“मुझे एक लड़की से प्यार है लेकिन अभी नाम नही बताऊंगा” – विक्रम

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053-18 vikram

 

मायापुरी अंक 53,1975

मोहन स्टूडियो में राजश्री पिक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड की नयी फिल्म ‘तूफान’ की शूटिंग चल रही थी, सेट पर विक्रम प्रियदर्शिनी और रूपेश कुमार मौजूद थे।

विक्रम से बहुत पुरानी पहचान है, उन दिनों वह पूना इंस्टीट्यूट से अपनी पढ़ाई समाप्त कर डिप्लोमा लेकर मुंबई आये थे, तब राजामुराद ने उनसे मेरा परिचय करवाया था।

‘तूफान’ के सेट पर मैंने उसका इंटरव्यू करना चाहा तो कहने लगे।

यार ‘जूली’ रिलीज होने दो, उसके बाद घर आना बैठ कर बातें करेंगे।

मैंने कहा, ठीक है।

और वायदे के मुताबिक संडे को मैं उनके फ्लैट ‘आशुतोष’ पर पहुंच गया। सौभाग्य से वह घर पर ही मिल गये वह कुछ परेशान लग रहे थे। अत: मैंने इंटरव्यू की शुरूआत इसी बात से कर मैंने पूछा,

यार, कुछ परेशान से लग रहे हो, क्या बात है? कहीं ‘जूली’ की असफलता ने आपको हतोत्साहित तो नहीं कर दिया?

नहीं यार, ऐसी बात नहीं, विक्रम ने धीमें स्वर में उत्तर दिया, फिर भी अगर फिल्म हिट हो जाती, तो अच्चा रहता।

मैंने पूछा,

फिल्म की असफलता से आप पर कोई खास प्रभाव तो नहीं पड़ा?

उन्होंने चौंकते हुए पूछा,

क्या मतलब?

मैंने सवाल स्पष्ट किया,

दरअसल बात यह है कि हमारे फिल्मोद्योग में जब किसी हीरो की एकाद फिल्म फ्लॉप हो जाती हैं तो उसे दूसरे निर्माता लेने से हिचकिचाने लगते हैं, ऐसा भी होता है कि जिन निर्माताओं ने उसे साइन कर रखा है वे लोग उस फिल्म का निर्माण बंद कर देते हैं या हीरो को ही बदल देते हैं। आपको मालूम है अमिताभ बच्चन के साथ भी यही हुआ था?

विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा,

God Thanks, मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, मेरे पास उतनी ही फिल्में हैं, जितनी कि पहले थी। ‘जूली’ के बाद भी मैंने दो फिल्में साइन की हैं। पिछले दिनों हेमा की मां ने भी अपनी फिल्म के लिये मुझे साइन किया है, सचमुच मैं बहुत लकी हूं।

मैं सबसे पहले विक्रम की पहली फिल्म ‘प्यासी नदी’ देखी थी, तब मुझे लगा था कि अब आवश्यकता है विक्रम जैसे कलाकारों की। धूम धड़ाकेदार प्रवेश, फिल्म ‘प्यासी नदी’ में यह प्रवेश इतना जबरदस्त था कि दर्शकों को एकाएक महसूस ही नहीं हुआ कि यह हीरो नया है। गुंडो के बीच से हीरोइन के बाप को बचाना, हालांकि यह सीन बहुत पुराना है, लेकिन विक्रम का यह सीन दर्शकों को बहुत भाया, और इसके बाद पूरी फिल्म में विक्रम दर्शकों पर छाये रहे।

यह विक्रम की पहली फिल्म थी इसके बाद विक्रम की फिल्में गायब। हां, ‘विक्रम’ नाम दर्शकों को याद रहा और तभी कुछ दिनों बाद विक्रम की फिल्म ‘दो चट्टानें’ आयी, सौभाग्य से यह फिल्म हिट हो गई और विक्रम का नाम दर्शकों के मन पर अपना नाम छोड़ गया और फिर आई ‘कॉल गर्ल’ और ‘जब अंधेरा होता है’ लेकिन ये दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं। फिर भी बिक्रम ने ढेर सारी फिल्में साइन कर ली। आज के इंटरव्यू के दौरान मैंने अगला सवाल इसी निमित पूछा,

समझ में नहीं आता कि आपने इतनी सारी फिल्में क्यों साइन कर ली?

विक्रम ने जवाब दिया, क्या करूं यार मुझसे किसी को ना कहते नहीं बनता, और फिर अगर किसी को मुझसे लाभ हो सकता है या मैं किसी को सुख पहुंचाने की स्थिति में हूं तो मैं ऐसा क्यों न करूं? यार यह तो सेवा है।

यह सुनकर मैंने तुरंत कहा,

इसका मतलब यह तो नहीं कि आप अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ले?

