कोई घबराहट नहीं है, मुझ में -अपर्णा सेन

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अपर्णा सेन

नये वर्ष की महकती हुई नयी खबर!

बंगाल की मंजी हुई अभिनेत्री अपर्णा सेन जो पलक झपकते आँखों की गहरी अभिव्यक्ति के साथ भावों का भंवर उत्पन्न करने के लिए विख्यात हैं, अब डायरेक्टर बन गई हैं, यह बात नहीं है कि भारतीय फिल्मों के इतिहास में वे पहली डायरेक्टर हैं, इनके पहले दक्षिण में भानुमति अनेक फिल्मों का कामयाब डायरेक्शन कर चुकी हैं. अभी-अभी अभिनेत्री लक्ष्मी भी इस क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का झंडा फहरा चुकी हैं. मुंबई में रूप माला और साधना ने डायरेक्टर बन कर यह सिद्ध किया, कि स्त्रियां भी इस महत्वपूर्ण कार्य को विश्वास के साथ सम्पन्न कर सकती हैं, हाल ही में सिम्मी ने डायरेक्टर बनने की घोषणा की है, कुछ ही दिनों पहले एक ऐसी फिल्म शुरू हुई थी जिसमें निर्माण से लेकर पाब्लिसिटी तक का सारा कार्य-स्त्रियों के हाथों में ही था, बंगाल में अपर्णा सेन के पहले अरूणघंती देवी और मंजु डे उस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व प्रगट कर चुकी हैं.

Aparna Sen

वस्तुतः अपर्णा सेन के डायरेक्टर बनने की खबर का महत्व यह है कि वे ‘36 चोरंगीलेन’ के नाम से अपने डायरेक्शन में जो फिल्‍म बनाने जा रही हैं और जो इन पंक्तियों को पढ़ते समय शुरू भी हो जायेगी वह अंग्रेजी में बन रही है. किसी महिला के डायरेक्शन में बनने वाली यह पहली भारतीय अंग्रेजी फिल्म है. यह बात उल्लेखनीय इसलिए भी है कि इस फिल्‍म के निर्माता शशि कपूर है और इसकी हीरोइन हैं शशि कपूर की पत्नी जैनीफर कपूर, पिछले दिनों वे अपनी चर्चित फिल्म की सारी व्यवस्था करने के लिए मुंबई आई हुई थी, तब शशि कपूर के ऑफिस में उनसे संक्षिप्त मुलाकात अचानक ही हुई थी पर बातांे में मैंने उससे बहुत सी बातें पूछ लीं, इसके पहले की मैं उनसे सवाल करूं-उनके बारे में मैंने जो कुछ पढ़ा था, सुना था और मुंबई की फिल्मों में शूटिंग करते हुए मैंने अपनी आंखों से जो कुछ देखा था-वह फिल्‍म की है तरह मेरी आंखों के सामने घूम गया, पहले वे सत्यजीत रे की ‘तीन कन्या’ में से एक कन्या थी, उस फिल्म में वे जूही की कली की तरह खिली थी, और जब वे उनकी अन्य फिल्म ‘समाप्ति’ में आयी तो उस फिल्म के साथ-उनकी गहरी अभिनय क्षमता की अन्तर्राष्ट्रीय फिल्‍मी अंचलों में खूब चर्चा हुई, और मुझे वह दिन याद है जब वे 1968 में हिन्दी की पहली फिल्म ‘विश्वास’ में काम करने के लिए मुंबई आयी, उस वक्‍त वे बो.ए. में पढ़ रही थी. उन दिनों उन्होंने मुझे अपनी एक छोटी सी मुलाकात में बताया 16 जून को मेरा बी.ए. फाइनल है. 8 जून को उस फिल्म में काम करने का निमंत्रण मिला-और आज 12 जून को मुहूर्त हो रहा है!

तो वापस लौट कर इम्तहान में बेठेंगी ?

क्यों नहीं. मैं कोई मामूली लड़की थोड़ी ही हूं, उन्होंने आंखों को बिजली की तरह चमका कर कहा!

कुछ पत्रकारों ने फिल्मों के ग्लैमर की चर्चा करते हुए अंग प्रदर्शन के बारे में उससे सवाल किया तो उन्होंने चांचल्य सपाट से कहा-यदि प्रदर्शन योग्य अंग का ब्रार्टिस्टिक एक्स्पोजर हो तो अच्छा है, उसमें मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती है.” तभी मैने अनुमान लगा लिया था, कि वे बड़ी निडर हैं-फिल्मी दुनिया में जरूर हंगामा करेंगी!

