‘जिद्दी इंसान’ के. ए. अब्बास

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अली पीटर जॉन

मुझे नहीं लगता कि मैं अपने गुरु के अब्बास के बारे में बिना बात किए जिंदा रह सकता हूं, क्योंकि अब्बास साहब सिर्फ एक इंसान नहीं बल्कि  एक संस्था थे, वो पूरी दुनिया थे।  आज उनसे जुड़ी एक बात मुझे याद आ गई। मुझे वो शाम याद आ गई जब मैं और अब्बास साहब जुहू रोड पर थे।

अब्बास साहब काफी दृढ़ निश्चय इंसान थे। उन्होंने अपने एक्सीडेंट तक को गंभीरता से नहीं लिया। जब वो अस्पताल में भर्ती थे तब उन्होंने बहुत सी लघु कथाएं और आर्टिकल्स लिखी थी।

उन्होंने PTA की प्ले ‘बकरी’ को 50 बार देखा था और वह पृथ्वी थियेटर जा रहे थे ‘बकरी’ एक बार फिर से देखने के लिए। उन्हें चलने में दिक्कत हो रही थी पर किसी के अंदर यह साहस नहीं था कि वह उन्हें सहायता के लिए पूछ सकें। वो जावेद सिद्दीकी से मिलें जो IPTA ग्रुप के प्रमुख लेखक थे. उन्हें पता था कि अब्बास  साहब ने ‘बकरी’ को अनगिनत बार देखा है। उन्होंने  अब्बास साहब से पूछा कि वो बार -बार एक ही प्ले क्यों देखते हैं तो इस पर अब्बास साहब ने फटाक से जवाब दिया, ‘ इससे तुमको क्या मतलब ‘ ।और इतना कहकर अब्बास साहब छड़ी के सहारे पृथ्वी थिएटर में ड्रामा को फिर से एक बार देखने के लिए निकल पड़े।

वो थोड़े बीमार थे और इर्ला नर्सिंग होम में भर्ती थे। उन्हें पता चला कि  IMPPA अपनी गोल्डन जुबली बनाने वाले हैं तो उन्होंने डॉक्टर से कहा कि उन्हें इस समारोह में जाना है क्योंकि  इस समारोह में अब्बास साहब को सम्मानित किया जाने वाला था। अब्बास साहब को इस समारोह में ले जाने के लिए स्पेशल एंबुलेंस और स्ट्रेचर की व्यवस्था की गई। उन्होंने समारोह अटेंड किया, ट्रॉफी ली और फिर वापस अस्पताल आ गए।

अब्बास साहब की दृढ़निश्चयता हर दिन देखी जा सकती थी। उनकी पैड टूटी हुई थी पर फिर भी उन्होंने पांचवी मंजिल पर स्थित अपने ऑफिस जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ी जहाँ रात के 9:00 बजे तक वो काम करते थे। उनके दृढ़निश्चयता  की पराकाष्ठा उनके अंतिम फिल्म ‘एक आदमी’  के डंबिंग के वक्त देखी जा सकती थी। रिकॉर्डिंग रूम में उनको तीन हार्ड अटैक आ चुके थे पर उन्होंने डबिंग के वक्त किसी को इस बात का आभास तक नहीं होने दिया।

वो डबिंग से जब संतुष्ट हो गये तब उन्होंने अपनी हालत बताई और अस्पताल जाने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें पता था कि वह मर रहे हैं और उन्होंने अपना एक वसीयत बनाया था जिसमें लिखा था कि उन्हें उनकी पत्नी के कब्र के बगल में दफनाया जाये। उन्होंने यह भी कहा था कि उनको सबसे सस्ते  कब्रिस्तान में दफनाया जाए और उनके अंतिम संस्कार में कोई धार्मिक  प्रथाएं ना हो। ज़िद्दी अब्बास साहब के बारे में और भी कई कहानियां हैं, पर वो कहानियां कभी और सुनाऊंगा। अगर मेरे थोड़ा और ज्यादा जीने की कोई वजह होगी तो वो वजह होगी अब्बास साहब की कहानियां सुनाने के लिए।

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