आइये जानते है भारतीय सिनेमा के पिता स्वर्गीय यश चोपड़ा के बारे में

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भारतीय सिनेमा को आज हम जिस रूप में जानते हैं, उस रूप में आने के लिए इसे एक लम्बी यात्रा करनी पड़ी है. मूक फ़िल्में बनाने से लेकर आज विश्व में सर्वाधिक फ़िल्में बनाने तक के सफर में निश्चित तौर पर भारतीय सिनेमा ने बहुत प्रगति की है.

अगर हम हिंदी सिनेमा की विरासत की बात करें, तो देखेंगे कि आज यह जिस जगह है, उसे वहां तक पहुँचाने में कई लोगों का योगदान रहा है. राज कपूर, दिलीप कुमार, गुरू दत्त और देव आनंद कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होंने हिंदी  सिनेमा को खड़ा किया है.

इन सब नामों के बीच अगर यश राज चोपड़ा का नाम न लिया जाए, तो यह हिंदी सिनेमा की विरासत के साथ अन्याय होगा. यह अन्याय तब  और अधिक होगा, जब हमें यह पता चलेगा कि एक समय यश राज चोपड़ा और हिंदी सिनेमा एक-दूसरे के पर्यायवाची रहे हैं.

मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता में विश्वास

हिंदी सिनेमा में यश राज चोपड़ा के योगदान को किसी भी तरह से मापा नहीं जा सकता है. यश राज चोपड़ा खुद ही इसमें विश्वास नहीं रखते थे. वे मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता में विश्वास रखते थे. इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपने पचास साल के लंबे करियर में केवल21 फ़िल्में निर्देशित कीं.

यश राज चोपड़ा का लक्ष्य हमेशा दर्शकों के मन और दिल को छू लेने का रहा. भारतीय सिनेमा में यह उनका ही प्रभाव है कि आज भी हम बर्फ की सफ़ेद चादर ओढ़े पहाड़ों में एक रोमांटिक गाने की कल्पना कर पाते हैं.

यश चोपड़ा ने इतनी गहराई से प्रेम कहानियों को हमारे दिलों में भरा है कि आज भी बॉलीवुड में अगर प्रेम-कहानी पर आधारित कोई फिल्म बनती है, तो उसपर यश चोपड़ा की विरासत की छाप साफ़ नजर आती है. हालाँकि, तथ्य यह भी है कि यश चोपड़ा केवल प्रेम-कहानियाँ गढ़ने तक सीमित नहीं रहे. उनकी विरासत इससे कहीं अधिक है, यही विरासत उन्हें यश चोपड़ा बनाती है.

यश चोपड़ा एक ऐसे फिल्मकार थे, जिन्होंने एंग्री यंग मैन प्रारूप की फ़िल्में बनाईं. 1975 में आई दीवार उनमें प्रमुख रही है. इससे पहले 1965 में उन्होंने फिल्म ‘वक्त’ के रूप में पारिवारिक ड्रामा को दर्शकों के सामने रखा.

1984 में उन्होंने ‘मशाल’ फिल्म बनाई. इस फिल्म में उन्होंने समाज के साथ नैतिक द्वन्द में फंसे हुए एक ईमानदार व्यक्ति की कहानी कही. वहीं 1978 में आई ‘त्रिशूल’ फिल्म में उन्होंने महाभारत के कर्ण को पुनर्जीवित किया. कुल मिलाकर लब्बोलुआब यही है कि उन्होंने हर तरह की फ़िल्में बनाईं.

निषेध मान लिए गए विषयों को दी जगह

यश चोपड़ा ने अपने करियर की शुरुआत में ‘धूल का फूल’, ‘धर्मपुत्र’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी कम पहचानी जाने वाली फ़िल्में बनायीं थीं. इन फिल्मों को भले ही दर्शकों से उतनी सराहना नहीं मिली, जितनी की ‘दिल तो पागल है’ को मिली, लेकिन ये फ़िल्में यश राज चोपड़ा के बौद्धिक पहलू को बड़ी बखूबी दर्शाती हैं.

यश राज चोपड़ा ने अपना करियर भाई बी आर के कुशल नेतृत्व में शुरू किया था. शुरू-शुरू में यश अपने बड़े भाई के सहायक के रूप में काम करते थे. उन्हीं के नेतृत्व में उन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म बनाई थी. आगे 1973 में फिल्म ‘दाग’ के साथ उन्होंने ‘यश राज चोपड़ा’ प्रोडक्शन हाउस की नींव रखी और इसने हिंदी सिनेमा में एक नए युग की शुरूआत की.

