वेब सीरिज रिव्यू – ए सूटेबल ब्वॉय

1 min


ए सूटेबल ब्वाय

रेटिंग: चार स्टार
निर्माताः लुक आउट प्रोडक्शन और बीबीसी स्टूडियो
कार्यकारी निर्माताः मीरा नायर, विक्रम सेठ, एंड्रो डालीस, फेथ पेनहले,  लोरा लंका ट्रीरी, अराधना सेठ

निर्देशकः मीरा नयर

एपीसोड नंबर चार के निर्देंशक- शिमित अमीन

अवधिः 6 घंटे (एक घंटे के 6 एपीसोड)
ओटीटी प्लेटफार्मः नेटफ्लिक्स

कलाकारः तब्बू, ईशान खट्टर, तान्या मनिकताला, रसिका दुग्गल, माहिरा कक्कर, राम कपूर, गगन देवरियार, विवेक गोम्बर, विवान शाह, शहाना गोस्वामी,मिखैल सेन, थॉमस वेन हेरपल, नमित दास, दवेश रजवी, जोएता दत्ता, शरबरी देशपांडे, सुजात खान, शुभम सराफ,रणदीप हुड्डा, आमीर बशीर, रणवीर शोरी, विजय वर्मा, विनय पाठक, सदफ जफर, मानसी मुल्टानी, अमृता दास, कुलभूषण खरबंदा, मनोज पाहवा व अन्य।

‘‘वार एंड पीस’’ व ‘‘नेमशेक’’ सहित कई चर्चित फिल्मों की निर्देशक मीरा नायर इस बार 1993 में छपे विक्रम सेठ के उपन्यास ‘‘ए सूटेबल ब्वॉय’’ पर इसी नाम की 6 लंबे एपीसोड की वेब सीरीज ‘‘ए सूटेबल ब्वॉय’’ लेकर आयी हैं, जो कि 23 अक्टूबर से ‘‘नेटफ्ल्क्सि’’ पर स्ट्रीम हो रही है।

ए-सूटेबल-ब्वाय

कहानीः

वेब सीरीज की कहानी के केंद्र में ब्रम्हपुर युनिवर्सिटी की छात्रा लता (तान्या मानिकतला) और उसकी बहन सविता के देवर मान कपूर (ईशान खट्टर)हैं।‘‘ए सूटेबल ब्वॉय’’के पहले एपीसोड की शुरूआत होती है ससविता मेहरा (रसिका दुग्गल) की  प्राण कपूर (गगन देवरियार) संग शादी से।जहां धीरे धीरे दोनो परिवारों के सदस्यों से भी परिचय होता है। रूपा मेहरा (माहिरा कक्कर) के दो बेटे अरुण मेहरा (विवेक गोम्बर) व वरुण मेहरा (विवान शाह) तथा दो बेटियां सविता मेहरा कपूर (रसिका दुग्गल) व लता (तान्या मनिक ताला) है। अरूण मेहरा की शादी मीनाक्षी चटर्जी मेहरा (शहाना गोस्वामी) से हुई है। जबकि प्राण कपूर के पिता सरकार में रेेवेन्यू मिनिस्टर महेश कपूर (राम कपूर) है। उनका एक भाई  मान कपूर (ईशान खट्टर) हैं। महेश कपूर के अजीज दोस्त हैं बैटर के नवाब (आमीर बशीर),जिनका बेटा है फिरोज खान (शुभम सराफ)। नवाब का नौकर है वारिस (रणवीर शोरी)। मान और फिरोज खान अच्छे दोस्त हैं। इस शादी के दौरान रूपा बार बार लता से कहती है कि अब अगला नंबर उसका है। यहीं पर लता व मान कपूर की दोस्ती भी सामने आती है। कुछ दिन बाद युनिवर्सिटी में लता की मुलाकात इतिहास के विद्यार्थी कबीर दुर्रानी (दवेश रजवी) से होती है। धीरे धीरे लता, कबीर दुर्रानी को चाहने लगती है, मगर समस्या यह है कि कबीर दुर्रानी मुस्लिम है, जिसे उसकी मां स्वीकार नही करेंगी।

