वेब सीरीज ‘टब्बर’ से मेरे कैरियर में नया मोड़ आएगा- गगन अरोड़ा

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इंसान बहुत कुछ करना चाहता है, मगर अंततः वह उसी क्षेत्र में आगे बढ़ता है, जो उसकी तकदीर ने तय कर रख होता है। इसका जीता जागता उदाहरण हैं अभिनेता गगन अरोड़ा। मूलतः दिल्ली निवासी गगन अरोड़ा कालेज की पढ़ाई के दौरान थिएटर से जुड़कर तीन वर्ष तक स्ट्रीट प्ले व रंगमंच पर नाटकों में अभिनय करते रहे। लेकिन कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद फिल्म मेकिंग का कोर्स करके बतौर सहायक निर्देषक काम करना षुरू कर वह निर्देषक बनने का सपना देखने लगे थे। मगर उनकी तकदीर में तो निर्देषक बनना लिखा ही नहीं था, तभी तो आज लोग उन्हे एक अभिनेता के तौर पर पहचानते हैं। अब वह 15 अक्टूबर से सोनी लिव पर स्ट्ीम होने वाली अजीत पाल सिंह निर्देषित वेब सीरीज “टब्बर” में हैप्पी के किरदार में नजर आने वाले हैं।

प्रस्तुत है गगन अरोड़ा से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंष…

क्या आपके परिवार में कला का माहौल रहा है?

मेरी परवरिष दिल्ली में एक मध्यम वर्गीय पंजाबी परिवार में हुई है। मेरे घर के अंदर कला का कोई माहौल नही रहा। जब मैं कालेज में पढ़ने गया, तो देखा कि कुछ लोगों के अपने थिएटर ग्रुप बने हुए हैं, जिसके तहत वह नाटक करते रहते हैं और सारा षोर षराबा उन्ही के आस पास रहता है। कालेज के दूसरे लड़के भी उनसे प्रभावित रहते थे। यह कालेज के लड़के स्ट्रीट  प्ले किया करते थे। इनकी अपनी आवाज थी। यह पहली वजह बनी कि मेरा थिएटर की तरफ झुकाव हुआ। फिर मैने तीन वर्ष तक थिएटर किया। कई स्ट्रीट प्ले किए। रंगमंच पर कुछ नाटकों में अभिनय किया। स्टेज किया। वही मेरा अभिनय का मेरा पहला कदम था। उसके बाद मैने मुंबई के सेंट वियर कॉलेज से फिल्म मेकिंग की ट्रेनिंग हासिल की। जिससे फिल्म मेकिंग के हर कोने, हर विभाग को समझ सकॅूं। निर्देषन, एक्षन, कैमरा, संगीत आदि की समझ विकसित कर सकॅूं, जिससे जब मैं सेट पर रहॅूं तो किसी को मुझे समझाना न पड़े कि कैमरा एंगल क्या है? कोई मुझे बेवकूफ भी न बना सके।

फिल्म मेकिंग का प्रषिक्षण लेने के बाद किस तरह शुरुआत हुई?

फिल्म मेकिंग सीखने के बाद मेरा दिमाग विकसित हुआ और मैने सर्वप्रथम एड फिल्मों में बतौर सहायक निर्देषक काम करना षुरू किया। फिर मैंने फिल्म “स्त्री” में भी बतौर सहायक निर्देषक काम किया। इसके बाद मैं फिल्म निर्देषन की तरफ मुड़ने की सोच ही रहा था कि मुझे वेब सीरीज “कालेज रोमांस” में अभिनय करने का अवसर मिल गया।

मतलब?

बतौर सहायक निर्देषक काम करने के दौरान कुछ लोगों से मेरा परिचय हो गया था। एक दिन एक काॅस्टिंग डायरेक्टर, जिसे हर दिन एक निष्चित संख्या में ऑडिशन लेकर फार्म व टेप जमा करने होते हैं। उसने मुझसे कहा कि सिर्फ खानापूर्ति के लिए ऑडिशन देदूं, मैने उससे कहा भी कि मैने तीन वर्ष से अभिनय करना छोड़ रखा है, अब कहाँ से करुंगा। पर उसके कहने पर मैंने भी यॅूं ही मजाक में ऑडिशन दे दिया। यह मेरी जिंदगी का पहला ऑडिशन था और मेरा चयन भी हो गया था।

कालेज में अभिनय की तरफ झुकाव हो गया था और सेट पर काम करना आसान हो, इसी सोच के साथ आपने फिल्म मेकिंग सीखी। फिर अभिनय से मोहभंग क्यों हो गया था कि आप निर्देषन की तरफ मुड़ गए थे?

