एअरबेस के रनवे को बनाने में योगदान दिया था। मेरी नानी मां ने यह सारी कहानियंा मुझे कई बार सुनायी थी। मंुबई आने के बाद मै सीरियल निर्देषित करने में व्यस्त हो गया। पर मेेरे दिमाग में मेरी नानी मां की खुद की भुक्त भोगी सुनायी हुई कहानी घूम रही थी। इस कहानी में सेना और आम जनता की जो भागीदारी है,गांव की औरतों की जो षौर्य गाथा है,उसे हर देषवासी तक पहुॅचनी चाहिए। एक दिन मैने सोचा कि यह सीरियल का सिलसिला तो बंद होने से रहा। इसलिए अब सीरियल नहीं फिल्म बनाउंगा। फिर मैने उस कहानी को लिखा और उस पर यह फिल्म बनायी है।यह फिल्म महिलाओं के षौर्य,हिम्मत, लगन और देषभक्ति को सेलिब्रेट करती है।

इस कहानी पर आपने फिल्म बनाने का ही निर्णय क्यों लिया?

देखिए,सिनेमा के प्रति मुझे बड़ा प्रेम रहा है। मैं सत्यजीत रे के सिनेमा से बहुत प्रभावित हॅूं। चेतन आनंद,राज कपूर व गुरूदत्त के सिनेमा का मैं प्रषंसक रहा हूँ। यह वह फिल्मकार हैं,जिनका सिनेमा कालजयी है। समय गुजरता रहेगा,पर इनका सिनेमा सदैव जिंदा रहेगा। लोग हर सदी व युग में इनके सिनेमा के प्रषंसक रहेंगें। इसके अलावा कटु सत्य यह है कि अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए सिनेमा से बेहतरीन सषक्त माध्यम कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। आपको भी पता होगा, मैंने सुना था कि जब फिल्म ‘उपकार’ में प्राण ने मलंग चाचा का किरदार निभाया था, तो एक विलेन, पाॅजीटिब हो गया था। यानी कि एक किरदार आपके लिए क्या कर सकता है… आपका एक विचार पूरे समाज व देष को बदल सकता है। इसलिए मैने सोचा कि इन तीन सौ औरतों की जो षौर्य गाथा है,उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए हमें फिल्म बनानी चाहिए।

आपकी फिल्म में तीन सौ औरतों की योगदान षौर्य के अलावा अन्य महत्वपूर्ण कहानियां कौन सी हैं?

हमारी फिल्म में तीन सौ औरतों के साथ अन्य छह कहानियां हैं। एक कहानी एएफए स्क्वार्डन लीडर विजय कुमार कार्णिक (अजय देगवन) की है, दूसरी कहानी पाकिस्तान में भारत से गयी जासूस हीना रहमान (नोरा फतेही) की है। तीसरी कहानी रणछोड़ दास फकीर (संजय दत्त) की है। चैथी कहानी मद्रास रेजीमेंट लेफ्टीनेंट नायर (षरद केलकर) थे, जो कि कच्छ में पोस्टेेड थे,की है।पांचवी कहानी संुदर बेन जेठा (सोनाक्षी सिंन्हा) की और छठी कहानी विक्रम सिंह पाल (एम्मी विर्क)की है। यह सभी कहानियां एक साथ चलती हैं। इन सभी के बीच रनवे यानी कि तीन सौ औरतों की कहानी सबसे बड़ी है,मगर पूरे माहौल व हर किरदार को स्थापित करने के लिए सभी को महत्व दिया गया है।

अपनी नानी मां की सुनी हुई कहानी पर फिल्म की पटकथा लिखने से पहले रिसर्च करने की जरुरत पड़ी या नहीं?

