‘‘मैं भी स्ट्गल करते करते यहां तक पहुॅचा हूँ.’’ -दिव्येंंदु शर्मा

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‘‘प्यार का पंचनामा’’, ‘‘चश्मेबद्दूर’’ और ‘‘इक्कीस तोपों की सलामी’’ जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुके अभिनेता इन दिनों निर्देशक जपिंदर की फिल्म ‘‘दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रेंड’’ को लेकर उत्साहित हैं.

Abhinav Shukla, Anupam Kher, Asheema Shukla, Divyendu Sharma and R. K. Laxman
फिल्म ‘‘दिल्ली वाली जालिम गर्लफे्रंड’’ से क्या सोचकर जुड़े?
-जब मैं पहली बार जपिंदर बावेजा से मिला. और कहानी सुनी,तो मुझे कथानक पसंद आया. फिर इसका लेखन मनु रिषि कर रहे थे, तो मैं आश्वस्त हो चुका था कि जो पटकथा तैयार होगी, वह सही होगी.वह अच्छे लेखक हैं. मुझे उनकी लिखी हुई फिल्म ‘ओह लक्की लक्की ओए’ बहुत पसंद आयी थी. फिर दिल्ली की कहानी थी, तो यह भी पता था कि मनु रिषी नकली दिल्ली नहीं दिखाएंगे.फिर एक मामुली इंसान क्या क्या कर सकता है, उसकी कथा है. इस बात ने भी मुझे प्रेरित किया.कमाल की कहानी है. तो मुझे अपना किरदार पसंद आया.यह नेक्स्ट डोर ब्वॉय है.

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अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?
-मैंने इसमें धु्रव का किरदार निभाया है, जो कि आई ए एस की परीक्षा देने के लिए तैयारी कर रहा है.नार्थ कैम्पस के इर्द गिर्द की कहानी है.मैंने भी नॉर्थ कैम्पस के ही किरोड़ीमल कालेज से पढ़ाई पूरी की है.ध्र्रुव फिल्मी सपने बहुत देखता है.मस्ती भी करता है.यह एक कम्पलीट किरदार है.यह ब्लैक एंड व्हाइट किरदार नहीं है.इसमें संजीदगी है.उसे पता है कि कहीं भी लाइन पार नहीं करनी है.ध्रुव जब अपने दोस्तों के साथ होता है,तो वहां वह उनके साथ मजाक करता है.यानी कि यह एकदम रियालिस्टिक किरदार है, इसलिए मैं इसके साथ जुड़ा.
क्या ध्रुव के किरदार में आपने अपने आस पास के किसी इंसान की कोई बात डाली है?
-नहीं!मेरी राय में हर किरदार को स्क्रिप्ट के अंदर ही ढूंढ़कर निकालना चाहिए.यदि कोई आटोबायोग्राफी है,तो बात अलग है.मैं स्क्रिप्ट में लिखे गए किरदार में ही छोटी छोटी चीजें खोजकर उसे नए ढंग से गढ़ने का प्रयास करता हॅूं.कई बार आसान हो जाता है.मैं हमेशा नई चीज इजाद करने का प्रयास करता हूं.स्क्रिप्ट से क्लू लेता हूं.लेखक के साथ बैठकर विचार विमर्श करता हूं.और चरित्र गढ़ता हॅू.

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मगर कलाकार अपने हिसाब से चरित्र को सोचकर सेट पर जाता है.वहां पर निर्देशक की अपनी सोच होती है.उस वक्त क्या होता है?
-जब स्क्रिप्ट अच्छी हो तो बदलने की जरुरत नहीं पड़ती.मगर स्क्रिप्ट यानी कि कागज के पन्नों पर जो लिखा है,वह ज्यों का त्यों परदे पर नहीं आता.सेट पर हमेशा उसमें इम्प्रूवाइजेशन होता रहता है. अब तक मैंने जिन निर्देशकों के साथ काम किया है, वह सभी लिबरल रहे हैं. और अच्छी चीज को महत्व देते रहे हैं. फिल्म मेंकिंग में लकीर का फकीर नहीं बना जा सकता. मैंने फिल्म एंड टेलीवीजन इंस्टीट्यूट पुणे में जो ट्रेनिंग ली है,उसकी मुझे काफी मदद मिलती है.

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बतौर निर्देशक जपिंदर की यह पहली फिल्म है. उनकी परवरिश दुबई में हुई है. दुबई और भारत की संस्कृति व संजीदगी में भी फर्क है.ऐसे में आपको उनके साथ फिल्म करने के लिए विश्वास कैसे आया?
-जब मुझे पता चला कि जपिंदर की निर्देशक के तौर पर यह पहली फिल्म है, तो मैंने यह जानने का प्रयास किया कि स्क्रिप्ट व फिल्म के कॉसेप्ट को लेकर दिमागी तौर पर वह कितना क्लीयर हैं. मैने स्क्रिप्ट पढ़कर यह जानने का प्रयास किया कि इसमें अच्छी फिल्म बनने की कितनी गुंजाइश है. मुझे नए लोगों के साथ काम करने में कभी हिचक नहीं होती. कभी मैं भी एकदम नया कलाकार था. मैं भी स्ट्गल करते करते यहां तक पहुॅचा हॅूं. यदि मैं नए निर्देशक के साथ काम नहीं करुॅंगा, तो यह मेरी सबसे बड़ी बेवकूफी होगी. जहॉं तक जपिंदर की संजीदगी का सवाल है, तो वह दुबई में रही हैं. मगर वह मूलतः सरदार पंजाबी हैं. उनकी जड़ें भारत में ही हैं. दुबई में भी उनके घर में भारतीयता वाला ही माहौल रहा है. उनसे मिलने के बाद मुझे यह नहीं लगा कि वह दुबई की रहने वाली हैं.बल्कि मुझे लगा कि वह एक शहरी लड़की हैं.

