मूवी रिव्यू: खास वर्ग की फिल्म है – ‘वेटिंग’

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रेटिंग***

कोई इंसान अपनों को नहीं खोना चाहता लेकिन नियति के आगे उसे झुकना ही पड़ता है। अनु मेनन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘वेटिंग’ में उपरोक्त बात के अलावा दो जनरेशंस के बीच का फर्क दिखाने की कोशिश की गई है।

कहानी

नसीरूद्दीन शाह कोचिन में एक प्रोफेसर हैं उनकी कोई औलाद नहीं है। वे अपनी पत्नि सुहासिनी मणीरत्नम को बहुत चाहते हैं लेकिन पिछले आठ महिने से वो कोमा में है जिनकी अब वापस होश में आने की कोई उम्मीद नहीं हैं लेकिन नसीर को पूरी उम्मीद है कि संसार में होने वाले चमत्कारिक हादसों की तरह एक दिन उसकी बीवी अचानक इस तरह उठकर बैठ जायेगी जैसे लंबी नींद से जागी हो। इसी प्रकार मुबंई में रह रही कल्कि कोचलिन के पति अर्जुन माथुर जो कोचिन में काम करते हैं उनका एक्सिडेंट हो जाता है वो भी उसी अस्पताल में दाखिल हैं जहां नसीर की बीवी। यहां नसीर और कल्कि दोनों मिलते हैं तो नसीर को पता चलता है कि आज की जनरेशन कितनी अलग है उसका बोलना चालना, पैशन आदि सभी कुछ उनसे पूरी तरह अलग है लेकिन एक वक्त ऐसा भी आता है जब दोनों को सच को स्वीकार करना पड़ता है।

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निर्देशन

निर्देशक ने दो अलग जनरेशन का परिचय बहुत ही अच्छी तरह से दिया है कि किस प्रकार आज की जनरेशन बुरे वक्त में भी फालतू के आडंबरों में पड़ना पसंद नहीं करती। दूसरे उनमें पैशन की भारी कमी है। किस तरह नसीर कल्कि को समझाते हैं कि जिस प्रकार उनकी पत्नि कोमा में हैं उसी तरह उसका पति भी बुरी हालत में हैं इसलिये अभी अपने सगे संबंधियों की भीड़ लगा लेना कहां की बुद्धिमानी है। इसलिये उसे भी खाना पीना और आराम करना चाहिये क्योंकि कल अगर उसका पति ठीक होने लगता है तब उसे उसकी जरूरत पड़ेगी। कल्कि अपने पति के साथ हुये हादसे का जिक्र अपने मां बाप के अलावा अपनी सास तक से नहीं करती। दूसरे निर्देशक एक बात से और सचेत करवाते हैं कि आज जिस तरह हम व्हाट्सअप या फेसबुक पर हजारों दोस्त बनाते हैं लेकिन वे सिर्फ वही तक के दोस्त हैं आपके बुरे वक्त में उनमें से एक भी काम आने वाला नहीं। एक दिन ऐसा भी आता है जब एक तरफ नसीर को एहसास होता है कि अब उसकी बीवी ठीक नहीं होने वाली तो क्यों मृगतृष्णा के साथ जीया जाये। इसी तरह कल्कि को पता चलता है कि उसके पति के ठीक होने के आसार हैं और उसका ऑपरेशन होने जा रहा है तो उसे भी अपने सगे संबंधियों की जरूरत पड़ने वाली है।

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अभिनय

बड़े अफसोस की बात है कि जिस प्रकार अमिताभ बच्चन को बेहद खूबसूरत और अलग भूमिकायें करने के लिये मिली उतनी नसीर को नहीं मिल पाई जबकि वो एक बहुत बड़े अभिनेता हैं। इस फिल्म में भी उन्होंने एक ऐसे पति की भूमिका को प्रभावी तरीके से साकार किया है जो अपनी पत्नी के ठीक होने की आस लगाये हुये संयत तरीके से जीने की कोशिश कर रहा है। उसी तरह कल्कि कोचलिन ने भी अपनी भूमिका को बढ़िया अभिव्यक्ति दी है।

क्यों देखें

फिल्म एक खास वर्ग के लिये है लिहाजा आम दर्शक फिल्म से दूर ही रहना पसंद करेगा।

 


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Mayapuri

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