‘‘हम लोग’’की उषा रानी, ‘‘महाभारत’’की गांधारी और ‘‘चाणक्य’’की मैत्री यानीकि अभिनेत्री रेणुका इसरानी से खास बातचीतः

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‘‘धारावाहिक‘महाभारत’की गांधारी कहीं से भी एक कमजोर औरत नही है.’’
-रेणुका इसरानी

इन दिनों दूरदर्शन पर 31 वर्ष बाद दो धारावाहिकों ‘‘महाभारत’’ और ‘‘चाणक्य’’का पुनः प्रसारण हो रहा है.इन दोनों धारावाहिकों में अभिनेत्री रेणुका इसरानी अलग अलग किरदारों में नजर आ रही हैं और लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर रही हैं.

प्रस्तुत है ‘‘मायापुरी’’ के लिए उनसे हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश…
31 साल बाद आज जिस तरह की स्थितियां बनी हुई हैं,उनमें धारावाहिक ‘‘महाभारत’’ और ‘‘चाणक्य’’दोनों का पुनः प्रसारण कितना सार्थक है?

-देखिए,दोनों ही धारावाहिकों का पुनः प्रसारण सार्थक तो बहुत ज्यादा है.तीस वर्ष पहले जब यह प्रसारित हुए थे,तब भी यह सार्थक थे.‘‘चाणक्य’’में देश के राजा और राजनीति को लेकर जो कुछ कहा गया है,वह आज की सबसे बड़ी जरुरत है.मैंने ‘‘चाणक्य’’में आचार्य अजय की पत्नी मैत्री का किरदार निभाया है.जब तक मानव रहेगा,तब तक ‘‘चाणक्य’’की सार्थकता बरकरार रहेगी.
इसी तरह ‘‘महाभारत’’ शासन के अलावा रिश्तों को लेकर भी बहतु कुछ कहता है.जब हम ‘महाभारत’में गांधारी का किरदार निभा रहे थे,उस वक्त भी मुझे ऐसा लगता था कि यह एक समसामायिक ग्रंथ है.और हर युग में,हर समय ‘महाभारत’की कथा और महाभारत सीरियल प्रांसगिक व सार्थक रहेगा.मतलब हर युग के दर्शक जब इस कथा के साथ खुद को जोड़कर जब देखेंगे,तो उन्हे यह अहसास होगा कि यह बातें इस दशक में भी हुई हैं और उस दशक में भी हुई थीं.अभी भी हो रही है.
मैंने गांधारी का किरदार निभाया है,इसलिए ऐसा नही कह रही.मगर एक जगह गांधारी का जो मातृत्व है,जिसको उसने बहुत वक्त से दबा कर रखा था,वह भी उमड़ आता है और तब वह दुर्योधन को शक्ति देती है.तो मुझे लगता है कि ‘महाभारत’के समय से लेकर अभी तक हर युग में कोई ना कोई पक्ष उससे मिलता ही है.

आपकी नजर में ‘‘महाभारत’’?
-‘महाभारत’ अंतरराष्ट्रीय विषय है.हर युग और वक्त के साथ ‘‘महाभारत’’ वैसा ही चलता रहेगा.हर देश,हर राज्य,हर जाति,हर भाषा में चल जाएगा.आखिर हाॅलीवुड फिल्मकार पीटर ने क्यों महाभारत बनाई?उस अंतश्रर्राष्ट्रीय निर्देशक ने विश्व के कई देशों के अलग- अलग कलाकारों को लेकर अंग्रेजी में ‘महाभारत’बनाई. क्योंकि वह भी इससे प्रभावित हुए.उनको लगा कि यह तो अंतरराष्ट्रीय विषय है,यह किसी एक जगह की कथा या विषय नहीं है.

