रिव्यु – फिल्म ‘ विट्टी बांबू’ (गिल्ली डंडा) मराठी

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प्रभाशाली ढंग से अपनी बात कहती फिल्म

इसमें कोई शक नहीं कि आज मराठी फिल्मों का अच्छा दौर चल रहा है। इन दिनों मराठी फिल्मों में अच्छी कहानियां और बढि़या अभिनय प्रमुखता से लिया जाता है । गशेष कदम द्धारा निर्देशित मराठी फिल्म ‘ विट्टी बांबू’ स्वतंत्रता से पहले के विशय पर बनी ऐसी फिल्म हैं जिसमें एक गांव के लोगों का आजादी के लिये संघर्ष दिखाया गया है ।

vitti bambu

दिलीप प्रभावलकर गांव के पढ़े लिखे बुजुर्ग हैं उनका बेटा और बहु स्वतंत्रता संग्राम में मारे जा चुके हैं बावजूद इसके वे अंगेजों के पक्ष मे रहते हैं और अपने पोते का भी अंगेजी कपड़े और अंग्रेजी बोलचाल सिखाने की कोशिश करते हैं। इसलिये गांव के मुस्लिम नेता यतिन कार्येकर समेत सारे युवा उन से नाराज रहते हैं। उनका पोता एक नोटंकी करने वाली बाई के पास ज्यादा रहना पंसद करता है वो उसका अच्छा ख्याल भी रखती है लेकिन दादा को ये सब पसंद नहीं। एक बार गांव में एक बेहद सख्त ओर बदतमीज किस्म के अंग्रेज अफसर की नियुक्ती होती है। जो गांव वालों को जानवरों से ज्यादा नहीं समझता। उसी दौरान एक स्वतंत्रता सेनानी अशोक समर्थ उस अंग्रेज अफसर को मारने के चक्कर में अपने साथियों समेत पकड़ लिया जाता है। दादा पोता गिल्ली डंडा खेल रहे हैं तो गिल्ली मोटरसाइकल पर जा रहे उस अंगेज अफसर को लग जाती है और वो मर जाता हैं बाद उसका साहयक अफसर सारे गांव वालों पर कहर ढाता है। दादा को लगता है कि वो अफसर तो उसे जानता है इसलिये उसकी शर्म जरूर करेगा लेकिन जल्दी ही उसे समझ आ जाता है कि ये अंगेज किसी के नहीं। दादा अपने पोते का इल्जाम अपने सर ले लेता हैं। और उसे उसी जगह फांसी देने की सजा मिलती है जहां वो अंग्रेज मरा था। गांव वाले समझते हैं कि दादा हम सबसे बड़े आजादी के समर्थक है लेकिन उनका तरीका अलग था। फांसी के दिन उनकी फांसी के आर्डर केसिंल होने के बाद भी जब वो अफसर नहीं मानता तो उनका पोता और उसके ढेर सारे साथी उस अंग्रेज और उसकी पलटन को अच्छा सबक सिखाते हैं ।

ये कहानी उस वक्त की है जब आजादी की लड़ाई अंतिम चरण में थी देश आजतादी की कगार पर खड़ा था। इसलिये गांव गांव में आजादी की अलख जलाई हुई थी। दिलीप प्रभावलकर मराठी के बेहतरीन अदाकरों में से एक हैं। उनके अलावा गेस्ट भूमिका में अशोक समर्थ भी खासे प्रभावित करते हैं। रविन्द्र मनकानी, यतिन कार्येकर, मृणाल ठाकुर, संध्या तथा गौहर खान आदि कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है। निर्देशक ने खासी सिनेलिबर्टी लेते हुये बच्चों द्धारा अंग्रजो को मारने के दृष्य ऐसे बना दिये हैं जो हज्म नहीं होते। संवाद और संगीत अच्छे हैं। सबसे बड़ी बात कि फिल्म प्रभावशाली तरीके से अपनी बात कहती है ।


Mayapuri