यश चोपड़ा की फिल्मों को व्यावसायिक फ़िल्में कहा गया, लेकिन कहानी कहने की कला में यश चोपड़ा अपने समय से बहुत आगे थे. उनकी फिल्मों ने समाज में निषेध माने गए विषयों पर बहस नई बहस छेड़ी. इन विषयों में व्यभिचार, शादी के पूर्व यौन संबंध इत्यादि शामिल थे. इन निषेध मान लिए गए विषयों को उन्होंने मुख्यधारा में जगह दी.

इसकी वजह से इन विषयों पर बात होने लगी. पहली की तरह अब इनपर बात करना डरावना नहीं रहा.

1981 में उन्होंने ‘सिलसिला’ फिल्म बनाई. उस समय के हिसाब से इसमें शामिल किरदार बहुत कंट्रोवर्सियल थे, लेकिन यश चोपड़ा ने सनसनीखेज तरीके से प्रतिक्रिया देने की बजाय बड़ी ही परिपक्वता के साथ इस मुद्दे को हल किया.

इस मुद्दे पर जब शाहरुख़ खान ने उनसे एक साक्षात्कार में प्रश्न पूछा तो उन्होंने बताया कि पहले-पहल सिलसिला के लिए उनके दिमाग में अलग अभिनेत्रियों की छवि थी, लेकिन अंत में उनका दिल रेखा और जया प्रदा पर ही अटक गया था.

इसको लेकर उन्होंने अमिताभ बच्चन से बात की. अमिताभ ने उनसे कहा कि जया और रेखा इतनी प्रोफेशनल तो हैं हीं कि काम करते वक्त अपने व्यक्तिगत मतभेद दूर रखेंगी. इसके बाद ही यश ने शूटिंग की तैयारी शुरू की.

आने वाली पीढ़ियों के लिए रचा सिनेमा

1991 में यश ने ‘लम्हें’ फिल्म बनाई. इस फिल्म में एक ऐसी युवा लड़की की कहानी है, जिसे अपने से उम्र में बहुत बड़े पुरुष से प्रेम हो जाता है. और तो और यह पुरुष एक समय उस लड़की की मां का प्रेमी था. यह फिल्म यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित सबसे बेहतरीन फिल्मों की श्रेणी में आती है.

इससे पहले बॉलीवुड में ऐसी फ़िल्में नहीं बनी थीं. जाहिर था कि इसके ऊपर सवाल तो उठने ही थे, सो उठे भी. यश भी इसके लिए पहले से तैयार थे. वे इसके लिए इस तरह से तैयार थे कि उन्होंने कभी दर्शकों के पूर्वाग्रहों के अनुकूल फ़िल्में बनाने की बात सोची ही नहीं थी.

आशा के अनुरूप लम्हें को त्वरित सफलता नहीं मिली, लेकिन इस फिल्म ने एक बड़े कैनवास पर निर्देशक की दूरदर्शिता को निश्चित तौर पर उकेरा. यश को पता था कि सिनेमा आने वाली पीढ़ियों के लिए है, इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह फिल्म बनाई थी.

यश चोपड़ा एक ऐसे निर्देशक थे, जिन्होंने शाहरुख़ खान के रूप में सिनेमा को एक स्टार दिया. 1993 में आई फिल्म ‘डर’ अपने आप में लीक से हटकर फिल्म थी. इस फिल्म के आने के बाद से अभी तक शायद ही ऐसी कोई फिल्म आई हो, जिसमें हीरो से ज्यादा विलेन को प्रमुखता मिली हो. आज अगर ‘डार्क लव स्टोरी’ प्रारूप की कोई फिल्म आती है, तो अपने आप ही इसकी तुलना ‘डर’ से होने लगती है. ऐसा केवल इसलिए है क्योंकि यश चोपड़ा ने ‘डर’ के द्वारा बहुत ऊंचे मापदंड स्थापित किए हैं.

यश चोपड़ा ने अपने करियर की ढलान पर बहुत कम फिल्मों का निर्देशन किया. लेकिन जो विरासत वे छोड़ गए, वो बेमिसाल है. आज जिन फिल्म निर्माताओं की फ़िल्में हम देखते हैं, वे यश चोपड़ा की फ़िल्में देखते हुए बड़े हुए हैं. उनके ऊपर यश चोपड़ा की कलाकारी का गहरा प्रभाव है.

ऐसे बहुत से निर्माता और निर्देशक होते हैं, जो अच्छी फ़िल्में बनाते हैं. लेकिन ऐसे बहुत कम होते हैं, जिनका नाम सिनेमा का पर्यायवाची होता है. इन अर्थों में यश चोपड़ा इसी श्रेणी में आते हैं. उनका नाम अगर हटा दिया जाए, तो हिंदी सिनेमा बहुत खाली-खाली नज़र आएगी.

 


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Niharika jain

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