हंसते हुए विक्रम ने कहा,

नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगा, मेरे पास ऐसी कोई फिल्म ही हैं। जो दर्शक को अच्छी नहीं लगे। मुझे तो सबका ख्याल है, विशेष कर अपने दर्शकों का, मैं यह भी नहीं भूलूंगा कि दर्शक मुझे प्यार करते हैं।

मैंने प्रश्न का विषय बदला और पूछा,

आप फिल्म हीरो कैसे बन गये?

शुरू से बताइये, और कुछ अपना परिचय भी।

विक्रम ने बताया,

मेरा जन्म मैसूर राज्य के हुबली शहर में 31 मई 1948 में हुआ। माता पिता मुझे बहुत प्यार करते हैं। मैंने अपनी स्कूल की पढ़ाई वहीं हुबली के ‘सेंट मेरी हाई स्कूल’ और कॉलेज में की पढ़ाई P.C Jabin, Science College में की उसके बाद मैं बिजनेस मैनेजमैंट का डिप्लोमा लेने के लिए बैंगलोर पहुंचा। जहां पढ़ाई कंपलीट करके मैंने बिजनैस मैनेजमैंट का डिप्लोमा प्राप्त किया। बचपन से ही मुझे एक्टिंग का शौक रहा है। मैंने स्कूल और कॉलेज के दिनों में स्टेज पर कई बार नाटकों में काम किया है, तब मैंने सोचा, क्यों न फिल्म एक्टर बना जाए, यही सोच कर मैंने 1970 में पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में एंप्लॉय किया, इंटरव्यू के बाद मुझे पूना से जून 1970 के पहले सप्ताह में एक तार मिला कि आप ज्वाइन कीजिये, तार पाकर मुझे विश्वास नहीं हुआ कि मैं चुन लिया गया हूं। मैंने पूना इंस्टीट्यूट ज्वाइन कर लिया और मैं डिप्लोमा लेकर मई 1972 को मुंबई पहुंचा। मुझे डर था कि कहीं मैं भी अन्य डिप्लोमा होल्डर्स की तरह स्ट्रगल के चक्कर में न फंस जाऊं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ बाई चांस, एक दिन मैं मुंबई के Bombelli’s रेस्टोरेंट में चाय पी रहा था कि मुझे निर्देशक विजय कुमार नज़र आ गये, इनसे मेरी मुलाकात पूना इंस्टीट्यूट में हो चुकी थी। मुझे देखते ही वह खुश हो गये और उन्होंने मुझे अपनी फिल्म ‘कॉलगर्ल’ के लिए साइन कर लिया, यह अक्टूबर 1972 की बात है। ‘कॉलगर्ल’ साइन करने के दो दिन बाद ही, एक और फिल्म मिली ‘प्यासी नदी’ जो 1973 में रिलीज़ हुई। इस फिल्म में मेरा काम देखने के बाद जोगेन्द्र ने मुझे ‘दो चट्टानें’ के लिए अनुबंधित कर लिया। By Luck यह फिल्म हिट हो गई तो जोगेन्द्र ने मुझे ‘रंगा खुश’ और ‘फौजी’ के लिए भी अनुबंधित कर लिया और अब तो ‘रंगा खुश’ कर लिया और अब तो ‘रंगा खुश’ भी हिट हो गई है। और इस तरह से मैं फिल्मी हीरो बन गया।

इतना लम्बा उत्तर सुन कर, मैंने एक छोटा-सा सवाल पूछा,

आपको कलाकार बनाने में किसका हाथ है, मेरा मतलब है आप किसका अहसान मानते हैं?

विक्रम बोला,

अपनी मां, का मेरी मां ने मेरे पिता से सिफारिश की थी कि विक्रम को खुद ही अपना करियर चुनने दो और मेरी मां ही मुझे हर महीनें नियमित रूप से ‘चैक्स’ भिजवाया करती थी और आज जब मैं फिल्म आर्टिस्ट बन चुका हूं तो मेरी मां मेरे ही साथ है, मैं उसे बहुत प्यार करता हूं और वह भी मुझे बहुत प्यार करती हैं।

मैंने रहस्यमयी नजरों से विक्रम की ओर देखते हुए पूछा,

आपने किसी लड़की से प्यार किया है?

विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा,

जब तक मैं 22 वर्ष का था, तब तक मैंने, आप विश्वास नहीं करेंगे किसी लड़की से बात तक नहीं की हां, जब मैं बिजनेस मैंनेजमैंट की पढ़ाई के लिये गया था, तब मुझे एक लड़की से प्यार हो गया था, उस लड़की से शादी भी करना चाहता था, लेकिन उस लड़की के पिता इस बात के लिए राजी नहीं हुए।

विक्रम चुप हुए तो मैंने तुरंत पूछा,

मैं इन दिनों की बात कर रहा हूं आजकल आप किस से प्यार करते हैं?

विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा,

एक लड़की से मुझे बहुत प्यार है, लेकिन मैं अभी उसका नाम नहीं बताऊंगा जब वक्त आयेगा, तब आपको मालूम हो जायेगा। और यार, छोड़ो ये प्यार-व्यार की बातें, कोई दूसरी बात करो।

ठीक है, कह कर मैंने पूछा, आप टैलेंट को मानते हैं या ‘लक’ को?

मैं टेलैंट की बनिस्पद ‘लक’ को मानता हूं क्योंकि यहां फिल्मों में टेलैंट नहीं ‘लक’ काम करता है और मैं अपने आपको बहुत ‘लकी’ मानता हूं और शायद इसीलिये मेरे पास काफी फिल्में हैं।

मैंने कहा,

एक बात बताइये जब आप इतनी फिल्मों में अलग-अलग रोल कर रहे हैं, तो आप हर रोल के साथ कैसे न्याय कर पायेंगे?

विक्रम ने उत्तर दिया.

मेरे पास एक डायरी है। उस डायरी में मैंने तमाम फिल्मों के कैरेक्टर्स को विस्तार से नोट कर रखा है और जिस रोज मुझे जिस फिल्म के कैरेक्टर को पेश करना होता है, उसके बारे में घर से ही डिटेल में सोच कर स्टूडियो जाता हूं

मैंने अगला सवाल पूछा,

आप अपनी हॉबीज के बारे में बतायेंगे। आपके क्या क्या शौक है?

विक्रम बोला,

मुझे तैरने का बहुत शौक है और मुंबई में इसकी बहुत सुविधायें हैं। यहां पर बड़े आराम से मेरा यह शौक पूरा हो जाता है। स्वीमिंग के अलावा मुझे रिडिंग का बहुत शौक है, फोटोग्राफी से भी थोड़ा बहुत लगाव है और कुछ-कुछ डायरेक्श का भी चस्का लग गया है

आपके मनपसंद हीरो?

विक्रम ने बताया,

दिलीप कुमार Peter otoole and omar sharief

और मनपसंद हीरोइनें?

सिर्फ मीना कुमारी ! अरे हां, मैं यह बताना तो भूल गया कि मुझे क्रिकेट का बहुत शौक है। मैं अपनी स्कूल टीम का कैप्टन था।

विक्रम Exercises विश्वास नहीं रखता। वह कहता है कि मुझे दारा सिंह जैसे muscles नहीं चाहिये। स्वीमिंग से ही सब कुछ ठीक हो जाता है।

विक्रम का असली नाम मोइनउद्दीन है। विक्रमादित्य के नाम से प्रभावित होकर ही उसने अपना नाम ‘विक्रम’ रखा है।

जब मैंने उससे पूछा,

आपको अपना असली नाम बदलने की क्या जरूरत थी मोहनउद्दीन भी ठीक ही है। इन नाम में खराबी क्या है?

तो मुस्कुराते हुए विक्रम बोला,

यार मोइनउद्दीन के नाम से लड़कियां दूर भागती हैं। इसीलिए मैंने नाम बदल कर विक्रम रख लिया।

विक्रम की आनेवाली फिल्मों में ‘तूफान’ (जब तक आप यह इंटरव्यू को मढ़ेंगे फिल्म रिलीज हो चुकी होगी) ‘बेनकाब’ ’पायल’ और शहनाई’ गोयल की ’आदमी सड़क का’ ’रईस जादा’ एस. एच बिहारी की अगली फिल्म ‘दरवाजा’ मेरे हमराज (इसी माह रिलीज हो रही है) ’फौजी’ ’आज रात को’ ’स्वामी’ (निर्माता हेमा मालिनी की मां जया चक्रवर्ती) ’मेरे कितने रूप’ ’सोने का पिंजरा’ आदि प्रमुख हैं। इनमें से फौजी और मेरे हमराज़ तैयार हो चुकी है।

विक्रम से आज की मुलाकात काफी दिलचस्प रही, लौटते वक्त मैंने उससे वादा ले लिया कि अगर हमारे पाठक उन्हें पत्र लिखेंगे तो वह अवश्य सबको पत्रोत्तर देंगे।


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Mayapuri

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