आपने गांधारी का ही किरदार क्यों स्वीकार किया या आपको इसी  किरदार ऑफर मिला था?
-सच कहूॅं तो मैं द्रौपदी,गांधारी या कुंती इन तीन में से किसी एक किरदार को निभाना चाहती थी.मैंने नेशनल स्कूल आफ ड्रामा में एक्टिंग की ट्रेनिंग के दौरान एक नाटक में गांधारी का किरदार निभाया था.उस वक्त मैंने गंधारी के किरदार के बारे में काफी गहराई से पढ़ा था.फिर भी मेरी बहुत इच्छा थी कि मुझे द्रौपदी का किरदार मिले.लेकिन शायद ऑडिशन के दौरान मेरा प्रजेंटेशन चोपड़ा साहब को गांधारी के लिए ज्यादा सटीक लगा.क्योंकि जब मैंने ऑडीशन दिया था, तब उन्होंने मुझे स्क्रिप्ट दी थी कि इस स्क्रिप्ट से ही संवाद बोलने हैं.मगर मैंने वह संवाद बोलने की बजाय ‘ययाति’नामक नाटक की शर्मिष्ठा पात्र के संवाद बोले थे,जो कि आंखों के ऊपर थे.जब मैंने आंखें बंद की,तो मैंने क्या देखा?इसको लेकर बहुत बड़ा संवाद था.शायद उनको उस समय आंखों के ऊपर यह संवाद ऐसा भा गया कि उन्होेने मुझे गंधारी के लिए चुना.
उसके बाद एक दिन हम लोग बी आर चोपड़ा साहब के आफिस में बैठे हुए थे.तभी हां कुछ पत्रकार आ गए.उन पत्रकारों ने मुझसे  पूछा था कि आंखों पर पट्टी क्यों बांधी है?तो मैंने कहा कि यह बात आप चोपड़ा सर से ही पूछिए,क्योंकि वही निर्माता व निर्देशक हैं.पता नही इन्होने मुझमें ऐसा क्या देखा कि मुझे पट्टी वाला किरदार दिया.तब चोपड़ा साहब ने जवाब दिया था,अब वह मजाक में था या नहीं,यह नही कह कहती.पर उन्होेने जवाब दिया था कि,‘इनकी आंखें बहुत खूबसूरत हैं.’पर ‘महाभारत’’में एक दृष्य में गांधारी अपनी आंखो की पट्टी हटाकर दुर्योधन को देेखकर षक्ति देती है.तो हम दर्शकों के लिए एक सस्पेंस भी रखना चाहते हैं.इस पट्टी के पीछे उनकी आँखें कैसी है?यह दर्शको के लिए सस्पेंस है,यह बात भी हो सकती है.लेकिन ऑडीशन में मैंने अपनी पसंद का संवाद बोला,जिससे उन्हें बतौर कलाकार मेरे अंदर वह क्षमता नजर आयी होगी,कि उन्होेने ‘गांधारी’जैसे कठिन किरदार को निभाने के लिए मुझे चुना होगा.

 

अभिनय के दृष्टिकोण से हर कलाकार के लिए उसकी आँखें हथियार होती हैं.मगर गांधारी की आंखो पर पट्टी बंधी है?ऐसे में?
-आपने एकदम दुरूस्त फरमाया.एक कलाकार की आंखें उसके लिए भाव अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा हथियार होती हैं.लेकिन अगर कलाकार से उसका यह हथियार ही छीन लिया जाए,तो कलाकार के लिए अपने आपको एक्सप्रेस करना बहुत मुश्किल हो जाता है.मुझे गांधारी का किरदार निभाना इसीलिए कठिन लगा,क्योंकि मेरा यह हथियार मुझसे छीन लिया गया था.अब मुझे बिना आंखों से अपने आपको एक्सप्रेस करना था.इसके लिए मैंने काफी मेहनत की थी.संवाद अदायगी पर काफी मेहनत की थी.मैने इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया कि मुझे संवाद अदायगी किस तरह से करनी है और अपने फिजिकल प्रजेंटेशन/बाॅडी लैंगवेज पर खास ध्यान दिया.मेरी कोशिश यह रहती थी कि मैं अपने किरदार की आत्मा पर फोकस करूं.जिससे ज्यादा से ज्यादा दर्शक किरदार के साथ बंध सकें.

