एक भारतीय जो भारत व भारतवासियों की धड़कन को जानता है – अली पीटर जॉन

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वह कभी भी एक्टिंग स्कूल नहीं गये ना ही वह यह जानते थे कि फिल्में कैसे बनती हैं लेकिन उन्हें यह पता था कि अगर वह जीवन में कोई भी काम करेंगे तो वह फिल्मों में ही करेंगे। यह कैसे संभव होगा कि वह इस विषय को लेकर बिलकुल भी चिंतित नहीं होंगे। हां यह सच है उन्हें बिलकुल भी अपने करियर की चिंता नहीं थी। क्योंकि उनका मानना था कि अगर उनकी किस्मत में हिंदी फिल्मों का हिस्सा बनना लिखा है तो उन्हें कोई भी नहीं रोक सकता। हरि किशन गोस्वामी दिलीप कुमार की फिल्में देखा करते थे। वहीं से उन्हें एक्टिंग का ज्ञान हुआ। दिलीप कुमार के काम को देखकर उनके अंदर भी एक्टर बनने की महत्वाकांक्षा जागी। इसके बाद हरि किशन ने एक ट्रेन की टिकट कराई व अपने लक्ष्य की खोज में मुंबई पहुंच गये। उन्होंने अपनी जर्नी के दौरान एक बहुत ही रोमांचक व ज्ञानवर्धक अनुभव किया। इस दौरान हरि किशन ने अपने सपनों से मुलाकात की जिनके बारे में वह हमेशा ही सोचा करते थे और तो और उन्होंने भारतीय सिनेमा के महानतम दिग्गजों में से कुछ के साथ काम भी किया।

कुछ हफ्तों के बाद ही हरि किशन गोस्वामी ट्रेन से एयर कंडिशन्ड कम्पार्टमेंट में दिल्ली जा रहे थे (80 के दशक की बात है जब वह दिल्ली जाया करते थे तब हरि किशन फ्लाइट से नहीं जाते थे तब वह फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ बना रहे थे)

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इस समय वह साधारण हैंडसम हरि किशन गोस्वामी नहीं बल्कि अब वह पद्मभूषण डॉ मनोज कुमार हैं, जिन्हें भारतीय सिनेमा में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार का सम्मान मिला। उनकी जर्नी चक्र से घिरी हुई रही। लेकिन उनका दृढ़ संकल्प 78 साल में भी मजबूत है। जब उन्हें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से पुरस्कार प्राप्त हुआ तब वह व्हीलचेयर पर थे। यह अवसर खास था क्योंकि इस अवसर पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मनोज कुमार को साईं बाबा की क्रिस्टल मूर्ति व नारंगी वन्दना दी।

यह उनके जीवन व करियर का महान क्षण रहा। उनकी शुरूआती जर्नी के बारे में बात करूं तो हरि किशन को लगता था कि उनका नाम बहुत बड़ा है। उन्होंने अपना नाम हरि किशन से बदलकर मनोज कुमार रख लिया।

मनोज कुमार ने अपने करियर की शुरूआत छोटी फिल्मों से की जिन्होंने इतिहास रचा। मनोज कुमार ने ‘हरियाली और रास्ता’, ‘हिमालय की गोद में’, ‘वो कौन थी’, ‘गुमनाम’ जैसी अपनी फिल्में भी बनाई थी। फिल्म ‘आदमी’ में मुख्य किरदार में मनोज कुमार ने बेहतरीन अभिनय किया था व इस फिल्म में उनका किरदार काफी चुनौतीपूर्ण रहा।

मनोज कुमार रचनात्मक दिमाग व बेहतरीन लेखन के लिए जाने जाते थे। बॉलीवुड के बहुत से प्रसिद्ध फिल्ममेकर्स (एस.एस वासन, राज कपूर और राज खोसला) व लेखक उनसे दृश्य और संवाद के लिए सलाह लिया करते थे।

