जब प्रेमनाथ ने बॉलीवुड की छवि को बिगाड़ते हुए पूरे हॉलीवुड को अचंभित कर दिया था 

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अली पीटर जॉन

प्रेमनाथ अब वो हैंडसम हीरो नहीं थे। वो शांति की तलाश में निकलने के बहुत सालों बाद साधुओं के झुंड के साथ वापस आए थे। जब वो मुंबई पहुंचे तो पूरी इंडस्ट्री उनके भीतर इस बदलाव को देखकर आश्चर्यचकित थी। प्रेमनाथ टकले हो चुके थे, उन्होंने एक साधारण सी लुंगी पहनी थी और ना सिर्फ गले में बल्कि पूरे शरीर पर 100 से अधिक मालाएं थी। सब से मिलकर वो ‘बम बम भोले’ कहा करते थे। पर कुछ फिल्ममेकर्स थे जैसे  विजयानंद, देवानंद और सुभाष  घई जो अभी भी प्रेमनाथ के साथ काम करना चाहते थे। प्रेमनाथ फिर से मशहूर हुए विजय आनंद की फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम’ में अपने विलेन के किरदार से। इस फिल्म में प्रेमनाथ का एक डांस नंबर था पदमा खन्ना के साथ जो लगभग एक पोर्नोग्राफ़िक डांस ही था। प्रेमनाथ ने सुभाष घई की फिल्म ‘कालीचरण’ और ‘कर्ज’ में भी काफी अलग और पागलों वाला किरदार निभाया था।

कृष्णा शाह, एक भारतीय फिल्ममेकर जिन्होंने हॉलीवुड में भी काम किया है,वो अपनी पहली डकैती के ऊपर आधारित फिल्म ‘ शालीमार’ बना रहे थे, जो हिंदी और इंग्लिश दोनों में बन रही थी। इस फिल्म में उन्होंने हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों जगह के स्टार्स को कास्ट किया था, जैसे धर्मेंद्र, जीनत अमान, ओ. पी रालहान, प्रेम नाथ और हॉलीवुड के रेक्स हैरिसन, सिलविया माइल्स और अगर मुझे सही याद है तो जॉन सेक्सऑन।

‘शालीमार’ का लॉन्च बहुत भव्य समारोह के साथ हुआ। इस समारोह में बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक के बड़े-बड़े सितारे मौजूद थे।

इस मौके पर प्रेमनाथ अपनी पुरानी गाड़ी में बहुत सारे साधुओं के साथ पहुंचे और इससे पहले कि मुहूर्त का शॉट होता है उन्होंने सड़कों पर बहुत से पक्षियों को मार कर फेंक दिया। ये उनके पूजा करने का तरीका था।

उनका एक सेक्रेटरी था जो हमेशा उनके साथ होता था। सेक्रेटरी के हाथ में हर वक्त एक पीतल का घड़ा होता था। एक बार प्रेमनाथ ने अपने सेक्रेटरी पर जोर से चिल्लाया और कहां, ‘ वो पौट( घड़ा) लेकर आओ’। उस  सेक्रेटरी के पास अपने स्वामी के पागलों वाले आज्ञाओं को मानने के अलावा और कोई  चारा नहीं था। वो घड़ा लेकर आया, और प्रेमनाथ ने पूरी भीड़ के सामने अपनी लुंगी उठाकर उस घड़े में पेशाब की और वो घड़ा तब भी उस  सेक्रेटरी के हाथ में ही था। लोगों ने इसे अप्रिय कहा तो प्रेमनाथ लोगों के ऐसे कमेंट से नाखुश हुए। यह उनका एक तरीका (अनुष्ठान) था जिसका वो हर जगह पालन करते  थे। और एक बार तो ऐसा उन्होंने हवाई जहाज में भी किया था।

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