आपके अनुसार गांधारी क्या है?आज की तारीख में उसकी क्या उपयोगिता है?
-जितना मैने पढ़ा और समझा है,उसके अनुसार तीन चीजें हैं,जो कि ‘महाभारत’में भी दिखाया गया है.पहला कि गांधारी ने आंखों पर पट्टी इसलिए बांधी क्योंकि वह महसूस करना चाहती थी कि जिससे मेरा विवाह होने वाला है,वह क्या महसूस करता है?अपने जीवन में उसको कितना कष्ट हो सकता है? खुद गांधारी का संवाद है-मैं इस दर्द को महसूस करना चाहती हूं,इसलिए मैंने पट्टी बांधी.’लेकिन निजी जीवन में मैने जो पढ़ा है,उसके अनुसार आंखों पर पट्टी बांधने की वजह तत्कालीन परिस्थितियां हो सकती है.उस काल में बहुत बड़े बड़े राज्यों से खुद को सुरक्षित व अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए छोटे छोटे राज्य,बड़े बड़े राज्यों के साथ जुड़ना चाहते थे.उनसे मित्रता करना चाहते थे.अगर वह उनके साथ मित्रता नहीं करेंगे,तो एक तरह से देखा जाए कहीं ना कहीं दुश्मनी हो जाती.ऐसे में छोटे राज्य अपने आप को कहीं ना कहीं असुरक्षित समझते थे.तो मुझे बतौर गांधारी ऐसा लगा कि अगर मैं इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करूंगी,तो कहीं ना कहीं मेरे पिता का राज्य असुरक्षित हो सकता है.क्योंकि  गांधारी कहीं ना कहीं धृष्टराष्ट् से षादी का प्रस्ताव ठुकराकर उनकी बेज्जती करती,बड़े राज्य का सम्मान न करती.इसीलिए गांधारी द्वारा अपनी आंख में पट्टी बांधने की यह भी एक वजह हो सकती है.हर पक्ष  को एक घंटे के एपीसोड और दस से पंद्रह मिनट के दृष्य में दिखा पाना संभव नही होता.फिर भी डाॅ. बी आर चोपड़ा साहब ने जो कुछ दिखाया, उसमे मेरी राय है कि दिखा कि मैंने अपने राज्य के प्रति अपना प्रेम दिखाया है,कि जिस व्यक्ति से गांधारी का विवाह हो रहा है,वह क्या महसूस करता है.तो मैं भी उसी यात्रा में उनके साथ शामिल हो जाऊं.उस वक्त क्या था?उस युग में आपके पास हर प्रकार की सहायता थी.रानी या महारानी के पास कई तरह के दास दासियां थी.उनके इर्द गिर्द हर प्रकार के लोग मदद के लिए रहते थे.मंत्री होते थे.रानियां होती थीं.तो आप किसी भी प्रकार से असहाय नहीं थे.क्योंकि आपको कहीं ना कहीं सहयोग मिल रहा है.लेकिन यदि आज के युग में देखा जाए,आज के वक्त में देखा जाए,तो मैं कहना चाहूंगी कि गांधारी ने जो किया,वैसा वर्तमान में कोई भी लड़की न करे.वर्तमान समय में किसी भी सूरत में किसी भी लड़की को अपनी आंखों पर पट्टी नहीं बांधनी चाहिए. मेरा मानना है कि ‘‘महाभारत’’काल की गांधारी और वर्तमान समय की गांधारी में यह विभिन्नता होना ही चाहिए.

जब‘‘महाभारत’’का पुनः प्रसारण हो रहा है,ऐसे में वर्तमान युग की नई पीढ़ी इसे देखकर ‘‘महाभारत’’और और गांधारी के किरदार से क्या शिक्षा ले सकती हैै?
-देखिए,गांधारी क्या है?गांधारी को सात शक्तियों में एक माना गया था.यह शक्तियां क्या थीं?इन शक्तियों के चलते पवित्र स्त्रियां हमेशा सच का साथ देती थीं.सिर्फ साथ ही नहीं देती थी,उसके लिए वह लड़ती भी थीं.उनके जो विचार थे,वह विचारों से लड़ती थीं.देखिए,गांधारी ने उस समय आंखों पर जो पट्टी बांधी थी,यह उसकी कमजोरी नहीं थी,बल्कि उस युग की उसकी ताकत थी.यहां तक कि पट्टी बांधकर हस्तिनापुर आने पर भी उसने जो गलत हो रहा है,उसका विरोध और जो सही हो रहा है,उसका साथ दिया था.दुर्योधन उसका जेष्ठ पुत्र था,जिसको वह गलत मान रही थी.इसी के चलते एक दिन वह भीष्म पितामह से कहती है कि वह दुर्योधन को श्राप देना चाहती है,मगर भीष्म पितामह ने उसे रोक दिया था.फिर कहीं ना कहीं मां होनेे के नाते पुत्र का एक लोभ आ गया,उसका पुत्र लालच के कारण कमजोर है.गांधारी देखती है कि उसके पति धृतराष्ट् पुत्र मोह के कारण सही निर्णय नहीं ले पा रहे हैं,जिसके चलते कहीं ना कहीं कुछ अन्याय हो रहा है.गांधारी ने हमेशा कोशिश की कि वह न्याय प्रिय रहें.देखिए,गांधारी कहीं से भी एक कमजोर औरत नही है.