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जपिंदर के साथ काम करने के क्या अनुभव रहे?
-बहुत अच्छे और खट्टे मीठे अनुभव रहे.नए निर्देशकों में एक अलग तरह की एनर्जी, जोश होता है.चीज़ों को लेकर उनके अंदर जहॉं कॉन्फीडेसं होता है, वहीं जरा सी गड़बड़ी होने पर वह बहुत जल्दी डर जाते हैं. तो उनकी यात्रा देखने में मजा आता है. दो तीन फिल्में करने के अलावा ‘पुणे फिल्म संस्थान’ की ट्रेनिंग के अनुभव के आधार पर हम उनसे कहते थे कि टेंशन की बात नहीं है. इसे इस तरह सही किया जा सकता है.जब हम नए लोगों के साथ काम करते हैं, तो फिल्म मेंकिंग के प्रोसेस से ज्यादा जुड़ जाते हैं.जो कि हमारे लिए ज्ञानववर्धक होने के साथ साथ हमें ज्यादा अनुभवी बनाता है. बड़े फिल्मकारों के साथ काम करते समय हम सेट पर एक कलाकार होते हैं.
फिल्म का नाम‘‘दिल्ली वाली जालिम गर्ल फ्रेंड’’क्यों?
-नाम बड़ा मजेदार है.इसमें तीन चीजे हैं.दिल्ली वाली,जालिम और गर्लफ्रेंड.यह नाम आज की युवापीढ़ी के साथ जल्दी कनेक्ट होता है. आजकल गर्लफ्रेंंड व ब्वॉयफ्रेंड का कल्चर ज्यादा हावी है. जालिम तो हास्य का पुट है. जब आप किसी रिलेशनशिप में होेते हैं और वह लड़की आपको धोखा दे देती है या वह आपके प्यार को नहीं समझ पाती, तो आपको लगता है कि पूरी दुनिया खत्म हो गयी.सामने वाला युवक सोचने लगता है कि वह दुनिया का सबसे ज्यादा सताया हुआ इंसान है.उससे ज्यादा बुरा किसी के साथ नहीं हो सकता. लेकिन वही छोटी सी बात इंसान को किसी दूसरी चीज तक  ले जाती हैै. इंसान में समझ और मैच्योरिटी आती है.
आप एक तरफ डेविड ध्यान जैसे स्थापित निर्देशक के साथ ‘‘चश्मेबद्दूर’’ करते है.तो दूसरी तरफ जपिंदर जैसी नई निर्देशक के साथ ‘दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रेंड’ करते हैं. किनके साथ काम करना ज्यादा सहज होता है?
-स्थापित या बड़े फिल्मकारों के साथ काम करते समय कलाकार के तौर पर हमें टेंशन लेने की जरुरत नहीं होती है. डेविड धवन के साथ ‘‘चश्मेबद्दूर’’ कर रहा था, तो हमें पता था कि वह अब तक चालिस फिल्में निर्देशित कर चुके हैं. इसलिए मुझे थोड़ा सा उनसे डर था कि मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतर पाउंगा या नहीं. नए लोगों के साथ काम करते समय उनके अंदर का स्पार्क हमें उत्साहित करता रहता है. नए लोग किसी भी बात या सीन को ‘ग्रांटेड’ लेकर नहीं चलते. पर इस सवाल का सही जवाब मैं दस पंद्रह फिल्में करने केे बाद ज्यादा सही ढंग से दे पाउंगा. पर यदि आप फिल्म के सेट पर पूरी तरह से इंवाल्ब हैं, तो काम करने का मजा अलग होता है. वैसे मैं निर्देशक के नाम की बनिस्बत स्क्रिप्ट व किरदार पर ज्यादा तवज्जो देता हॅूं.
कोई दूसरी फिल्म कर रहे हैं?
-अनिल कपूर प्रोडक्शन की एक फिल्म कर रहा हूं, जिसकी पूरी शूटिंग अमरीका में होनी है. मैंने एक फिल्म की है ‘द लास्ट रेब’. यह एक प्रयोगात्मक फिल्म है. दो फिल्में और हैं मेरे पास.पर उन पर मैं अभी बात नहीं करना चाहता. मैं हमेशा कुछ नया खोजता रहता हूं. पर जब दिल करता है,तभी काम करता हूं.


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Mayapuri

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