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साठ के दशक में शहीद भगत सिंह पर आधारित फिल्म ‘शहीद’ में मनोज कुमार ने लीडिंग मैन का किरदार निभाया था। ऐसे बहुत से फिल्म लेखक व निर्देशक रहे जो मनोज कुमार द्वारा फिल्म के निर्माण के गवाह थे। इस फिल्म से मनोज कुमार को अपनी फिल्म निर्देशित करने व लिखने की प्रेरणा मिली। फिल्म ‘शहीद’ की सफलता के जश्न का आयोजन हुआ। इस मौके पर स्वर्गीय प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री एक्टर मनोज कुमार से मिले व उन्होंने अपने नारे ‘जय जवान जय किसान’ पर आधारित फीचर फिल्म बनाने को कहा।
फिल्म ‘उपकार’ में मनोज ने वन-मैन बटालियन का किरदार निभाया था। इस फिल्म ने ना केवल भारत में बल्कि जिस भी देश में हिन्दी सिनेमा देखा जाता था उस देश में प्रसिद्धि प्राप्त की।

मनोज कुमार ने बहुत सी महान देशभक्तिपूर्ण फिल्में बनाई जिसमें- ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘क्रांति’, ‘शोर’, ‘क्लर्क’, ‘शिरडी साईं बाबा’, ‘जय हिंद द प्राइड’ बेहतरीन फिल्में रही।
मनोज कुमार की देशभक्ति वाली फिल्मों ने कई अन्य फिल्म निर्माताओं को प्रेरित किया। वह देशभक्ति फिल्मों के अग्रणी कहलाते थे। उनकी फिल्मों की तरह बहुत से फिल्म निर्माताओं ने देशभक्ति फिल्म बनाने की कोशिश की। लेकिन निर्माताओं की फिल्में किसी भी पीढ़ी व स्कूल में वह जागरूकता व देशभक्ति की भावना जागृत नहीं कर पाई जो मनोज कुमार की फिल्मों से जागरूक होती थी।
समाज और देश में सभी बुराइयों के खिलाफ लड़ने के लिए मनोज ने लीडिंग मैन का किरदार निभाया था। उनकी कुछ फिल्में ‘दस नम्बरी’, ‘सन्यासी’, ‘पहचान’ उनके इसी रूप को दर्शाती हैं।

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मुझे ऐसा लगता है कि फिल्म ‘शोर’ में उन्होंने ऑलराउंडर के रूप में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था। इस फिल्म में मनोज कुमार ने मूक और बधिर पुत्र (डेफ एंड डम्ब बेटे) के पिता की भूमिका निभायी थी। फिल्म में उन्होंने एक ऐसे पिता का किरदार निभाया जो अपने बेटे की आवाज को वापस लाने के लिए लड़ता व संघर्ष करता है। इस फिल्म का संगीत व नंदा, प्रेमनाथ, मास्टर सत्यजीत द्वारा किया गया प्रदर्शन सबसे बेहतरीन रहा।

मनोज पिछले कुछ सालों से भले ही सक्रिय ना रहे हों। लेकिन सिनेमा के लिए उनका जुनून अभी भी पहले की तरह ही मजबूत है, वह अब भी सिनेमा के संपर्क में है, मनोज कुमार का मानना है कि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रगति करना व सार्थक फिल्में बनाना ही काफी नहीं होता। अच्छी फिल्म के लिए अच्छी पटकथा का होना बहुत जरूरी है व सार्थक संवाद व मधुर संगीत फिल्म को बेहतरीन बनाने में मदद करते हैं।
भले ही मनोज कुमार शारीरिक रूप से सक्रिय न हो। लेकिन उनका दिमाग अब भी पूरे दिन काम करता है। उनकी आशावाद की भावना आज भी उनके अंदर जीवित है। देश के लोगों को आभारी होना चाहिए कि मनोज कुमार इस देश में पैदा हुए। मनोज कुमार को सही मायने में मिस्टर भारत कहा जाता है। जिस पर न केवल हर भारतीय को बल्कि भारत को भी खुद पर गर्व होना चाहिए।

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Mayapuri