आपने अभी कहा कि अपने राज्य को सुरक्षित रखने के लिए गांधारी अपनी आंखों पर पट्टी बांधना स्वीकार करती है?
-मेरी राय मे यह भी एक पक्ष हो सकता है.पर बी आर चोपड़ा साहब ने इस बात को नही दिखाया है.लेकिन जब मैंने रामकुमार भ्रमर की ‘महाभारत’में ऐसा पढ़ा है.उन्होंने कौरव वंश के प्रति कई सारी चीजें लिखी थी.उन्होने दुर्योधन,गांधारी,कर्ण आदि के ऊपर अलग अलग किताबें लिखी हैं.धृतराष्ट्र के ऊपर लिखी किताब में उन्होंने यह बताया था कि यह पक्ष भी कितना सही है.

यदि आपकी बात माने लें कि गांधारी ने अपने राज्य को सुरक्षित रखने के लिए आंखों पर पट्टी बांधी,तो फिर हस्तिनापुर में वह हमेशा धृतराष्ट्र के खिलाफ रहती है.ऐसे में गांधारी के किरदार में यह विरेाधाभास नही हो जाएगा?
-देखिए,मैंने यह भी कहा कि गांधारी एक मां है और हर मां की तरह उसके अंदर भी पुत्र मोह है.उसको एक डर हमेषा सताता रहता  है.गांधारी का अपना दर्द है कि उसके  पुत्रों को राज्य मिलना चाहिए.लेकिन इससे पहले यदि पांडवों से कहानी शुरू की जाए,नीति के हिसाब से हस्तिनापुर की गद्दी के हकदार तो धृटराष्ट् थे,वहीं कुरूवंष के जेष्ठ पुत्र थे.मगर विदुर नीति के चलते नही मिली.धृतराष्ट्र को गद्दी नहीं मिली,क्योंकि वह अपंग/अंधे थे.जो आदमी अपंग हो,उसेे सत्ता नहीं मिल सकती.  इसीलिए उनके छोटे भाई पांडु को गद्दी मिली.गांधारी को भी इस बात का अहसास था.

