मां तो बनना चाहती हूं फिर भी – उर्मिला भट्ट

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Sulochana

 

मायापुरी अंक 41,1975

तब मैं शायद सात साल की रही हूंगी जब मुझें पहली बार एक ड्रामे के लिए स्टेज पर खड़ा किया गया था। तब मैं स्टेज को हंसी मजाक समझती थी, और फिल्म क्या होती है, मुझें बिल्कुल भी पता नही था। स्टेज पर आने से पहले सब मुझसे पूछते, “बेबी हमारे ड्रामे में काम करोगी?” और मैं फ्रॉक के घेरों को झुलाते हुए कहती हां करूंगी।“ लेकिन जब पहले दिन मैं ड्रामे के लिए स्टेज पर आई और सामने दर्शकों में सारे पहचान वाले लोगों को देखता तो मैं भागकर पर्दे के पीछे छुप गई। शर्म से मेरा चेहरा लाल हो गया था और दिल धक-धक करने लगा था।

और फिर यही सात साल की लड़की जब बड़ी होकर गुजराती रंगमंच पर अवतरित हुई तो गुजराती मंच ने एक नया मोड़ लिया। उर्मिला भट्ट के रिहर्सल से तंग आकर उर्मिला के पति श्री भट्ट ने एक बार सिर पर हाथ मारते हुए कहा था पता नही, तुम्हें क्या हो गया है? एक्सप्रेशन कही जा रहे हैं,डायलॉग डिलीवरी कहीं। पता नहीं तुम इस ड्रामे के बाद मुझें चेहरा दिखाने लायक भी रखोगी या नही?” मार्कण्ड जी का हर रिहर्सल के बाद यही रवैया रहता और बेचारी उर्मिला जी! का एक और पति था दूसरी ओर ड्रामे का निर्देशक उन्हें एक साथ में दोनों पुल पार करने थे लेकिन सच बात तो यह है कि उर्मिला भट्ट आज फिल्मों में बेहद लोकप्रिय और सफल होने के बावजूद कला-संसार और घर संसार के बीच एक पुल बनी हुई हैं। वह पुल जिसकी मेहराबें आदर्श, स्नेह और कर्तव्य की ईंटो पर खड़ी हैं।

चार बार उर्मिला जी को फोन करने के बाद उन्होंने मुझें ताजमहल होटल के ‘सीलांज’ में समय दिया था। मैं समय से पहले ही पहुंच गया था लेकिन एक घंटे के बाद भी उर्मिला जी का कोई पता न था।

दूसरे दिन फोन पर पता चला कि उर्मिला जी ताजमहल के कमरा नं. 403 में ही ठहरी हुई हैं और फिर 403 में ही मैंने उर्मिला जी से मुलाकात की साथ ही वह गलतफहमी भी दूर हो गई जो एक दिन पूर्व पैदा हो गयी थी। वह मैक्सी और काले परिधान में बिल्कुल अल्हड़ युवती बनी आंखो पर ‘हरे राम हरे’ कृष्ण छाप काले बड़े फ्रेम का चश्मा लगाकर ‘सीलांज’ में गई थीं और मैं बाहर गैलरी में बैठा उस ‘आइडियल वुमेन’ और जिंदगी से सवालों में उलझी नारी का इंतजार कर रहा था जिसे मैंने फिल्म के पर्दे पर सबसे पहले ‘फिर भी’में देखा था।

‘फिर भी’ क्या आपकी पहली फिल्म है मैंने पूछा।

“नही” उर्मिला जी ने कहा, मेरी पहली फिल्म बी.आर चोपड़ा की ‘हमराज’ थी। इसमें मैंने मदनपुरी की पत्नी की भूमिका की थी। दरअसल मैं यूं ही ‘हमराज’ की शूटिंग देखने गई थीं और वहीं किसी ने चोपड़ा जी को बता दिया था कि उर्मिला गुजराती स्टेज का एक चर्चित नाम हैं। चोपड़ा जी ने साफ साफ कहा, रोल एकदम छोटा है, कर सकें तो कर लें मैंने फिल्म को ‘कमर्शियल’ रूप में कभी नही लिया। मैंने हां कर दी। सोचा एक्सपैरिमेंट ही सही। इसके बाद ’संघर्ष’ में स्व. बलराज साहनी और दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिला जो अपने आप में एक एडवेंचर था, एक एंजॉय।“

