जब अमिताभ बच्चन गब्बर सिंह का रोल निभाना चाहते थे

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फिल्म के 40 साल पूरे

15 अगस्त पर फिल्म ‘शोले’ के 40 साल पूरे होने पर बिग बी ने कुछ छुपे हुए राज बताए

– अली पीटर जॉन

मैं इस बात पर विश्वास करता हूं कि इतिहास बनाया या लिखा नहीं जाता बल्कि खुद ब खुद बन जाता है। यह कुछ 40 साल पहले की बात है। अमिताभ बच्चन ने अपनी पहली सफल फिल्म ‘जंजीर’ का स्वाद चखा। इस फिल्म में उनके साथ जया भादुड़ी व प्राण भी थे। यह फिल्म एक बड़ी हिट साबित हुई। साथ ही यह वो समय था जब फिल्मों के सफल लेखक सलीम-जावेद फिल्म शोले की स्क्रिप्ट लिख रहे थे। इस फिल्म के निर्देशक रमेश सिप्पी थे। अमिताभ बच्चन के दो बहुत ही अच्छे लेखक मित्र बन गए थे। उन्होंने ही फिल्म जंजीर के लिए उनकी सिफारिश की थी।

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साथ ही लेखक मित्रों ने रमेश सिप्पी के पास जाकर उनसे अमिताभ बच्चन को फिल्म में लेने की सिफारिश की। इस बारे में बात करने के लिए वह धर्मेन्द्र से भी मिले जो फिल्म मे ‘वीरू’ का किरदार को निभाने वाले थे। लेखक अपनी स्क्रिप्ट को अंतिम रूप देने के लिए थोड़ा समय लगा रहा था। इस फिल्म में धर्मेन्द्र व अमिताभ बच्चन के अलावा हेमा मालिनी, अमजद खान, संजीव कुमार, जया भादुड़ी भी महत्वपूर्ण किरदार में नजर आए। इन सब के बीच सबसे बड़ी चुनौती थी डकैत ‘गब्बर सिंह’ के किरदार की, कि इसे कौन निभाएगा। कुछ समय के लिए लोकप्रिय खलनायक डैनी डेन्जोंग्पा को फिल्म में लेने की बात हो रही थी पर डैनी डेन्जोंग्पा के साथ समय को लेकर कुछ परेशानी थी। थोड़ी देर के लिए अमिताभ खुद, गब्बर सिंह की भूमिका को निभाने में रुचि लेने लगे पर निर्देशक रमेश सिप्पी की अपनी ही एक पसंद थी। उन्होंने अमजद खान को देखा था जो जयंत के बेटे थे। जयंत साठ के दशक के विलन थे। रमेश सिप्पी ने अमजद खान को देख ‘गब्बर सिंह’ के किरदार के लिए उन्हें चुन लिया था। रमेश सिप्पी की ‘गब्बर सिंह’ को लेकर अमजद खान को पसंद किए जाने पर एक हलचल शुरू हो गई। ‘गब्बर सिंह’ जिन्हें फिल्म में धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार से लड़ना था व फिल्म में डकैतों के सरदार के रूप में भी नजर आना था। अमजद खान के बारे में कुछ लोगों का यह भी मानना था कि फिल्म में खतरनाक और पैशाचिक खलनायक के रोल की तुलना में अमजद खान की आवाज बहुत ही कमजोर है। साथ ही लोग अमजद खान के दोष के बारे में बात किया करते थे पर रमेश सिप्पी को विलेन की अपनी इस खोज पर पूरा विश्वास था। बंगलौर में फाइट सीन फिल्माना था इसलिए पहाडि़यों के साथ एक पूरे गांव का एक विशाल सेट तैयार किया गया जहां ‘गब्बर सिंह’ व उनके आदमी रहा करते थे। जिस समय फिल्म के एक्शन सीन राजस्थान के रेगिस्तान और मध्य प्रदेश के पहाड़ों में फिल्माये जाते थे उस समय एक्शन सीन बंगलौर में फिल्माये गए। कला निर्देशक एम.एस शिंदे द्वारा बनवाये गए सेट की चर्चा उस समय फिल्म इंडस्ट्री में हुआ करती थी। कई पर्यटकों और यहां तक कि स्थानीय लोग बड़े सितारें उस विशाल सेट की एक झलक पाने के लिए रामपुर गांव जाया करते थे। फिल्म ‘शोले’ की शूंटिग एक से डेढ़ साल तक चली। फिल्म के सभी एक्शन सीन व सभी स्टंट यू.के के अच्छे स्टंट- कोरडिनेटर की देखरेख में हुआ करते थे। यह हिंदी फिल्म के लिए पहली बार था कि किसी फिल्म को 70 एम.एम  में शूट किया गया। ब्रिटेन के बेहतरीन रिकॉर्डिंग स्टूडियोज में इस फिल्म की साउंड की मिक्सिंग की गई।