लेकिन‘‘महाभारत’’की शुरुआत में राजा भरत कहते हैं कि राजा वही होगा,जो सुयोग्य होगा,वंश के आधार पर नहीं?
-धृतराष्ट् भी सुयोग्य है.पहले धृतराष्ट्र को ही राजा बनाना तय हुआ था.लेकिन महामंत्री विदुर जी ने कह दिया कि अपंग को राजा नही बनाा जा सकता.उसके बाद जब पांडु वन में गए,तब वह अपनी जगह धृतराष्ट्र को अपने प्रतिनिधि के तौर पर गद्दी देकर गए थे.अपनी जगह देकर गए थे,कि जब मैं वापस आऊं,तब तक इस गद्दी को सिंहासन को वह संभालें.तो धृतराष्ट्,पाडु का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.अब कुरूवंष के जेष्ठ पुत्र धृतराष्ट् के जेष्ठ पुत्र दुर्योधन हैं और पांडु के जेष्ठ पुत्र युधिष्ठिर हैं.
तो धृतराष्ट् के जेष्ठ पुत्र दुर्योधन हैं,मगर पांडु पुत्र युधिष्ठिर का जन्म पहले हुआ,इसलिए युधिष्ठिर जेष्ठ हुए,इस वजह से उन्हे हस्तिनापुर का सिंहासन सौंपा जाना चाहिए.तो दुर्योधन जेष्ठ पुत्र जरूर है,लेकिन वह युधिष्ठिर से तो छोटा है.
दूसरी बात जो चोपड़ा साहब ने दिखाया नहीं कि कुंती और गांधारी दोनों एक साथ गर्भवती होती हैं.लेकिन गांधारी से पहले कुंती ने युधिष्ठिर को जन्म दे दिया.इसलिए जेष्ठ पुत्र युधिष्ठिर बन गया.गांधारी इस दुःख में अपनी कोख को पीटती है.गांधारी,धृतराष्ट से कहती है कि,‘पहले तो आशा मेरी बंधी थी.लेकिन कुदरत ने जो लिखा था, उसने अपना खेल खेला और युधिष्ठिर जेष्ठ तथा दुर्योधन उससे छोटा हो गया.’ गांधारी जब अपनी कोख पीटती है,तो मांस का लोथड़ा गिरता है,जिसे देखकर रिषि व्यास जी गांधारी सेे कहते हैं कि,‘तुमने यह गलत काम किया.’फिर वह गांधारी को सलाह देते हैं कि वह  इस लोेथड़े के सौ टुकड़े कर डालो.इन्हे सौ अलग अलग दृव्य में रखा गया,जिनसे 100 पुत्र पैदा हुए.क्योंकि गांधारी को भीष्म ने सौ पुत्रों की माता होने का आषिर्वाद दिया था.जब गांधारी ने उस लोथड़े पर सौ बार चाकू चलाई,तो उसके एक सौ एक टुकड़े हो गए.एक टुकड़ा ज्यादा हो गया था,जिसे दुशाला नामक बेटी बनाया गया,पुत्र नहीं बनाया गया.इतिहास के हिसाब से कई बातें ऐसी हैं,जो कई लोगों को पता ही नहीं है.लोग सवाल करते रहते है कि गांधारी ने सौ पुत्रों को जन्म कैसे दिया?
तीसरी बात यदि हम इस विवाद में न पड़े कि दुर्योधन का जन्म युधिष्ठिर के बाद हुआ,तो भी हस्तिनापुर की गद्दी पांडु पुत्रों की थी.क्योंकि हस्तिनापुर राज सिंहासन पर आसीन धृतराष्ट्र तो पांडु का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.अब पांडु के जेष्ठ पुत्र तो युधिष्ठिर हुए,उस हिसाब से युधिष्ठिर को राज गद्दी मिलना चाहिए.
गांधारी के मन की इच्छा थी कि मेरे पति को जेष्ठ होकर भी गद्दी नहीं मिल पाई,आज भी गद्दी उनके नाम से नहीं है.तो दूसरी तरफ पहले आषा बंधी थी कि मेरा पुत्र जेष्ठ बनकर पैदा होगा,वैसा नही हो पाया.तो अंतद्र्व्ंद गांधारी के अंदर लगातार चलता रहता है.गांधारी के मन में मचने वाले इस अंतद्र्व्ंद को नकारा नहीं जा सकता.लेकिन उसका दृढ़ संकल्प था कि वह जितना हो सके,सही मार्ग पर चलने की कोशिश करूंगी. इसीलिए वह बार-बार कई चीजों के लिए आर्यपुत्र/धृतराष्ट् को मना करती थी कि,नहीं ऐसा नहीं ऐसा होना चाहिए.