मैंने एक साल का समय रिसर्च करने में लगाया।मैने पहले अपनी नानी मां लक्ष्मी परमार से सुनी हुई पूरी कहानी को ज्यों का त्यों लिखा। उसके बाद मैने 1971 के आईएएफ स्कवार्डन लीडर विजय कुमार कार्णिक से बड़ौदा जाकर मिला। उनसे लंबी बातचीत की। इसके अलावा उन औरतों से भी मिला,जो कि अभी जीवित हैं। उसके बाद रणछोड़ास फकीर के पोते अर्जून भाई से बनासकंाठा के एक गांव लिंबाड़ा में जाकर मिला और उससे जानकारी हासिल की। फिर कहानी लिखी।उसके बाद विस्तृत पटकथा लिखने के लिए रमण कुमार व रितेष षाह की मदद ली। क्योंकि मैं नही चाहता था कि मैं सिर्फ अपनी नानी मां की कही हुई बात को रख दॅूं, जो कि जरुरी भी न हो। अन्यथा मैं अपनी हर सीरियल या फिल्म का लेखन व निर्देषन ख्ुाद करता हूं। पर ज्यादातर संवाद मेरे ही लिखे हुए हैं। ट्ेलर मंे आपने जितने संवाद सुने, वह सब मेरे ही लिखे हुए हैं।

आपने अपनी नानी मां से सच को सुन रखा था,उसके बाद अपने पचास साठ दूसरी औरतों से भी बात की,ऐसे में कौन सी बातें अहम हो गयीं?

जब मेरी नानी मां कहानी सुनाती थी,तो मुझे लगता था कि क्या कमाल की कहानी है? क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है? जब कहानी सुनते हुए मैं सोचता था,तो मेरे अंदर एक रोमांच पैदा होता था। जब औरतों ने मुझसे कहा-‘हमारे लिए हमारा घर,चार दीवारी और उसके उपर छत ही सबसे ज्यादा अहमियत रखती है। पर हमने उस वक्त अपने देष को बचाने के लिए लड़ रही सेना की मदद के लिए अपने घर तोड़ डाले। उस वक्त रात में इतनी अधिक ईंटें व पत्थर कहां से आते? क्योंकि पाकिस्तानी वायुसेना के गिराए बम से जमीन में बीस फुट गहरा खड्डा हो जाता था। बीस फुट के गहरे खड्डे को पत्थर डालकर ही मजबूत बनाया जा सकता है। इसलिए हमें घर तोड़ने पड़े। हमने अपने बच्चों और वृद्ध लोगों को पेड़ के नीचे सुलाया।‘ हम आपको याद दिला दें कि उन दिनों मधापुर और इसके आस पास के गांव के सभी पुरूष गांव से बाहर मंुबई, दिल्ली, अफ्रीका, अमरीका जैसे देषो में कमाने चले जाते थे।घर में सिर्फ महिलाएं,छोटे बच्चे व वृद्ध/बूढ़े लोग ही बचते थे। इस कहानी का पहलू जो मेरे दिल जो छू गया,वह यह रहा है कि हर औरत के लिए सब कुछ उसका अपना घर ही होता है। पर यदि वह देष के लिए अपना घर ही तोड़ देती है,तो कितना बड़ा बलिदान देती है। गांव की औरतों ने पाकिस्तानी बम बारी के बीच आर्मी के लिए रनवे को बनाने में सहयोग देते हुए अपनी जान की परवाह नही की,उपर से अपने घर भी तोड़ डाले। जबकि आप भी समझते हैं कि एक घर बनाने में लोगों की जिंदगियां निकल जाती हैं। मगर देष के लिए जरुरत पड़ी,तो औरतांे ने इसकी परवाह नही की।

आपकी फिल्म ‘‘भुज प्राइडमें पूरे तेरह वर्ष बाद संजय दत्त और अजय देवगन ने अभिनय किया है.किस तरह के अनुभव रहे?

बहुत ही बेहतरीन और जबरदस्त अनुभव रहा। दोनों कलाकार संजय दत्त और अजय देवगन, इसमें से खासकर अजय देवगन मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। देखिए, फिल्म की जो पटकथा होती है, उसे दर्षकों तक ले जाने वाला सिपाही आपके साथ खड़ा है, वह आपको समझ रहा है, तो आपकी षक्ति और क्षमता अपने आप बढ़ जाती है। आपका आत्मविष्वास इस कदर बढ़ जाता है कि आप काम ज्यादा बेहतर ढंग से कर पाते हैं।

हर किरदार के कास्ट्यूम,संवाद अदायगी की भाषा बाॅडी लैंगवेज को किस तरह तय किया?