उधर रेवेन्यू मिनिस्टर महेश कपूर सदन में जमींदारी को खत्म करने का कानून संदन में लाकर पास करा लेते हैं. इससे गृृहमंत्री एल एन अग्रवाल (विनय पाठक) और माड़ के राजा(मनोज पाहवा) नाराज हो जाते है।शाम को महेश कपूर के घर पर तवायफ साईदा बाई (तब्बू) का नाच गाना होता है, जिस पर मान फिदा हो जाते हैं और फिर मान कपूर अक्सर साईदा बेगम की कोठी पर जा उनके साथ यौन संबंध बनाने लगते हैं, इसे वह प्यार का नाम देते हैं।

दूसरे एपीसोड में लता व कबीर की मुलाकातों के बारे में रूपा मेहरा को पता चल जाता हैं। लता,कबीर से छिपकर मिलती है और साथ में भागने के लिए कहती है,पर कबीर दुर्रानी इंकार कर देता हैं। तब लता अपनी मां रूपा के साथ कलकत्ता चली जाती है। मान,साईदा की बहन तस्नीम (जोएता दत्ता) के उर्दू षिक्षक रशीद (विजय वर्मा) से साईदा के कहने पर उर्दू सीखने लगते हैं। पर एक दिन साईदा केा पता चलता है कि रशीद, तस्नीम पर प्यार के डोरे डाल रहा है, तो वह रशीद को उसके गांव भेज देती हैं। इधर महेश कपूर को मान व साईदा के संबंधों के बारे में पता चलता है, तो वह मान को घर से निकाल देते हैं। मान, साईदा की कोठी पर पहुंचता है, तो साईदा उसे उर्दू सीखने के लिए रशीद के साथ उसके गांव रूदिया भेज देती है।

उधर मीनाक्षी, लता को एक पार्टी मे अपने भाई अमित चटर्जी से मिलवाती है। वह चाहती है कि लता की शादी उसके भाई अमित से हो जाए।
तीसरे एपीसोड में रूदिया गांव में रशीद के साथ मान कपूर गांव वालों का दिल जीत लेता है, यहीं उसे वारिस का भी साथ मिलता है। रूपा बेटी लता के लिए लड़का ढूढ़ने के लिए लखनउ सहगल के यहां जाती है, जहां कल्पना कई लड़कों से मिलवाती है और जूता कंपनी मे काम करने वाले हरेश खन्ना (नमित दास) को वह पसंद करती है। इधर कलकत्ता में अमित चटर्जी, लता पर डोरे डाल रहा है। मान का पत्र साईदा बेगम को देने फिरोज जाता है, तो उसकी नजर तस्नीम पर पड़ती है और उसे दिल दे बैठता है।

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चौथे एपीसोड में गंगा दशहरा के मेले में भगदड़ में भास्कर खो जाता है, जिसे कबीर दुर्रानी सुरक्षित रूपा तक पहुंचाता है. लता युनिवर्सिटी के विद्यार्थियों द्वारा किए जाने वाले शेक्सपिअर के नाटक का हिस्सा बनती है, जहां एक बार फिर कबीर से मुलाकात होती है। रामलीला और मुहर्रम के जुलूस के वक्त दंगा भड़क जाता है। हिंदू कट्टरपंथियों से मान, फिरोज को बचाता है। लता अपनी सहेली  मालती से कह देती है कि वह कबीर से रिश्ता जोड़गी, ऐसा उसे नहीं लगता। अब कबीर दुर्रानी के भागने के प्रस्ताव को लता ठुकरा देती है। इधर, मान को साईदा बेगम ने निराश कर दिया है।

