मूवी रिव्यू: मानवता के नये चेहरे दिखाई देते हैं फिल्म ‘ट्रैफिक’ में

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रेटिंग****

आज हर तरफ स्वार्थ और मतलब परस्ती फैली हुई है लेकिन उन्हीं के बीच आपको उदारता दया भावना और मानवता भी देखने को मिल जाती है। निर्देशक स्व.राजेश पिल्लई की फिल्म ‘ट्रैफिक’ में एक ऐसी घटना का जिक्र किया गया है जहां चार पांच लोग मिलकर एक जिन्दगी को बचाने के लिये जो करते हैं वो बाद में एक मिसाल बन कर रह जाती है।

कहानी

चार भागों में बंटी इस कहानी के अनुसार देव कपूर एक बिजी स्टार हैं उनके पास अपनी बारह वर्षीय इकलौती बेटी और बीवी तक के लिये वक्त तक नहीं। उनकी बेटी को दिल की बीमारी है जो अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। उसे बचाने के लिये एक नया दिल चाहिये। रेहान एक ऐसा पत्रकार है जिसका आज पहला दिन है वो देव कूपर जैसे बड़े स्टार का इन्टरव्यू लेने वाला था लेकिन एक एक्सिडेन्ट ने उसे अस्पताल पहुंचा दिया जहां डॉक्टर्स के अनुसार उसका बचना मुश्किल है लिहाजा रेहान का दिल उसके माता पिता मुंबई से पुणे में मौत से लड़ रही देव कपूर की बेटी को देने के लिए स्वीकृति दे देते हैं लेकिन प्रॉब्लम वहां आती है जब मुबंई ट्रैफिक पुलिस कमिश्नर अपने हाथ खड़े करते हुये कहता है कि इतने कम टाइम और वो भी पीक पीरियड में बाई रोड जाना बिल्कुल भी मुमकिन नहीं और पूना से हवाई यात्रा भी मुमकिन नहीं। बाद में पुणे अस्पताल के डीन कमिश्नर को लताड़ते हैं कि कुछ करने से पहले ही उसने अपने हाथ खड़े कर दिये, कम से कम उसे एक कोशिश जरूर करनी चाहिये। बाद में एक इमरजेंसी मीटिंग में कमिश्नर के आह्वान पर एक हैड कांस्टेबल इस ऑपरेशन के लिये तैयार होता है और उसके बाद वो किस तरह इस असंभव से काम को संभव कर दिखाते हुये एक जान बचाने में कामयाब होकर दिखाता है ये इस फिल्म में दिखाया गया है।

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निर्देशन

फिल्म के निर्देशक राजेश पिल्लई ने एक ऐसा सच्चा सब्जेक्ट उठाया जो कुछ अरसा पहले साउथ में घट चुका है। (इसी सब्जेक्ट पर मलयालम में एक फिल्म बनकर हिट भी हो चुकी है) उसने घटना को कुछ लोगों के साथ जोड़कर इस तरह दर्शाया है कि देखते हुये कितनी ही जगह रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कहानी के पात्र मानवता की एक ऐसी मिसाल पेश करते हैं जिसे देखते हुये उस घटना से जुड़े उन सभी पात्रों के प्रति नमन करने को जी चाहता है। खासकर उस मुस्लिम लड़के रेहान के माता पिता को जो अपने इकलौते बेटे का दिल एक बच्ची को देने के लिये तैयार हो गये। दूसरे वो जांबाज कांस्टेबल जिसने मुबंई के भारी ट्रैफिक के बीच से पुणे तक रिकॉर्ड टाइम में हार्ट पहुंचा कर एक असंभव से काम को संभव कर दिखाया। एक कमिश्नर जिसने इस ऑपरेशन से जुड़ना स्वीकार किया। इन सभी पात्रों के तहत निर्देशक ने एक ऐसी घटना से दर्शक को रूबरू करवाया जिसका आगे चलकर उन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ने वाला है। कसी हुई पटकथा और तेज रफ्तार वाली ये फिल्म दर्शक को शुरूआत में ही अपने साथ ले लेती है। काश राजेश अपनी इस कृति के रिजल्ट तक जिन्दा रहते।

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अभिनय

ट्रैफिक पुलिस हैड कांस्टेबल चालक की भूमिका में मनोज वाजपेयी एक बार फिर दर्शकों पर अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं। स्टार देव कपूर के रोल में प्रसनजीत और उसकी पत्नि तथा बच्ची की मां की भूमिका में दिव्या दत्ता ने बेहतरीन अभिव्यक्ति दी है। रेहान के मातापिता की भूमिका में सचिन खेडेकर तथा किटटू गिडवानी का अभिनय दर्शकों को छू जाता है। इसके अलावा रेहान के दोस्त की भूमिका निभाने वाले कलाकार ने भी बेहतर अभिनय किया है। छोटी सी भूमिका में विक्रम तथा जिम्मी शेरगिल अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे।

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संगीत

फिल्म में मिथुन का संगीत है जो कहानी के साथ गुंथा हुआ है और उसे ज्यादा मजबूत बनाता है।

क्यों देखें

अगर आप मानवता को झंझोड़ देने वाली सच्ची घटना से दो चार होना चाहते हैं तो ये फिल्म मिस न करें।


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Mayapuri

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