मोहभंग वाला मसला नही था। देखिए,जब मैं थिएटर कर रहा था, तो मेरे अंदर कैमरे को लेकर सवाल उठे थे, जिसके चलते कैमरे के सामने अभिनय करने की इच्छा बलवती हुई। उस रहस्य को जानने के लिए मैने फिल्म मेकिंग सीखी।

पहली बार ऑडिशन का अनुभव?

यह मेरी जिंदगी का सबसे बेखौफ ऑडिशन था। उस ऑडिशन से मुझे कोई उम्मीद ही नहीं थी। उसके बाद से पिछले तीन वर्ष से मैं अभिनय कर रहा हॅूं। इस बीच मैं जब भी ऑडिशन देेने जाता हॅूं, तो एक कतरा खौफ, डर का रहता है कि होगा या नही, ’कालेज रोमांस’ को सफलता मिलने के बाद मैने कई बहुत बुरे ऑडिशन दिए थे। तब मुझे अहसास हुआ कि अभिनय हवा में नही होता, सीखना चाहिए। तो उसके बाद मैने अभिनय के कुछ वर्कषाप किए। मैं पंाडीचेरी जाकर आदिशक्ति से ट्रेनिंग हासिल की।

आदिशक्ति में अभिनेता से पहले एक अच्छा इंसान बनाते हैं?

जी हाँ! वह लोग अभिनय बाद में सिखाते हैं। सबसे पहले हम इंसानों ने जो दिक्कतें पाल रखी हैं, उन्हे दूर करते हैं। उन्होने हमें समझाया कि किस तरह हमने समाज में सभी भावनाओं को मेलोड्ामा बना रखा है। हमें न खुलकर रोना आता है,न खुलकर हॅंसना आता है और न ही हमें खुलकर डरना ही आता है। इसलिए हम उसे निभा नही पाते। वहां की ट्रेनिंग लेते हुए हमने खुलकर हंसना, रोना वगैरह सब षुरू कर दिया। उन्होने हमें सिखाया कि किसी भी किरदार को निभाते हुए हमें हर चीज समाज से उठाने की जरुरत नही है। यदि आप ग्रे किरदार निभा रहे हैं, तो हमेशा अपने उपर वह जुर्म लेने की जरुरत नही है। मैथड एक्टिंग अच्छी चीज है, लेकिन कलाकार को क्राफ्ट विकसित करना चाहिए। ताकि अगर आप लगातार दो वर्ष नगेटिब किरदार के लिए षूटिंग कर रहे हों,तो आपकी और आपके परिवार की जिंदगी खराब न हो। आदिशक्ति ने मुझसे क्राफ्ट विकसित करवाया, जिससे मैं भावनाओं को विकसित कर सकून कि उन्हे अंदर से जीना न पड़े। कई बार उसे जीने की जरुरत भी पड़ सकती है। पर हर बार नहीं।

आदिशक्ति से ट्रेनिंग लेने के बाद भी ऑडिशन देते हुए डर लगता है?

जी हाँ! यह मानव स्वभाव है। यह डर रिजेक्षन का होता है। हम चाहे जितना प्रषिक्षण ले लंे, मगर सेर का सवा सेर तो हर जगह है। इसलिए हल्का सा डर लगता है। मैं अपनी तरफ से सौ प्रतिषत देने का प्रयास करता हॅूं, फिर भी हर बार लगता है कि कुछ कमी रह गयी। क्राफ्ट  से जुड़ा डर खत्म हो गया है, पर सेलेक्षन का डर लगा ही रहता है। कई बार आप किसी किरदार को दिल से करना चाहते हैं, उस वक्त आप नही चाहते कि आप उस किरदार को पाने से वंचित रह जाएं, तो उस वक्त ऑडिशन देते समय ज्यादा डर ज्यादा रहता है।

कॉलेज रोमांस” के बाद कैरियर किस तरह से आगे बढ़ा?

फिर मैने वेब सीरीज “गल्र्स होस्टल”और फिल्म “उजड़ा चमन” किया। उसके बाद ‘बेसमेंट कंपनी” नामक वेब सीरीज की.फिर “कालेज रोमांस” का दूसरा सीजन किया। एक वेब सीरीज “फाइंडिग अनामिका”की है, जो कि दीवाली में आएगी। इसमें मेरे साथ माधुरी दीक्षित,संजय कपूर,मानव कौल  भी हैं। अब मैने अजीत पाल सिंह की वेब सीरीज ‘तब्बर’ की है,जो कि सोनी लिव पर 15 अक्टूबर से स्ट्रीम होगी। तो ईष्वर की अनुकंपा से लगातार काम मिलता रहा। कभी गैप नही हुआ। पर हो यह रहा था कि मेरे पास एक जैसे किरदार आ रहे थे और मैं भी एक ही तरह का काम कर रहा था। जब मुझे पहली बार काम को मना करना पड़ा, तो अपने आप पर बड़ी कोफ्त हुई.लेकिन यदि उस काम को मना नही करता तो मैं ‘तब्बर’ नहीं कर पाता।

वेब सीरीज “टब्बर” करने की वजह क्या रही?