पांचवे एपीसोड में माड़ के राजा व गृहमंत्री अग्रवाल की बेरूखी को देखते हुए नवाब,1952 के आम चुनाव में महेश कपूर को अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए कहते हैं, उन्हीं के क्षेत्र में रूदिया गांव भी है, जहां के लोग मान के भक्त बन चुके हैं। मान अपने पिता के साथ जाकर प्रचार करता है। इधर कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं।साईदा,फिरोज को बुलाकर बताती है कि तस्नीम,फिरोज की बहन है।यानी कि वास्तव में तस्नीम,साईदा की बहन नहीं बल्कि साईदा और नवाब की बेटी है।जिस कोठी में साईदा बेगम रहती हैं,वह कोठी नवाब साहब ने ही उन्हे दी थी। मगर गलतफहती के चलते मान ,फिरोज के पेट में चाकू घोप देता है।

छठे एपीसोड में मान कपूर खुद पुलिस के सामने आत्मसमर्पण  कर अपना जुर्म कबूल कर लेता है। मगर फिरोज बच जाता है। पर इसका फायदा उठाकर वारिस खान, महेश कपूर के खिलाफ चुनाव में खड़ा हो जाता है और जीत जाता है। इससे नवाब को तकलीफ होती है। अदालत में फिरोज व साईदा बेगम इसे महज हादसा बताते हैं, मान बरी हो जाता है। कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं। अंततः लता सभी को ठुकराते हुए हरेश खन्ना संग शादी कर लेती है।

समीक्षाः

मीरा नायर न सिर्फ बेहतरीन फिल्मकार हैं, बल्कि उन्हे सिनेमा व भारत की अच्छी समझ भी हैं. उन्होंने पहले एपिसोड से ही पाकिस्तान के गठन के मद्देनजर हिंदू राष्ट्रवाद के उदय को रेखांकित कर उस वक्त के राजनैतिक हालात की ओर इशारा किया है। मीरा नायर ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी किस तरह सामाजिक बदलाव के साथ ही हिंदू मुस्लिम के बीच भेदभाव पैदाकर दंगे की संस्कृति को बढ़ावा दे रही थी। इसे समझाने के लिए ही एक दृश्य है, जहां राष्ट्रीय सत्तारूढ़ दल द्वारा समर्थित स्थानीय अधिकारियों द्वारा एक मस्जिद के सामने एक मंदिर का निर्माण का चित्रण है। तो वहीं  मान और उनके सबसे अच्छे दोस्त फिरोज के (शुभम सराफ) रिश्ते को देश में विकसित हिंदू-मुस्लिम गतिशीलता के लिए एक स्तरित प्रतीक के रूप में उपयोग किया गया है,  क्योंकि दो दोस्त क्रोध और पूर्वाग्रह से अंधाधुंध कतार से चले जाते हैं।

इस सीरीज में 1951 के माहौल के अनुरू पुरानी हवेलियां,  डिजाइनर कपड़े, पर्दे के पीछे पनपते जिस्मानी रिश्ते, घर में चलने वाली कूटनीतियां स्थापित करने में  मीरा नायर कामयाब हैं. मान की कहानी में नवाब के बेटे से उसकी दोस्ती को समलैंगिक इशारा देने की कोशिश भी पटकथा लेखक ने की है, लेकिन इसका विस्तार बाद में गायब मिला।

कैमरामैन की भी तारीफ करनी पड़ंगी. कैमरा जिस तरह से घुमाता  है,उसे देखते हुए दर्शकों को अहसास होता है कि उसके साथ ही कैमरा घूम रहा है।

अभिनयः

इस वेब सीरीज की सबसे बड़ी खूबी तब्बू और ईशान खट्टर की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री है। उम्रदराज तवायफ के किरदार में तब्बू ने शानदाार अभिनय किया है। वहीं मान कपूर के किरदार में इशान खट्टर भी बधाई के पात्र  है। लता के किरदार में तान्या मनिकताला भी प्रभावित करती हैं। कई दृश्यों में वह अपनी ऑंखों व चेहरे के भावों से बहुत कुछ कह जाती हैं। राम कपूर बेहतरीन अभिनेता हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। विजय वर्मा ने ठीक ठाक अभिनय किया है। विजय राज,रसिका दुग्गल,गगन की प्रतिभा को जाया किया गया है। रूपा मेहरा के किरदार मेें माहिरा कक्कड़ अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं।


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Mayapuri

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