और अपर्णा सेन ने हंगामा कर भी दिखाया-‘बॉम्बे टाकीज’ फिल्म में चुम्बन देकर, फिर दो शादियाँ कर और नारी स्वतंत्रता पर निर्भीक विचार जाहिर करके. वे 4-5 साल की उम्र में फिल्‍मों में आई और अभी वे केवल 33 साल की हैं, पर कहती हैं-‘इन वर्षों में मैंने जिंदगी को इस तरह जिया है कि मेरे पास गहरे अनुभव हैं जो डेढ़ सौ साल तक जीने वाली किसी बूढ़ी औरत के पास भी नहीं हो सकते. मैं आज किसी को देख कर उसके व्यक्तित्व को नाप लेती हूं. न जाने मैं कितने आदमियों के सम्पर्क में आई कि आज मैं हर आदमी को केवल देख कर किताब की तरह पढ़ लेती हूं.” कुछ अर्से पहले-जब उनके भूतपूर्व पति संजय की देहांत हो गया, तो उन्होंने सहानुभूति पूर्वक शोक प्रकट करते हुए कहा-“मैं उनकी डेथ से बड़ी अपसेट हुई हूं. यदि एक कुत्ता भी-कुछ दिनों तक आपके पास रहे तो आपको उससे ऐसा मोह हो जायेगा उन्होंने यह बात इतने स्पष्ट रूप से कही था कि बंगाली पत्र-पत्रिकाओं में शोरगुल मच गया.

और आज मैं उन्हीं विवादस्पद अपर्णा सेन को बड़ी गंभीर और चिंता में डूबी हुई देख रहा हूं.

मैंने छेड़ते हुए पूछा-आप पहले डायरेक्शन से कुछ घबरा रही हैं क्या ?’

‘नो-नॉट एट ऑल’ फिर हिन्दी में कहा“कोई घबराहट नहीं है मुझ में. वह क्या होती है, लाइफ में यह्‌ मैंने जाना ही नहीं. मैं अपना हर काम आत्मविश्वास के साथ करती हूं.” “पर आपके चेहरे पर चिन्ता दिखायी पड़ रही है ?” इस पर वे कुर्सी पर उछल पड़ी और बोली-नहीं-नहीं ! यह चिन्ता नहों, उतावली है. मेरी स्क्रिप्ट पूरो की पूरी सीन बाइज तैयार है. मैं इसे एक स्ट्रेच में बना कर जल्दी से जल्दी पूरी कर लेना चाहती हूं.” मैंने किसी पत्र में पढ़ा था कि उनकी इस फिल्म को कहानी मदर टेरसा पर आधारित है. इस बारे में किये गये सवाल का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा- यह्‌ गलत खबर है. इस बारे में मुझे और भी लोगों ने पूछा है. हकीकत में कहानी एक एंग्लो इंडियन टीचर के इर्दंगिर्द घूमती है. यह स्क्रिप्ट मैंने बहुत पहले लिख दी थी.”

पर आपके पास डायरेक्शन का अनुभव तो है नहीं..”

इसके पहले कि मैं अपनी बात क्रो खत्म करूं-उन्होंने तितलियों के पंखों की तरह बोलती हुई आँखों की भवों को फड़फड़ा कर कहा-‘तो क्‍या हुआ’ एक्टिंग का एक्सपीरियंस मेरे पास कहां था. किसी भी काम को शुरू करने के पहले यह कोई लाजमी नहीं होता कि उसका पहलें कोई एक्सपीरियंस हो शादी के पहले शादी का एक्सपीरियंस करना लाजमो है क्‍या ?

पर यह तकनीक की बात है.” मैंने शंका की.

“तो क्‍या हुआ”. फिर रुक कर बोली-वैसे आपको पता ही है कि मैं बंगाल के कई बड़े-बड़े डायरेक्टरों के साथ उनकी फिल्मों में काम कर चुकी हूं. डायरेक्शन को तकनीक को मैंने खूब गहरी नजरों से देखा है, समझा है. उनके बारे में पढ़ा भी खूब है. सब तरह से जानकारी हासिल करके मैंने उस दिशा में सबसे बड़ा सहारा है, मेरा अपना आत्मविश्वास.

‘कहीं ऐसा तो नहीं है कि आपने शशि कपूर की पत्नी को फिल्‍म का टाइटिल रोल इसलिए दिया है कि शशि कपूर इस फिल्म पर प्रोड्यूसर के रूप में पैसा लगा रहे हैं. ‘नॉनसेंस’ कहकर वे कुछ बौखला उठी, फिर कुछ देर रुक कर, संभल कर बोली-‘मैं लंबे समय से शशि को और उनकी बीवी जेनीफर को जानती हूं. जेनीफर केवल शशि कपूर की बीवी हो नहीं, कुशल एक्ट्रेस भी हैं. ‘जनून’ में उनको एक्ंिटग की कितनी तारीफ हुई है, यह कहने की जरूरत नहीं है. यह तो संयोग की बात हुई कि जब मैं ‘36 चोरंगीलेन’ के लिए किसी प्रोड्यूसर की तलाश में थी, तो उनसे मुलाकात हो गयी. बातों हो बातों में जब-मैंने अपनी स्क्रिप्ट की और डायरेक्टर बनने की चर्चा छेड़ी तो वे एकदम उछल कर प्रोडयूसर बनने को तैयार हो गए. बस लगे हाथ मेरा काम आसान हो गया और प्रोड्यूसर तैयार हो गया.”

‘इसे आप बंगाली या हिन्दी में क्यों नहीं बनाती ?” मैंने पूछा,

उन्होंने मुस्करा कर कहा-‘अंग्रेजी में बनाने में क्या एतराज है. वह इंटरनेशनल लेंग्युएज है. यह विश्व मार्केट में अच्छा बिजनेस

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Mayapuri