देखिए,हमारी फिल्म हिंदी भाषा में हैं। हमने कुछ षब्द गुजराती के रखे हैं। पर हमारा प्रयास यही रहा है कि उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक हर भाषा का दर्षक फिल्म को समझ सके।

फिल्म के कलाकारों को किसी तरह का प्रषिक्षण भी दिलवाना पड़ा?

अजय देवगन व संजय दत्त सहित हर कलाकार को अपने अपने किरदार को न्यायसंगत तरीके से निभाने के लिए कई तरह की तैयारी करनी पड़ी। काफी कुछ सीखना पड़ा। मसलन,सोनाक्षी सिन्हा को सुंदर बेन जेठा के किरदार के लिए कच्छ इलाके के गांव की औरतांे की तरह कपड़े पहनना, उठना बैठना व भाषा आदि की तैयारी करनी पड़ी। उन्हें थोड़ा सा लाउड बोलना सीखना पड़ा। गुजराती के कुछ खास षब्द सीखने पड़े। उर्दू में ‘कब्जा’ कहते हैं, पर गुजराती में बोलते हैं। सोनाक्षी को नगाड़ा बजाना सीखना पड़ा। नोरा फतेही को स्कैटिंग करना, गन चलाना, फायरिंग करने के साथ ही मार्षल आर्ट आदि की ट्ेनिंग लेनी पड़ी। मेरे लिए नोरा फतेही से हीना रहमान का किरदार निभवाना चुनौती थीं। क्योंकि नोरा फतेही ने अब तक ज्यादातर डंास नंबर ही किए हंै। यही उनकी पहचान हैं। जबकि हमारी फिल्म में उसने जासूस का अति महत्वपूर्ण किरदार निभाया है। हां! उसे स्टंट भी करना पड़ा। इसमें उसके महत्वपूर्ण संवाद भी हैं। नोरा ने  इस किरदार को निभाने के लिए बहुत मेहनत की है।

आपके क्या अनुभव रहे?

बहुत ही ज्यादा सुखद और जबरदस्त अनुभव रहे। जब मंैने इस फिल्म की घोषणा की थी, तब लोगों ने कहा था कि,‘आप हमेषा सीरियल बनाते रहे हैं,ऐसे मंे इतनी बड़ी फिल्म नहीं बना सकेंगे। वैसे भी अब तक होता यही रहा है कि सीरियल का निर्देषन करने के बाद जब वह फिल्म बनाते थे तो दो या तीन करोड़ के बजट वाली फिल्में ही बनाते रहे हैं। लेकिन मैं इस चलन को तोड़ना चाहता था। लोगो ने मुझसे कहा कि फिल्म बन नही पाएगी। पर मुझे आत्म विष्वास था कि मेरी यह फिल्म बन जाएगी। क्योंकि हमारे पास एक सषक्त कहानी थी। मुझे यह भी यकीन था कि हमारी फिल्म से अजय देवगन सर जुड़ेंगे। जब हमने विजय कार्णिक के साथ पहली बार प्रेस काॅफें्रस की थी,उस वक्त तक हमारी अजय देवगन सर से कोई बातचीत नही हुई थी। पर मैने प्रेस काॅफ्रेंस में ही कह दिया था कि फिल्म में विजय कार्णिक सर का किरदार अजय देवगन ही निभाएंगे। पर हम अपनी कहानी की वजह से इतना अधिक आत्मविष्वास से भरे हुए थे। संघर्ष तो उससे पहले काफी रहा। हर इंसान को संघर्ष करना पड़ता है। मुझे खुषी है कि मैने जिस किरदार के लिए जिस कलाकार को लेने के लिए सोचा,वह सभी कलाकार मुझे मिल गए।

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Mayapuri