INTERVIEW!! तीस रुपयों से लाखों रुपये पाने वाला सिपाही – संजीव कुमार

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मायापुरी अंक, 57, 1975

शीर्षक से चौंकिये नही यह एक हकीकत है कि ‘हम हिंदुस्तानी’ फिल्म में संजीव कुमार ने एक्स्ट्रा के रूप में एक मामूली सिपाही का मामूली-सा रोल किया था इस रोल में उन्होंने चंद डायलॉग बोले थे जिनके लिए उन्हें केवल तीस रूपये मिले थे और तीस रूपयों वाले यही एक्स्ट्रा संजीव कुमार लाखों रूपये के हीरो बने।

तीस रूपयों वाले एक्स्ट्रा से हीरो बनना कोई साधारण बात नही है। एक सपना-सा लगता है।

आपका यह सपना कैसे साकार हुआ ?  इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने हल्का सा मुस्कुरा कर एक शेर सुना दिया मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मर्तबा चाहे कि दाना खाक में मिलकर गुलो-गुलज़ार होता है…

वैसे भी संजीव कुमार को शेरो शायरी का बड़ा शौक है पर लगता है उपरोक्त शेर उनकी जिंदगी में इतना घुल मिल गया है कि जब भी वो अपने बीते दिनों की याद करते हैं। वह उनके होठों पर मचल उठता है।

स्कूल जाने के बहाने किसी फिल्म स्टूडियो के गेट पर खड़े खड़े आती जाती कारों में बैठे हीरो हीरोइनों को हसरत भऱी नजरों से देखने वाले संजीव कुमार में यदि कुशल अभिनेता बनने का गहरा आत्म-विश्वास न होता तो वे अब तक एक्स्ट्राओं की भीड़ में ही खोये रहते पर उनमें आर्टिस्ट बनने की बड़ी लालसा थी, बड़ी तड़प थी, इसलिए वे स्टूडियो का चक्कर काटते-काटते अपने जमाने की सबसे बड़ी नाट्य संस्था इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन का भी चक्कर काटने लगे। मैंने पूछा तो क्या आप रंगमंच से फिल्मों में आना चाहते थे?

संजीव कुमार ने सिगरेट का लंबा कश खींच कर कहा फिल्मों में आने के लिए मैं तमाम रास्तों की खाक छान लेना चाहता था। फिल्मों के लिये बड़ी तमन्ना थी, बड़ी हसरत थी। मैं सोचने लगा जब इप्टा (इंडियन पीपल्स थियेटर) से देव आनंद और बलराज साहनी जैसे कलाकार फिल्मों में आ सकते हैं तो क्या ऐसा ही चांस मुझे नही मिल सकता। तो चांस मिला?

हां पर विचित्र संयोग से एक दिन ड्रामा में पार्ट लेने वाला एक आर्टिस्ट नहीं आया तो किसी ने मेरा इम्तिहान लेने की नीयत से कहा यार ले लो न इसे कब का चक्कर काट रहा है हालांकि उसके कहने के ढंग से मैं तिलमिला उठा था पर रिहर्सल का मौका न छोड़ देने के लिए मैं खामोश रहा। मैंने तब उस ड्रामे की रिहर्सल में ऐसा कुछ कर दिखाया कि इप्टा का मुझे परमानेंट आर्टिस्ट बना दिया गया। आज भी मैं अपने को इप्टा का आर्टिस्ट मानता हूं। इतना ही नही, कभी-कभी जी चाहता है कि नाटकों में भी भाग लूं नाटकों में पार्ट करने पर मन को जितनी संतुष्टि होती है उतनी फिल्मों में काम करने से नही..

नाटकों से फिल्मों में आने तक और फिल्मों में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने तक संजीव कुमार को न जाने कितने उतार चढ़ाव देखने पड़े न जाने कितनी बार निराशा ने उनके लिए खुलने वाली खिड़कियों को बंद कर दिया। फिल्मालय स्कूल ऑफ एक्टिंग में भर्ती होने के बाद ताराचंद बड़जात्या जैसे निर्माता उन्हें अपनी फिल्म ‘आरती’ में हीरो बनाना चाहते थे पर उस फिल्म के निर्देशक फणि मजूमदार ने उऩका स्क्रीन टेस्ट लेकर उन्हें रद्द कर दिया। इस दुर्घटना ने उनको इतना झकझोरा कि वे कई दिनों तक चैन से सो नही सके। उनके भीतर का कलाकार चीत्कार उठा पर उसकी चीखें फिल्मी दुनिया की हलचलों में खो गयी वे कई दिनों तक उदास मन खोये-खोये यहां से वहां घूमते रहे।

उसके बाद?

संजीव कुमार ने आंखे बंद कर उन दिनों की याद करते हुए कहा यदि आरती का हीरो चुन लिया जाता तो क्या बन जाता, मैं नहीं जानता पर उसका हीरो न चुने जाने पर मैंने भविष्य की चिंता किये बिना हाथ तलवार लेकर, मारधाड़ के लिए बांहो में जोश-खरोश भर कर मुक्केबाजी के लिए मुट्ठियां भींच कर और दांत-पीसते हुए स्टंट फिल्मों में काम करने लगा ढिशुम-ढिशुम में बड़ा मज़ा आया कुछ प्यास तो बुझी पता नही गुंडेबाजी और दादागिरी के इस आर्ट मैं मैंने क्या कमाल दिखाया कि स्टंट फिल्म ‘निशान’ का हीरो बना दिया गया मैंने हंस कर कहा आखिर हीरो तो बन ही गये न और तजुर्बे के लिए रास्ता भी खुल गया। नाटकों से अनुभव लिया और स्टंट फिल्मों से सबक सीखा। यह सबक बड़ा काम का रहा क्योंकि उसी के आधार पर सामाजिक फिल्मों में काम करने का अवसर मिला।

यह संजीव कुमार का साहस और धैर्य था कि उन्होंने सामाजिक फिल्मों का हीरो बनने के लिए लौहे के चने चबा कर दुर्गम से दुर्गम घाटियां पार कर ली। वे कभी दादा बने, कभी लफंगे कभी अलीबाबा तो कभी बागी राजकुमार, कभी सिपाही तो कभी चोर। कभी उन्होंने तलवारबाज़ी का करिश्मा दिखाया तो कभी मुक्केबाजी का करतब दिखा कर सीटियां बजाने वाले दर्शकों के दिलदार बन गये।

मैंने पूछा आम दर्शकों से आप जागरूक दर्शकों के बीच कैसे आये?