उर्मिला जी ने कभी फिल्म को व्यवसाय न बनाने का जो फैसला किया था, वह अब धीरे-धीरे टूटता जा रहा है। ‘फिर भी’ के बाद उन्हें मां की भूमिकाओं में करीब डेढ़ फिल्मों में पर्दे पर दिखाया जा चुका है और इस समय पच्चीस से भी अधिक फिल्में उनके पास हैं। वह मुंबई में अपने संबंधियों के साथ रहती हैं या फिर ताजमहल होटल में, क्योंकि उनके पति मार्कण्ड भट्ट बड़ौदा विश्वविद्यालय (गुजरात) में प्रोफेसर हैं। “अब जहां पति हो वही घर होता है” उर्मिला जी ने कहा।

बच्चे भी वही रहते हैं। जब भी फुर्सत मिलती है, बड़ौदा जाकर मिल आती हूं नही तो यही मुंबई से फोन पर उनसे बातें कर लेती हूं।“

और यह वक्तव्य उस समय सबूत के तौर पर मेरे सामने आया, जब ‘403’ के फोन की घंटी बजी और पति पत्नी ने बच्चों से बातें की।

“आर्टिस्ट के लिए कुर्बानियां देना बेहद जरूरी है।” जब मार्कण्ड जी ने यह कहा तो मैं पूछ बैठा, “क्या मतलब”

और फिर जो कुछ उन्होंने बताया वह काफी था। स्टेज से लेकर फिल्म तक के सफर में जो भी दर्दनाक अहसास पति-पत्नी के बीच गुजरे, उन्हें हंसते-हंसते सहन करने का ही परिणाम है जो आज भी उर्मिला जी से जुड़ी हुई है वरना

“एक ड्रामे में रिहर्सल के दौरान और स्टेज पर उर्मिला अपने साथ वाले एक्टर से इस हद तक इंवॉल्व हो गई कि मैं गलतफहमी में पड़ गया” मार्कण्ड जी ने बिना कुछ छुपाये बताया, मुझें लगने लगा कि उर्मिला अब मुझें सिर्फ एक डायरेक्टर समझती हैं, पति नही, लेकिन उनके अंदर एक बहुत बड़ी औरत है जिसे मैंने सिर्फ स्टेज पर देखा है, महसूस किया है और अपने दोस्तों से कहा नही यह उर्मिला मेरी पत्नी नही हो सकती। यह तो वह औरत है जो मेरे ड्रामों के पात्रों में जी गई है।“मैं स्टेज पर आज तक उर्मिला को सिर्फ केरेक्टर समज कर जानता रहा हूं और आज जब वह मेरे पास होती हैं तो मुझें लगता है वह मेरी वही उर्मिला हैं जिसका फिल्म और स्टेज से दूर का भी संबंध नही है। प्रोफेशन घर की दीवारें मिटा भी सकता है लेकिन मेरे लिए यह खुशी की बात रही है कि प्रोफेशन से संबंधो या पारिवारिक जीवन पर जरा सा भी फर्क नही पड़ा है।“

“इसकी वजह…?”

सिर्फ यही कि उर्मिला स्टेज या कैमरे के सामने अभिनेत्री होती है, जिसका मेरी पत्नी से कोई संबंध नही है लेकिन घर में मेरे और बच्चों के बीच वह सिर्फ पत्नी होती हैं। व्यक्तिगत जीवन में वह किसी भी दृष्टिकोण से एक्ट्रेस महसूस नही होती। यही बात उन ड्रामों की रिहर्सल में हुआ करती थीं जिसमें वह काम करती थीं और मैं भी। पूरी रिहर्सलों में मैं उर्मिला पर बिगड़ता रहता, रिहर्सल रूम से बाहर निकल जाता लेकिन जिस दिन प्ले होता मैं यह देखकर हैरान हो जाता कि क्या यह वही उर्मिला है जो रिहर्सलों के दौरान हजारों बार मेरी डांट खा चुकी हैं? ऐसा ही कुछ “शेतल कांठे” (शीतल नदी के किनारे) के दौरान हुआ था और इसी ड्रामे में उर्मिला को बैस्ट एक्ट्रेस के लिए अवार्ड भी मिला। मुंबई में इस प्ले ने एक साथ पांच पुरस्कार प्राप्त किये थे। ‘जेसल तोरल’ के लिए भी उर्मिला को गुजरात राज्य पुरस्कार हुआ था जिसमें उन्होंने नायिका तोरल के रूप में काम किया था।

