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क्यों नहीं बात की जाती फिल्मों की भाषा पर?

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गृहमंत्री अमित शाह ने जब से ‘हिन्दी को लेकर राष्ट्र भाषा’ वाला बयान दिया है, एक बार फिर से भाषा पर विवाद छिड़ गया है। दक्षिण के दूसरे नेताओं के साथ अभिनेता कमल हासन का विवादित बयान हमें और भी चौंकाता है कि ‘कोई शाह, सुल्तान या सम्राट’…ऐसा नहीं कर सकते!’ हमें कमल हासन का वह दौर याद आता है जब उन्होने बॉलीवुड में अपनी पहली हिन्दी फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ से शुरूआत की थी। ‘मायापुरी’ की पत्रकार स्वर्गीय छाया मेहता और शरद राय को कई बार उन्होंने कहा था कि वे उनको हिन्दी सिखाएं, क्योंकि वे अच्छी हिन्दी नहीं बोल पाते हैं। तब के कमल हासन बदल गये हैं क्योंकि वह अब नेता बन गये हैं। अभिनेता के रूप में हर कलाकार राष्ट्रीय छवि बनाने के लिए हिन्दी की वकालत ही करता है। फिल्म के रूप में जो भाषा ग्राह्य है, हम क्यों नहीं राष्ट्रभाषा के रूप में उस भाषा की वकालत करते हैं? कुछ समय पहले मायापुरी की संपादकीय (अंक 2334) में हमने लिखा था-‘बॉलीवुड फिल्मों की भाषा ही देश की भाषा है।’ जिस पर हमें हजारों की संख्या में प्रतिक्रियाएं आई थी। हमारी सलाह को सबने सराहा था। यहां हम एक बार फिर से बताना चाहेंगे ‘बॉलीवुडिया भाषा’  होती तो हिन्दी है मगर उसमें हर भाषा का मिश्रण होता है। हिन्दी फिल्मों के डायलॉग जब कोई गुजराती करेक्टर बोलता है तो गुजराती-मिश्रण होता है। वैसे ही जब मारवाड़ी करेक्टर संवाद बोलता है तो मारवाड़ी, बंगाली करेक्टर बोलता है तो उसमें सहजता से बंगाली शब्द और प्रोनाउंसिएशन की झलक होती है। मजे की बात यह है कि दक्षिण भारत की भाषाएं जो हिन्दी के साथ बिल्कुल ताल से ताल नहीं मिला पाती वहां भी बॉलीवुड-फिल्में चलती हैं। दक्षिण के पात्र बॉलीवुड फिल्मों में कैसे बोलते हैं, बताने की जरूरत नहीं है। दक्षिण टीवी के पर्दे पर चलाई जा रही हैं और पसंद की जा रही हैं। दक्षिण के लहजे में कलाकार हिन्दी-फिल्मों में संवाद बोलते हैं तो दर्शक पसंद करते हैं। फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ का हीरो (कमल हासन) और ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ की हीरोइन (दीपिका पादुकोण) इस बात के उदाहरण हैं। मेहमूद ने किस तरह हिन्दी फिल्मों में हैदराबादी भाषा को टोन दिया और उत्त्पल दत्त की बंगाली कितनी प्यारी होती थी बताने की जरूरत नहीं। हिन्दी-फिल्में दक्षिण भाषी प्रदेशों के अलावा गुजरात, पंजाब, असम, महाराष्ट्र के टिपिकल गांवों में भी उसी चाव से देखी जाती हैं। आंकड़े बताते हैं दक्षिण में फिल्मों की क्लैक्शन का10ःबॉलीवुड फिल्मों से और बंगाल में 30ः की क्लैक्शन है, जहां से राष्ट्रभाषा को लेकर स्वर मुखरित हो रहे हैं।  तात्पर्य यह कि बॉलीवुड फिल्म की भाषा में हर भाषा के शब्द सुपाच्य हैं। अपुन,तपुन, भाया, राउर…जैसे शब्द राष्ट्रीय शब्द बन गये हैं जो बॉलीवुड-फिल्मों से आते हैं। ऐसे हर भाषा के शब्द बॉलीवुड फिल्मों से तालमेल बना चुके है। तो क्यों नहीं बात की जाती बॉलीवुड फिल्मों की भाषा पर? वो भाषा जो पूरे देश को समझ में आ जाती है!!

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