संजीव कुमार ने हंसी का हल्का-सा ठहाका लगा कर कहा उसके लिए भी मुझे दुर्गम पहाड़ों और अंधेरी गलियों को पार करना पड़ा स्टंट फिल्मों में काम करते-करते मैं सामाजिक फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाएं करने लगा और उन छोटी-मोटी भूमिकाओँ को करते-करते मैं सहायक हीरो को मंजिल तक पहुंचा और उसी सीढ़ी से फिर हीरो बना।

यदि आप हमेशा के लिए साइड हीरो बन जाते तो?

दोस्त ने उस खतरे का अहसास जरूर दिलाया और कुछ ने कहा भी नंगे तारों को छूने की कोशिश न करो। पर न जाने मुझमें कैसी बिजली थी कि मैंने इन नंगे तारों की कोई परवाह नही की।

और फिर भाग्य ने भी इस वीर पुरूष की बलाइयां ली, और उन्हें चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं करने का अवसर दिया। उन्हें तो उपयुक्त अवसर की तलाश ही थी फिर क्या था, ‘संघर्ष’ ‘शिकार’ ‘आशीर्वाद’ ‘सत्यकाम’ ‘साथी’ ‘जीने की राह’ ‘धरती कहे पुकार के’ ‘सच्चाई’ में सहायक हीरो की भूमिकाओं को साकार करते-करते उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे हर तरह की भूमिकाओं के लिए उपयुक्त है, इतना ही नही, उनकी सशक्त भूमिकाओं के सामने बड़े-बड़े हीरो भी फीके पड़ने लगे, शिकार फिल्म में सहनायक की श्रेष्ठ भूमिका के लिए जब उन्हें फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला तो चारों ओर उनके अभिनय की महक फैल उठी और वे इसी महक के साथ ऊपर उठते हुए ‘खिलौना’ के हीरो बने।

इसके आगे की राहों का जिक्र करते हुए संजीव कुमार ने कहा खिलौना की भूमिका मेरे लिए एक चुनौती थी मैं जो कुछ कर दिखाना चाहता था उसके लिए मुझे उस भूमिका से उपयुक्त अवसर मिल गया। पर आपके अस्तित्व का एहसास तो ‘संघर्ष’ में दिलीप कुमार के साथ कार्य करने के बाद ही हो गया था। हां – कुछ-कुछ फिर भी था तो साइड हीरो हा यहां हीरो बनने के लिए हीरो बनना ही पड़ता है।

उसके बाद तो संजीव कुमार हीरो ही नही, सम्राट बन गये। उनकी एक-एक फिल्म उनके अभिनय की माइल स्टोन बनती चली गयी और लोग कहने लगे कि आखिर इस अभिनेता में अभिनय-क्षमता की कितनी परते है कि हर नयी फिल्म के साथ नये रूप रंग के साथ वे खिलते ही जाते हैं और अब उन्होंने नया दिन नयी रात में नौ रंगो की प्रतिबिंधित करने वाली नौ विभिन्न प्रकार की भूमिकाएं की तो दर्शक और समीक्षक दांतो तले उंगली दबा कर कहने लगे यह संजीव कुमार है या अभिनय की बला…

निश्चित ही संजीव कुमार ने  ‘दस्तक’ ‘कोशिश’ ‘अनुभव’ ‘रेखा’ ‘अऩोखी रात’ ‘मनोरंजन’ ‘मनचली’ ‘अनहोनी’ ‘आंधी’ में अभिनय के जो विभिन्न ग्राफ अंकित किये है, वे इस बात के घोतक है कि हर पात्र में संजीव कुमार ने एक नये संजीव कुमार को पैदा किया है। अभिनय से जिंदगी के मर्म को स्पर्श करने वाले संजीव कुमार की अंतिम मंजिल क्या होगी हम नही जानते पर हां-हमें इस बात का आश्चर्य अवश्य है कि इतने कुशल और मंझे हुए कलाकार होने पर भी, क्लासिक आर्टिस्ट होते हुए भी आप दर्शकों के बीच वे अब तक धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की तरह सुपरस्टार नही बन सके। वे बॉक्स ऑफिस खिड़की के भाग्य विधाता नही बन सके। कहीं इसका कारण यह तो नही है कि वे केवल कलात्मक अभिव्यक्ति की प्यास बुझाते रहे और उन्होंने हीरो के रूप में अपनी व्यावसायिक सफलताओं की ओर कतई ध्यान नही दिया। हो सकता है उनकी इस विडम्बना के और भी अनेक कारण हो। अब हम जब कभी अगली बार उनसे मिलेंगे तो सबसे पहले इसी विषय पर बातचीत करेंगे और फिर चर्चा करेंगे हीरो संजीव कुमार की।

फिलहाल तो इतना ही कहा तीस रूपयों वाला सिपाही संजीव कुमार तो संजीव कुमार लाखों रूपयों वाला सिपाही कितना चमत्कार


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Mayapuri

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