INTERVIEW: शरीर मखमली और कपड़े खुरदरे… ना बाबा ना.. ? शबाना आज़मी

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मायापुरी अंक, 58, 1975

यदि कोई हीरोइन किसी फिल्म में मैले कुचैले, फटे पुराने कपड़े पहनने से इंकार कर दे तो हमें आश्चर्य नही होना चाहिए!  ग्लैमर आखिर ग्लैमर है! हीरोइन आखिर हीरोइन है!

आप पूछ सकते हैं तो फिर जया ने फिल्म दूसरी सीता में काली कलूटी बनना कैसे स्वीकार कर लिया ? उसने खुरदरे कपड़े पहनने से आनाकानी क्यों नही की ? जया, जया है वह अपवाद है। उन जैसी अभिनेत्रियां हैं ही कितनी ? केवल उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं। केवल तीन या चार बस हालांकि जया को भी उसके तथाकथित हितैषियों ने बड़ा समझाया था कि वे काली कलूटी न बनें। पर जया ने किसी बात की परवाह नहीं की। वह हमेशा यही कहती रही कि अभिनेत्री का सबसे बड़ा ग्लैमर उसका रूप सौन्दर्य नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा है।

जया को छोड़ो शबाना आज़मी के बारे में आपका क्या विचार है ? अरे उनके बारे में क्या पूछना उन्ही ने तो ‘अंकुर’ जैसी संवेदनशील और कलात्मक फिल्म में भावनात्मक रोल करके नयी आशा जगायी थी। फासला के निर्माता-निर्देशक के ए.अब्बास ने अपनी फिल्म की इस नयी हीरोइन के बारे में बड़े विश्वास के साथ कहा था कि यह दूसरी मीना कुमारी बनने वाली है। ‘अंकुर’ को देखकर कुछ समीक्षकों ने लिखा कि वह शीघ्र ही दूसरी मीना कुमारी बन जायेंगी।

पर जनाब हवा ही बदल गई। कुछ का कुछ हो गया। ‘अंकुर’ की सफलता की चकाचौंध में शबाना आज़मी जैसी समझदार हीरोइन ग्लैमर फिल्मों की ग्लैमर हीरोइन बनकर अपनी भूमिका से ज्यादा अपने रूप लावण्य और वेशभूषा की चिंता करेगी यह किसने सोचा था। शायद उसका आईना भी उसकी सफलता पर इठलाने लगा है।

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पिछले दिनों की बात है। शबाना आज़मी ‘अंकुर’ के ही निर्देशक श्याम बेनेगल की दूसरी फिल्म ‘निशांत’ के एक दृश्य में भाग ले रही थी। यह फिल्म समय, देश भक्त, जीवन एवं चारित्रिक अभिव्यक्ति की दृष्टि से ‘अंकुर’ से भी अधिक मार्मिक एवं ह्रदयस्पर्शी है। पर न जाने कैसे ग्लैमर की चमक-दमक की लहर ने शबाना को छू दिया कि वह फिल्म के एक दृश्य में सादी साड़ी की जगह रंग बिरंगी साड़ी सुपर फाईन साड़ी की मांग कर बैठी। शबाना ने अपनी भूमिका के बारे में कुछ भी नही सोचा। इस फिल्म की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि गांव की पृष्ठभूमि है और उस पृष्ठभूमि में उसका रोल एकदम सादा त्रासदीपूर्ण और नॉनग्लैमरस है। इस फिल्म में यह गांव के एक साधारण अध्यापक की साधारण पत्नी है। गांव के जागीरदार का बेटा उसका अपहरण और बलात्कार कर उसे रखेल बना लेता है। वह जागीरदार की हवेली में रखेल की दर्द भरी विवशताओं की घुटनभरी जिंदगी जीती है। उसे अपने पति और बेटे की याद सताती है और त्रासदी के ऐसे क्षण काटती है कि दर्शकों की छाती भी फटने सी लगती है। क्या ऐसी दारूण स्थिति का शिकार निसहाय कभी रंग बिरंगी सुपर फाईन साड़ी पहनने की इच्छा कर सकती है ? वह भले ही न करे पर शबाना आजमी कर सकती हैं क्योंकि ‘अंकुर’ के बाद वह हिंदी की कमर्शियल फिल्मों की कमर्शियल और ग्लैमरस हीरोइन बन गयी हैं। यदि वह साधारण साड़ी पहनेगी तो फिर उनकी कीमत का क्या होगा ? पर हां, श्याम बेनेगल जिन्होंने अपने ही हाथों शबाना को ‘अंकुर’ की चुनौतीपूर्ण भूमिका देकर सफलता की माला पहनायी थी, यह सुनकर सकते में जरूर आ गये। वो शबाना आज़मी के ग्लैमर के वास्ते अपनी फिल्म से समझौता नहीं कर सके। इसलिए वे भी सत्याग्रह पर बैठे सुनते हैं उस दिन शूटिंग स्थगित हो गयी। आखिर शबाना को झुकना पड़ा। वह झुक तो गईं पर ‘अंकुर’ से उनकी जो इमेज बनी थी, वह इस खबर से टूट गयी।

