एपिक चैनल पर ‘लुटेरे रू बैंडिट्स ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ का सीज़न-3 लॉन्च

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दो सीज़न की सफलता के बाद लुटेरे रू बैंडिट्स ऑफ ब्रिटिश इंडिया का ये तीसरा सीज़न है, जिसमें भारत के प्रसिद्ध बैंडिट्स की कहानियाँ शामिल हैं, जिन्हें अंग्रेजों द्वारा भूमि औेर लोगों पर जीत हासिल करने के उद्देश्य से पेशेवर डाकू बनाया गया था जिसे समझने के लिये वे आज तक संघर्ष कर रहे थे।

19वीं शताब्दी में बहुत ज्यादा उथल-पुथल थी। मुगलों की ताकत और ब्रिटिश साम्राज्य का उछाल पुराने तरीकों को खत्म कर रहा था और नए रुझान स्थापित कर रहा था। संस्कृतियों के इस बदलाव से बहुत से लोग पीड़ित थे। कुछ ने अपने आपको अमीरों को लूटने के लिए बदल लिया था, लेकिन वो लूटी हुई सामग्री को हमेशा गरीबों के बीच नहीं बाँटते थे। लूटेरे इस दौरान पुलिस से परेशान थे, जो हमेशा लुटेरों का पीछा करती थी। 

शो के बारे में जानकारी देते हुए एपिक टीवी के कंटेंट एंड प्रोग्रामिंग हेड अकुल त्रिपाठी ने कहा, स्थानीय समुदायों और जनजातियों जैसे वाघेर, भील और बंजारो ने सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल के समय लूटपाट करने के लिए प्रेरित किया। कुछ लोगों के कारनामों की वजह से पूरी जनजातियों को पेशेवर डकैतों के रूप में बताया जाता रहा और पूरे समाज को किनारे कर दिया गया। ये एक ऐसी गलती थी, जिसे आज़ादी के बाद सुधारा गया। ’लुटेरे’ का तीसरा सीज़न इन्हीं जनजातियों की कहानी बताता है।

जनजातियों के बारे में

भील रू ये उपमहाद्वीप के सबसे पुराने निवासियों में से एक हैं, जो खांदेश और राजपूताना के जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में रहते थे, और राजपूतानंद ने इस क्षेत्र पर शासन करने वाले राजपूतों और मराठों के साथ अच्छे संबंधों का फायदा उठाया। हालांकि, 1818 के बाद इस क्षेत्र की राजनीति बदलना शुरू हुई जब ब्रिटिश सेना क्रूरता और चतुरता के साथ आगे बढ़ रही थी। अंग्रेजों के इरादे जंगलों को साफ करना था, उनकी मूल मंशा भीलों को जंगलों से वंचित करना थी। इसने न केवल भीलों को विद्रोही बनाया, बल्कि उन्हें राजमार्ग पर चोरी करने और कानून तोड़ने के लिए भी मजबूर किया। 

संन्यासी विद्रोही रू वास्तव में संन्यासी उस व्यक्ति को कहा जाता है जो आध्यात्मिक जीवन के लिए सांसारिक दुनिया को त्याग देता है। फकीर और संन्यासी उत्तरी बंगाल के विभिन्न मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर पारम्परिक यात्रा करते थे, वे स्थानीय जमीदारों से भेंट इकट्ठा करते थे और अंग्रेजों द्वारा हस्तक्षेप किए जाने पर संगठित विद्रोह को प्रेरित करते थे।

वाघेर रू ओखामंडल के शासक वाघेर, गुजरात में स्थित जामनगर जिले के द्वारका उप-मंडल में एक प्रमुख भूमिगत समुदाय था। जब उनके व्यापार और करों पर प्रतिबंध लगाए गए, तो कई लोगों ने उन्हें समुद्री डाकू बनने के लिए मजबूर किया। 

बंजारा रू ये एक जातीय समुदाय था, जिसमें कलाबाज, गायक, नर्तिकियाँ, कसौटी-चलाने वाले और भविष्यवक्ता शामिल थे। शोषणकारी औपनिवेशिक नीतियों के कार्यान्वयन के साथ, बंजारों की आजीविका के पारंपरिक स्रोत घटना शुरू हो गए थे। जीवन चलाने के लिए उनमें से कुछ लोग राजमार्ग पर चोरी, मवेशी उठाने, भेड़-चोरी और बच्चों का अपहरण करने लगे

लुटेरे रू बैंडिट्स ऑफ ब्रिटिश इंडिया सीज़न-3, शुरू हो रहा है 14 जून से हर गुरुवार 10 बजे सिर्फ एपिक टीवी पर।

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