बी आर चोपड़ा पर आरोप लगता है कि उन्होने ‘‘महाभारत’’को भगवान कृष्ण के नजरिए से बनाया.आपकी क्या राय है?
-मैं ऐसा नहीं कह सकती.हर फिल्मसर्जक का अपना एक दृष्टिकोण होता है.वह किसी भी कथा को अपने दृष्टिकोण के अनुसार ही पेश करता है.बी आर चोपड़ा साहब ‘‘महाभारत’’ के निर्माता व निर्देशक थे.उन्हे पूरी स्वतंत्रता थी कि वह‘‘महाभारत’’को किस तरह से बनाते हैं.यह जरुरी नही कि वह दूसरों का अनुकरण करे.
मैं यहां उदाहरण देकर बात करना चाहूंगी.बी आर चोपड़ा ने ‘‘महाभारत’’में दिखाया कि गांधारी एक वाक्य में कृष्ण को पूरे यदुवंश के नाश का श्राप दे देती है.लेकिन  यदि आपने धर्मवीर भारती के उपन्यास‘‘अंधायुग’’को पढ़ा है,तो उसमें कृष्ण को गांधारी द्वारा दिया गया श्राप पूरे डेढ़ पन्ने का है.वह कई श्राप देती है.जब मैने इस संबंध में बी आर चोपड़ा साहब से बात की थी,तो उन्होंने कहा था कि,‘अगर हम श्राप बहुत बड़ा दिखाएंगे,तो यह बात लोगों को हजम नही होगी.क्योंकि कृष्ण भगवान हैं.’इस उदाहरण से मैं बताना चाहती हूं कि बी आर चोपड़ा साहब ने इस दृश्य में कृष्ण को थोड़ा सा भगवान के रूप में दिखाया है.अन्यथा हर जगह एक मित्र के रूप में दिखाया है.तो चोपड़ा साहब ने कृष्ण के भगवान और मित्र इन दोनो रूपों को दिखाया है.
जब हम शूटिंग कर रहे थे, तब मैंने उनसे कहा था कि,‘सर गांधारी का इतना छोटा श्राप क्यों?’इसके पीछे एक वजह बतौर कलाकार खुद का लालच भी हो सकता रहा हो.क्योंकि मैं तो गांधारी का किरदार स्टेज/रंगमंच पर भी निभा चुकी थी.इसलिए मुझे इसकी थोड़ी जानकारी भी थी कि श्राप थोड़ा लंबा होना चाहिए.मगर चोपड़ा साहब ने कहा कि,‘नहीं,वह भगवान हैं.फिर उनकी जो इमेज है,वह दर्शकों के सामने वैसी नहीं रहेगी.’इस तरीके से उन्होंने मुझे थोड़ा सा समझा दिया था.साफ साफ कुछ नही कहा था.लेकिन उन्होने इशारा जरूर किया था कि यह उनका दृष्टिकोण था. उनको इस तरीके से महाभारत को आगे ले जाना था.वह भी अपनी जगह सही थे.मैं तो उस समय बतौर कलाकार लालची थी.इसलिए मैंने उनसे यह बात कह दी थी.मैं स्वीकार करती हूं कि मैं उस समय लालची थी.पर मैं उस चीज को नकारात्मक नहीं ले रही हूं.बस यह कहना चाह रही हूं कि यह उनका अपना दृष्टिकोण था कि वह किस तरह से महाभारत को आगे ले जाना चाह रहे थे.हो सकता है कि मैंने यह बात नहीं सोची,जो उन्होंने मुझे बताई.
इक्तीस वर्ष बाद‘‘महाभारत’’का पुन‘ प्रसारण हो रहा है,तो अब आप इसे देखती हैं अथवा नहीं?
-इन दिनों मैं ‘‘महाभारत’’एक कलाकार के तौर पर नहीं,बल्कि दर्षक के तौर पर देखती हूँ.तीस वर्ष पहले जब ‘महाभारत’प्रसारित हुआ करता था,तो हम अक्सर देख नहीं पाते थे.क्योंकि कई बार हम षूटिंग कर रहे होते थे अथवा किसी न किसी समारोह का हिस्सा बने हुए होते थे.लेकिन अब लगातार ‘महाभारत’ देख रही हूं.तो पुनः प्रसारण का मुझे यह फायदा मिला.अब मैं एक सामान्य दर्शक की तरह  महाभारत देख रही हूं.