‘घरा गुर्जरी’ नाटक में जब उर्मिला को अवार्ड मिला तो वह कलकत्ता में थी। उन्होंने मुझे फोन किया, “मुझें बधाई दीजिए। मुझे अवार्ड मिला है।“

मुझे भी बधाई चाहिए भई। मुझें भी ‘अवार्ड’ मिला है।“ मैंने फोन पर ही उत्तर दिया था।

और यह एक संयोग की बात है कि ‘घरा गुर्जरी’ के लिए नायक नायिका के रूप में पति-पत्नि को ही श्रेष्ठ अभिनय का पुरस्कार मिला था। मार्कण्ड भट्ट और उर्मिला भट्ट की जोड़ी उस समय गुजरात स्टेज पर बहुत लोकप्रिय थी।

‘फिर भी’ में आपको किस प्रकार काम मिला?”

पूछने पर उर्मिला जी ने बताया कि मुंबई में ही ‘जेसल तोरल’ (गुजरात की प्रसिद्ध लोक-कथा) नाटक के दौरान ‘फिर भी’ के निर्माता निर्देशक शिवेन्द्र सिन्हा से मुलाकात हुई और उन्होंने कहा मेरी फिल्म में एक ऐसी मां की भूमिका है जो बाहर से बुरी और अंदर से अच्छी है।“

और इस प्रकार मैं ‘फिर भी’ की मां बन गई। वह मां जो एक तरफ अपने जीवन से अस्त है, फ्रास्ट्रेटेड है ओर दूसरी औ बेटी की जिंदगी उसे खाये जा रही है। दरअसल मेरे लिए यह एक चैलेजिंग रोल था और इसलिए मैंने इसे किया था।“

आपकी गुजराती भाषी है, हिंदी संवादो की तकलीफ जरूर सामने आई होगी?”

हां इसके लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ी। मैं शिवेन्द्र जी से रिहर्सल के लिए सारे डायलॉग टेप करके ले जाती और फिर उन्हें घर पर रटती, उच्चारण सुधारती। इसी मेहनत का परिणाम था कि दिल्ली में जब ‘फिर भी’ का प्रेस शो हुआ तो एक पत्रकार ने मुझसे पूछा था आपने इस कदर साफ हिन्दी कैसे बोली?

इस फिल्म के लिए मुझें एक साथ पांच अवार्ड मिले थे और ये सभी ‘अवार्ड’ मुझें विभिन्न पत्रकार समिति, उत्तर प्रदेश पत्रकार संघ, हैदराबाद, महाराष्ट्र फिल्म फैंस एसोसिएशन तथा गुजरात राज्य की ओर से दिये गये थे!‘फिर भी’ की शूटिंग के दौरान ही शिवेन्द्र सिन्हा ने मुझसे कहा था कि उर्मिला इस फिल्म से तुम्हें और तो कुछ नही मिल पायेगा, हां मां की भूमिकाएं जरूर हिंदी फिल्मों में मिलने लगेंगी। हुआ भी यही। आज मैं बड़े-बड़े स्टारों की मां के रोल कर रही हूं। बालों के बीच सफेदी की लकीर मेरी इमेज है और मुझे मां बनने का जो हक फिल्मों ने दिया है, मैं इसके लिए हिन्दी फिल्मों की ऋणी हूं क्योंकि यह स्थान हमारी फिल्मों में हर एक्ट्रेस को नही मिल पाता। अब तो। मैं इतनी बार मां बन चुकी हूं कि आम जिंदगी में भी लगता है कि मैं सबकी मां हूं। मुझें मां बनने में कोई आपत्ति नही, फिर भी चाहती हूं कि रुटीन मां से अलग ‘फिर भी’ जैसी मां से कभी मुलाकात हो, एक चैलेंज हो तो कुछ आत्मसंतोष भी मिले, क्योंकि में फिल्मों में ‘प्रोफेशन’ के लिए और आत्मसंतोष के लिए आई हूं।“


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Mayapuri

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