ठीक है, किंतु अकेली शबाना को ही दोष क्यों दिया जाये ? इस फिल्म के बनने के बहुत अर्से पहले ही ‘बरखा बहार’ की नायिका रेखा ने भी जेल के दृश्यों में हिस्सा लेते हुए जेल की खुरदरी ड्रेस पहनने से इंकार कर दिया था। उनके इस नखरे के कारण कई दिनों तक शूटिंग स्थगित रही। रेखा ने तो साफतौर पर कह दिया था कि उस खुरदरी ड्रेस से उनकी मखमली देह छिल गई तो कौन जिम्मेदार होगा ? वस्तुत: आजकल की हीरोइनों में अभिनय के प्रति ग्लैमर का अधिक मोह है वे नॉन ग्लैमर्स ड्रेस पहनने से झिझकती हैं कहीं उनकी सादगी से आम दर्शकों में उनका आकर्षण कम न हो जाये ? शायद यही कारण है कि इसी मोह के आवरण में अंग-प्रदर्शन भी अधिक होने लगा है।

शरीर मखमली और कपड़े खुरदरे.. ना..बाबा..ना.. ग्लैमर तो ग्लैमर ही है। फिल्म के पर्दे पर ग्लैमर की चमक दमक नही तो फिर कुछ भी नही।

पर पर्दे की बात पर्दे तक ही रहे तो अच्छा है। कभी-कभी तो वास्तविक जीवन में इस ग्लैमर के कारण कुछ इस तरह की परेशानी भी हो जाती है कि ग्लैमर की चकाचौंध खटकने लगती है। इस बात की गहराई किरण कुमार और रेखा ही बता सकते हैं जो कहीं भी अपने को छुपाकर सुख चैन से कुछ क्षण भी नही काट सकते। होटल जाते हैं तो लोग पहचान लेते हैं, समुद्र किनारे टहलते हैं तो भीड़ आकर घेर लेती है और किसी दोस्त के फ्लैट पर जाकर चंद क्षणों के लिए मीठी-मीठी बातें करना चाहते हैं तो आसपास के लोग तरह तरह की अफवाहें उड़ा देते हैं। तो अब जायें तो जायें कहा। ग्लैमर को छुपायें तो कहां छुपायें पर कभी-कभी कोई नया रास्ता निकल आता है।

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शायद उन्हें भी नयी रोशनी मिल गयी। किरण कुमार ने एकदम सादी पैंट और शर्ट पहन ली और आंखो पर लगा लिया चौड़ा काला चश्मा बाल भी इस तरह बिखरा दिये कि लोग पहचान न सकें और रेखा ने तो कमाल कर दिया। एकदम सफेद सादी साड़ी, मामूली-सा ब्लाउज़ आंखो पर धूप का काला चश्मा और मामूली से सैंडिल, हाथों में दो चार कोर्स की किताबें जैसे कॉलेज की स्टूडेंट हो। किसी तरह का मेकअप भी नही दोनों कॉलेज के स्टूडेंट बनकर बाहर निकले। जगह भी उन्होंने क्या ढूंढी एरोड्राम एरोड्राम भीड़-भाड़ से दूर वाकई एक ऐसी जगह है जहां सब लोग हड़बड़ी में रहते है। किसी को क्या मतलब कौन आया, कौन गया? उन दिनों ग्लैमर को छुपाकर ग्लैमर की दुनिया से भागने की वह योजना काबिले तारीफ थी। अचानक उन दोनों पर मेरी नज़र पड़ गयी। मैं उस दिन मायापुरी का डिस्पैच करने एरोड्राम पर गया था मैं बाहर निकल ही रहा था कि अचानक मेरी नजर किरण कुमार पर पड़ी। पहले तो मुझे भ्रम हुआ जैसे दोनों कॉलेज स्टूडेंट ही हैं पर किरण कुमार की कुछ हरकतें मुझसे छुपी न रह सकी। शायद किरण कुमार को भी मेरी उपस्थिति का आभास हो गया।

उन्होंने रेखा को कुछ इशारा किया और झुक कर उनके कान में कुछ कहा। रेखा को कुछ झुंझलाहट सी हुई और पैर पटकती हुई दूर निकल गयी पीछे-पीछे किरण कुमार भी। मैं भी पीछे-पीछे हो लिया मेरे कानों में भनक पड़ी, किरण कुमार कह रहा था यहां भी कुछ लोग पहचान रहे है। चलो ऊपर कहीं चलते है।

इसी बीच कुछ और लोगों ने भी उन दोनों को पहचान लिया। बस फिर क्या था, कुछ लोगों ने उनको घेर लिया।

दोनों को परेशानी हुई। रेखा तो एक दम भन्ना गयी। वह किरण कुमार को वही लोगों के घेरे में छोड़ कर भाग गयी। संभवत: वह ऊपर नये बने रेस्ट्रा में चली गयी। हाल ही में वहां फर्स्टक्लास श्रेणी का रेस्ट्रा बना है जहां कुछ ऐसे ही लोग आते जो दुनिया से बेखबर रहना चाहते है।

मैं उन दोनों की स्थिति पर पिघल पड़ा मुझे उनके प्रति सहानुभूति भी हुई। फिल्म वालों को हम न जाने कितना कोसते हैं। न जाने हम उन पर कैसी कैसी छींटाकसी करते हैं। आज मुझे कुछ मसाला मिल गया था। पर क्या कहूं आखिर इनके भी तो कुछ जज़्बात हैं। कभी – कभी ये लोग भी अपने ग्लैमर के कारण ही इतने विवश हो जाते हैं कि कहीं अंधेरे में भी मुंह नही छुपा सकते। इसे कहते है ग्लैमर का अभिशाप ग्लैमर को छुपायें तो छुपायें कहां। अपने को छुपायें तो छुपायें कहा ?


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Mayapuri

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