इस वक्त की नई गतिविधियां क्या हैं?
-यह तो एक बहुत बड़ी लंबी कहानी है.मेरे पिता स्व. गोवर्धन इसरानी जी दस बारह वर्ष पहले पार्किंसन बीमारी का षिकार हो गए थे.फिर छह सात वर्ष पहले वह नागपुर में गिर गए थे. वहां 15 दिन अस्पताल में मैंने उनका इलाज करवाया.उसके बाद हवाई जहाज/प्लेन की ग्यारह सीटें बुक करके स्ट्रेचर पर अपने पापा को लेकर मुंबई आयी थी.मुंबई में हमने पूरे छह साल बेटी के नाते उनकी बहुत सेवा की.मैने अपने मां-बाप की हमेषा सेवा की.मैं अभी भी अपनी मम्मी के साथ ही रहती हूं.मेरे पिताजी का अभी 15 दिसंबर 2019 में निधन हो गया.अभी भी जब मैं ‘महाभारत’ देखती हूं,तो मुझे लगता है कि काष इस वक्त मैं अपने पापा के साथ ‘महाभारत’देख रही होती.मगर मेरे लिए दुःख की ही बात है कि आज मैं उनके बिना ‘महाभारत’ देख रही हूं.आजकल मैं अपने पापा के कमरे में, पापा की फोटो के साथ बैठ कर ही ‘महाभारत’देखती हूं.वह मेरे लिए बहुत बड़ी प्रेरणा थे.उन्होंने मुझे साथ दिया.उन्होंने हर कदम पर मेरी जिंदगी में अच्छी-अच्छी राय दी.उन्होंने मेरा निर्माण किया.मेरे पिता ही मेरे निर्माण कर्ता थे.उन्होंने मेरी जिंदगी का निर्माण किया.उन्होंने मेरे अंदर इतने जीवन मूल्य,प्रिंसिपल कूट-कूट कर भरे कि मैं हमेशा सही दिशा मे चलूं. वह हमेषा चाहते थे कि मैं हमेषा सही सोच और अपने प्रिंसिपल के हिसाब से चलूं.इसी के चलते आज मुझे उनकी कमी बहुत खलती है.
दिसंबर माह में मेेरे पिता का देहांत हुआ.इसके अलावा अभी हमने दूसरे घर में शिफ्ट किया है.तो सब कुछ सेटअप करने में समय निकल रहा है.लेकिन मेरा पिछला  सीरियल‘‘बड़े अच्छे लगते हैं’’था.उसके बाद कपिल शर्मा के शो में कुछ एपीसोड किए थे.अभी कोरोना के चलते ‘लाॅक डाउन’’चल रहा है.हालात सुधरने के बाद पुनः अभिनय करना षुरू करुॅंगी.अब मेरा ज्यादातर फोकष फिल्म और वेब सीरीज के अलावा विज्ञापन फिल्मों पर होगा, जिससे मैं अपनी मम्मी की भी देखभाल लगातार कर सकूं.काम भी कर सकूॅं.इसके अलावा मैं अधूरी पड़ी कविताओं और किताबों को भी पूरा करने की सोच रही हूं.बीच में मैंने एक किताब‘‘कर्मपथ’’की एडीटिंग भी की थी.

आपके पिताजी तो इंकम टैक्स विभाग में कार्यरत थे?
-जी हां! मेरे पिताजी श्री गोवर्धन इसरानी जी इंकम टैक्स विभाग में थे.उससे पहले वह दिल्ली में ‘मिनिस्ट्री आफ लाॅ’’में एडीशनल सेक्रेटरी थे.  रिटायर होने के तीन चार साल बाद ही उन्हे पार्किसंस की बीमारी हो गयी.पर वह ठीक से चल पा रहे थे.लेकिन जब वह नागपुर में गिरे,उसके बाद से धीरे-धीरे उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ती गई.फिर दूसरी बार  गिरे.उसके बाद तो बिस्तर पर ही आ गए.उनकी आवाज चली गई.उनका खाना मुश्किल हो गया.फिर उनको पैक ट्यूब लगाया.अंततः 15 दिसंबर को उनका निधन हो गया.14 दिसंबर से  तीन- चार दिन पहले का पैक ट्यूब  निकल आया, बेडसोर हो गया, इंफेक्शन हो गए.लेकिन मैंने सात वर्ष उनका बिस्तर पर पड़े रहना देखा है.मैने उनकी सेवा की.मगर मेरी आंखों के सामने हर पल वह रहते हैं.उनकी पीड़ा रहती है.मैंने  उनके लिए अपना कैरियर वगैरह कुछ नहीं देखा.उस वक्त मुझे सिर्फ यही लगा कि जिंदगी में मां-बाप तो आपको एक ही मिलेंगे और इनका ऋण मुझे चुकाना है.दूसरी चीजें तो मुझे फिर भी बाद में मिल जाएंगी और मुझे मिली भी हुई हैं.मैंने वह स्वाद चखा भी है.लेकिन मां-बाप का जो कर्ज मुझे चुकाना है,वह मैं कब चुकाऊंगी.यह बात सोच कर मैंने अपना पूरा समय उनके ऊपर ही दिया.मुझे काम अभी भी बहुत आते हैं.लेकिन मुझे आधे अधूरे मन से काम करना अच्छा नहीं लगता.इसका असर काम पर दिखता है.चेहरे पर नजर आता है.कैमरा पकड़ लेता है.इसलिए मैंने सोचा कि नहीं अभी मुझे सिर्फ यही करना है.

शान्तिस्वरुप त्रिपाठी


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