दिलीप कुमार को ‘बैराग’ का इंतजार

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मायापुरी अंक 54,1975
रेमनाल्ड लेबोट्री में ‘बैराग’ के संपादन के दौरान दिलीप कुमार से मुलाकात हो गई। मैंने पूछा, नई लहर की फिल्मों के साथ नए कलाकारों ने जो सैक्स अपनाया है उसके बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है? क्या यह सब कुछ इंडस्ट्री के पक्ष में हो रहा है?
दिलीप कुमार ने एक पल के लिए फिलॉसफरों की तरह सोच में डूब कर कहा, सैक्स और चुम्बन वगैरह की ह्मारी सभ्यता में गुंजाइश नही है। हमारे समाज का ढांचा कुछ ऐसा है बुरी बातों को पचा नही सकता और परवरिश जिस वातावरण में हुई है वह हमें उन समाजी सीमाओं को फ्लांगने की हिम्मत नही करता इसलिए हम अपने को समाज के रस्मों रिवाज का पाबंद पाते है लेकिन हम इस कदर तंग नजरों के भी कायल नही है। हमारे ख्याल से अगर सैक्स और नग्नता इत्यादि कहानी के लिए जरूरी है और उसके न दिखाने से कहानी आगे नही बढ़ती तो फिर तहजीब के दायरे में रहकर उसे दिखाया जा सकता है। दिलीप कुमार ने अपने को तंग नज़र और दक्यानूस लोगों से ऊंचा उठाते हुए कहा इसका मतलब यह हुआ कि आप चुम्बन और नग्नता के पक्ष में है। मैने पूछा।
इस हद तक कि फिल्म में आवश्यकतनुसार उनका इस्तेमाल हो और फिल्म बंदी के समय तहजीब का ध्यान न छोड़ा जाएगा। सस्ते और गंदे किस्म सैक्स जो सिर्फ पब्लिक की जेबें खाली करने के इरादे से ठूंसा जाता है। इससे भारतीय सभ्यता को नुकसान पहुंचता है।
दिलीप साहब, इंडस्ट्री के कुछ लोग इस किस्म का प्रचार करते है कि आपको लेकर फिल्म बनाना पहाड़ से दूध की नहर निकालना है। इल्जाम यह कि आप फिल्म की पूर्णता के दौरान हर मामले में दखल अंदाजी करते है। जिसकी वजह से फिल्म दुगने समय में पूर्ण होती है। बैराग’ के बारे में भी लोगों का यही ख्य़ाल है। मैंने उनसे पूछा।
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बात यह है कि मैं साल में एक दो फिल्मों में काम करता हूं इसलिए उस फिल्म की कामयाबी और नाकामी मेरे ही सिर मढ़ी जाती है। किसी भी फिल्म में काम करते समय मेरी यह इच्छा होती है कि फिल्म जल्द बन जाए और रिलीज़ होकर कामयाबी से चले ताकि निर्माता जिंदा रहे। इसलिए मुझे उसका पूरा-पूरा ख्याल रखना पड़ता है। वरना एक कलाकार को सिर दर्द मोल लेने की आवश्यकता क्या है? मैं चाहूं तो फिल्मों का ढेर लगा लूं 2 या 3 शिफ्टों में काम करूं लेकिन फिर कला कहां रह जाएगी। लोग मुझ पर हस्तक्षेप का इल्जाम लगायेंगे हालांकि मेरी ऐसी कोई धारणा नही होती। बल्कि मैं तो सलाह देता हूं। उसे कबूल करना न करना निर्देशक पर निर्भर होता है। परंतु ‘बैराग’ के बारे में मुख्य तौर पर लोग इस प्रकार का प्रचार अधिक कर रहे है। जिसकी वजह है कि फिल्म बहुत अच्छी बन गई है। 3 अक्टूबर को इसका परिणाम सामने आ जाएगा। यदपि यहां पर कुछ लोगों को दिलीप कुमार के विरूद् बोलने की आदत-सी पड़ गई है। दिलीप कुमार ने कहा।


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Mayapuri

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