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अमिताभ बच्चन जो फिल्म ‘शोले’ के समय नए एक्टर थे। वही 72 साल के अमिताभ बच्चन आज शोला बन चुके हैं जबकि इनकी उम्र के सभी एक्टर उनके मुकाबले फीके नजर आने लगे है। अमजद खान, संजीव कुमार, लीला मिश्रा, ए.के हंगल, महान सिनेमाटॉग्राफर द्वारका दिवेचा और कला निर्देशक शिंदे, गीतकार आनंद बख्शी और संगीत निर्देशक आरडी बर्मन जैसे कई महान कलाकार आज दुनिया में नहीं रहे और असरानी, जगदीप, विजू खोटे और मेजर आनंद जैसे सितारे आज बूढ़े हो गए हैं व अब तो उनकी काम करने की उम्र भी नहीं रही। शोले के रिलीज के चालीस वर्ष पूरे होने पर कई संगठनों और लोगों ने कई स्थानों पर इसका जश्न मनाया, लेकिन सिर्फ अमिताभ बच्चन ने ही शोले की यादों को प्रेस के साथ याद किया।

अमिताभ बच्चन पिछले दिनों मीडिया के साथ रूबरू हुए। साथ ही फिल्म ‘शोले’ के अभिनेताओं, तकनीशियनों, निर्माता, निर्देशक के बारे में बातचीत की। उन्होनें विशेषतौर पर अपने व अमजद खान की दोस्ती का जिक्र भी किया। जहां अमजद खान अमिताभ बच्चन को छोटू कहा करते थे वही फिल्म की पूरी टीम ने दोनों को ‘लम्बाई-चौड़ाई’ का नाम दिया। अपने ‘जय’ के रोल के बारे में बात करते हुए अमिताभ बच्चन ने कहा कि उन से पहले शत्रुघ्न सिन्हा को इस रोल के लिए लेने की बात चल रही थी व फिल्म के हर एक व्यक्ति लीला मिश्रा, जगदीप, असरानी और द्वारका दिवेचा द्वारा किए गए योगदान को भी याद किया। उन्होंने अपने को-स्टार धर्मेन्द्र की भी तारीफ की। आज भी अमिताभ बच्चन को वो पल याद है जब सभी लोग फिल्म की शूंटिग खत्म होने के बाद भी फिल्म के सेट पर रहा करते थे तथा कैसे धर्मेन्द्र भी एक बार फिल्म के सेट पर चारपाई पर सो गए थे। उन्हें वो समय भी याद है जब वह और धर्मेन्द्र एक ही कार में ट्रेवल कर रहे थे तो भारी-भीड़ ने उन्हें नहीं पहचाना पर जब लोगों ने धर्मेन्द्र को देखा तो लोग पागल हो गए। इस भीड़ से निकलने और अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए अमिताभ बच्चन ने अपनी कार से ना जाकर ऑटो से जाना ज्यादा ठीक समझा।

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उन्होंने 15 अगस्त 1975 का दिन याद किया जब शोले का प्रीमियर मिनर्वा टॉकीज में हुआ। जहां फिल्म की पूरी टीम आमंत्रित थी। फिल्म 35 एम.एम स्क्रीन में दिखाई गई थी क्योंकि 70 एम.एम प्रिंट समय में नहीं पहुँच सका। इस वजह से फिल्म को लेकर लोगों ने इस बारे में बहुत ही गलत राय बनाई। फिल्म रिलीज के दो दिन बाद तक निराशाजनक रही साथ ही फिल्म एक अंधेरे में जाती नजर आने लगी। इसके बाद ही फिल्म के दोनों लेखक, अमिताभ बच्चन, रमेश सिप्पी की अमिताभ बच्चन के घर एक आपातकालीन बैठक हुई जिसमें फिल्म को किस तरह बचाया जाए इस बारे में बात हुई। फिल्म को लेकर इन सभी को यह लगने लगा कि हो सकता है कि फिल्म में ‘जय’ के मरने वाला सीन सबसे कमजोर सीन है, साथ ही उन्हें यह भी महसूस हुआ कि हो सकता है दर्शकों ने जया भादुड़ी का विधवा होना भी अच्छा नहीं लगा होगा और सबसे ज्यादा तो इन सब ने यह महसूस किया कि लोगों ने अमजद खान को गब्बर सिंह के रूप में स्वीकार्य नहीं किया। इन चारो ने यह तय किया कि वे दोबारा रामपुर गांव जाएंगे व फिल्म जय को राधा के जीवन में वापस लेकर आएंगे। यह सब तय कर लिया गया था यहा तक की समीक्षाओं ने व दर्शकों ने विकल्प को दुत्कारा लेकिन अंतिम समय में रमेश सिप्पी ने कहा हमें सोमवार तक इंतजार करना चाहिए वो सब राजी हो गए, सोमवार की सुबह पूरी तरह से फिल्म के समर्थन में रही फिल्म की हर एक चीज पसंद आई। इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर इतिहास रच दिया अलग-अलग थियेटरों पर पांच सालों तक ये फिल्म चलती रही और आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में ये फिल्म मील का पत्थर हैं।