इसकी मुख्य वजह इतनी है कि मुझे पहली बार एक ऐसा किरदार निभाने का अवसर मिला, जिसे निभाने का अवसर मुझे इससे पहले नही मिला था। मैं लगभग टाइप कास्ट हो चुका था और अपनी ईमेज को तोड़ना चाहता था। मैं ‘चाकलेटी बॉय’,’बॉय नेक्स्ट डोर’, ‘दिल्ली वाला लड़का’ की इमेज से छुटकारा पाना चाहता था। मगर पहली बार मुझे “तब्बर” में एक संजीदा किरदार निभाने का मौका मिला है। यहां मैं अपने किरदार की गहराई को ढूंढ़कर उसे निभा सकता हॅूं। अजीत पाल सिंह का निर्देषन कमाल का है। इस किरदार की जानकारी मिलने पर मैं तो निर्देषक अजीत पाल सिंह के पीछे पड़ गया था कि मुझे यह किरदार करना है, आप चाहे जितनी बार मेरा ऑडिशन ले लीजिए। मैं उतने ऑडिशन देने को तैयार हॅूं।

वेब सीरीज “टब्बर” है क्या?

इसका अर्थ परिवार है। पंजाबी में परिवार को ‘टब्बर’ कहते हैं। तब्बर एक मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार की कहानी है, जिसमें माता पिता व दो भाई है। .यह आपको ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं कि सोचेंगे कि क्या सही है या क्या गलत? कई बार आप सही का तो कई बार आप खुद को गलत का साथ देते पाएंगे। पर आप सोचेंगे जरुर कि क्या मैं ऐसा ही सोचता यदि मेरे परिवार पर ऐसा बीत रहा होता।

टब्बर” में आपका किरदार किस तरह का है?

मैंने इस पंजाबी परिवार के सबसे बड़े बेटे हैप्पी का किरदार निभाया है। मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार के अनुसार अब हैप्पी को परिवार की जिम्मेदारी संभालनी है। माता पिता को जो भी करना था, वह कर चुके। अब परिवार का बड़ा बेटा होने के नाते परिवार को हैप्पी ही आगे लेकर जाएगा। घर की आर्थिक स्थिति को बेहतर करेगी। तो दूसरी तरफ उसकी अपनी दिक्कतें हैं। जो कि एक जवान लड़के के साथ होती हैं, जिसमें से प्यार सबसे बड़ी दिक्कत है। प्यार को आर्थिक हालातो के साथ संभालना बहुत बड़ी समस्या है। उसके साथ ही कैरियर को ढूढ़ना भी दिक्कत है। इस वेब सीरीज से मेरे कैरियर को नया मोड़ मिलेगा।

हैप्पी और गगन में कितना अंतर है?

कुछ समानताएं हैं। कुछ अंतर हैं। हैप्पी की ही तरह गगन यानी कि मैं भी मध्यम वर्गीय पंजाबी परिवार से हॅूं। मगर सबसे बड़ा अंतर यह है कि निजी जीवन में मैं अपने घर वालो से एकदम खुलकर बात कर सकता हॅूं। हैप्पी अपने घर वालों को खुलकर बातें बता नही पाता। अगर गलती हो जाए,तो छिपाने का प्रयास नही करता। हमने इसे पंजाब मे ही फिल्माया।

टब्बर” में सुप्रिया पाठक और पवन मल्होत्रा के साथ काम करना?

जब मुझे पता चला कि इस वेब सीरीज में सुप्रिया पाठक, पवन मल्होत्रा और रणवीर शौरी जैसी कुछ दिग्गज  प्रतिभाओं के साथ अभिनय करना है, तो मैं अंदर से बहुत उत्साहित था,लेकिन घबराहट भी थी। पर पहले दिन ही इन कलाकारों ने मुझे सहज कर दिया। उसके बाद हर दिन इन कलाकारों के साथ काम करना मेरे लिए एक मुफ्त की मास्टर क्लास जैसा था। क्योंकि मुझे सुप्रिया पाठक और पवन मल्होत्रा जैसे दिग्गज अभिनेताओं से कई नई चीजें देखने और सीखने को मिला।

आपने वेब सीरीज के अलावा फिल्म भी की है। कहां काम करने में ज्यादा मजा आया?

देखिए,मुझे तो सेट पर रहना व अभिनय करना पसंद है, इसके लिए मेरे पास एक स्क्रिप्ट,कैमरे के सामने खड़े होकर बोलने के लिए कुछ संवाद होने चाहिएं। जब भी मैं सेट पर होता हूं, तो वाटरपार्क में एक बच्चे की तरह खुश होता हूं।

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Mayapuri