इस फिल्म ने न केवल मुख्य किरदार निभाने वाले कलाकारों की जिन्दगी बदली बल्कि फिल्म में काम करने वाले बाकी कलाकारों की भी जिंदगी बदल कर रख दी। फिल्म के किरदारों के नाम केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी छाये रहे। अमिताभ बच्चन ने इसका श्रेय फिल्म के लेखकों, सलीम-जावेद को दिया। जिन्होंने फिल्म की ऐसी कहानी लिखी जिस वजह से आज इस फिल्म ने इतिहास बनाया। विशेष रूप से अपने खुद के रोल को इतने बेहतरीन तरीके से लिखने के लिए भी श्रेय दिया।

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अमिताभ बच्चन ने यह भी बताया कि इस फिल्म को किस तरह से सेंसर बोर्ड का सामना करना पड़ा व इससे जुड़ी समस्याओं के बारे में बात करते हुए बताया कि उस समय फिल्मों के 90 फीट के एक्शन के होने की अनुमति नहीं थी व हिंसा के अत्याधिक दृश्यों को एडिट किया गया। दरअसल फिल्म की असल कहानी में ठाकुर गब्बर सिंह की क्रूरता से हत्या कर देता है पर रमेश सिप्पी ने फिल्म के क्लाइमेक्स को बदल दिया और फिल्म में ठाकुर जब गब्बर सिंह को जान से मारने वाला होता है तभी पुलिस आ जाती है और गब्बर सिंह को गिरफ्तार कर लेती है। इस फिल्म ने दर्शकों पर अपना जादू सा कर दिया था। इस तरह की फिल्म लोगों ने कभी भी नहीं देखी थी व दर्शकों ने इस फिल्म को न केवल सराहा बल्कि अपने दिल में भी जगह दी।

ऐसे बहुत सी जगह देखने को मिली जहां लोगों नें इस फिल्म को अनेकों बार देखा, एक दिन अमिताभ बच्चन फिल्म ‘शोले’ के बारे में बात करने से पहले उन परिवारों से मिले जिन्होंने इस फिल्म को हजार बार देखा। कुछ महीने पहले मैं मध्य प्रदेश में खजुराहो के एक फिल्म समारोह में भाग लेने पहुंचा। जहां लोगों की भीड़ हर शाम फिल्म को फ्री में देखने की उम्मीद में आती थी। लेकिन जिस रात ‘शोले’ की स्क्रीनिंग की गई शकरपुर का पूरा क्षेत्र बाहर आ गया जो कि बहुत समय से फिल्म देखने की चाह में था कि क्या यह दूसरी शोले होगी? अमिताभ बच्चन ने अनिश्चित रूप से कहा कि जब तक मैं तक जीवित रहूंगा मुझे ऐसा मंजर शोले को दोबारा देखने को नहीं मिलेगा। यह उन सभी शोले लवर्स की भावना है और मुझे लगता है कि मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हूं जिसे मिनर्वा में इस फिल्म का प्रीमियर देखने का मौका मिला। प्रीमियर के मौके पर फिल्म जगत का हर व्यक्ति यह बोलता हुआ बाहर आ रहा था कि ‘कितनी भयानक फिल्म थी ये’। वह सभी व्यक्ति गलत साबित हुए जब इस फिल्म ने विश्व स्तर पर धमाका मचाया। अब इस फिल्म को चौथी पीढ़ी भी देख रही है व पसंद कर रही है जिस तरह  उनके माता-पिता, दादी-दादा ने 40 साल पहले देखा व पसंद किया था।


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Mayapuri

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