अवार्ड्स जीतने भर से काम नहीं मिलना, काम के लिए सिर्फ ख़ूब मेहनत से काम करते रहना ज़रूरी है

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हुसैन दलाल यूँ तो फिल्मों में लेखन करते हैं। जवानी है दिवानी के डायलॉग्स हुसैन ने ही लिखे थे जो बहुत प्रचलित हुए थे। इसके साथ ही हुसैन को एक्टिंग का भी शौक है। शोर्ट फिल्म शेमलेस के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिल चुका है। आने वाली फिल्म तूफ़ान में हुसैन दलाल फ़रहान अख्तर के जिगरी दोस्त बने हैं, उनसे हुई बातचीत का यह मुख्य अंश पेश है–सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’

हुसैन दलाल मायापुरी मैगज़ीन के इस ख़ास इंटरव्यू में आपका स्वागत है, सबसे पहले आप मुझे अपनी यात्रा के बारे में बताएं, कहाँ से हैं आप? फिल्मों में किस तरह आने का सौभाग्य बना?

मैं मसगांव मुंबई से ही हूँ। मैं अभी कुछ सालों से (करीब दस साल से) इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ हूँ। मैं यूँ तो लिखता हूँ, लिखना ही पसंद करता हूँ पर कभी कभी ज़्यादा एक्साइटेड हो जाता हूँ तो एक्टिंग भी कर लेता हूँ। ज़्यादा वक़्त मैंने राइटिंग को ही दिया है। एक्टिंग कम की है इसलिए लोगों को लगता है कि मैं अभी अभी आया हूँ, तो वो अच्छा है। इस फिल्म में भी मुंबई एक बहुत बड़ा किरदार है, इसलिए मुझे ये किरदार करने में बहुत मज़ा आया। राकेश सर के साथ (राकेश ओमप्रकाश मेहरा) मैं पहले भी फिल्में लिख चुका हूँ। मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर हमने साथ में लिखी थी। तो अचानक उनका फ़ोन आया और बोले देख ये तेरे मतलब का करैक्टर है, करेगा? तेरी गली की ही पिक्चर है। बस तुरंत ही मैं हाँ कर दी।

मैं आपकी बायो देखता हूँ तो सबसे बड़ा ब्रेक ये जवानी है दिवानी के रूप में दिखता है। आपको इसके लिए अवार्ड भी मिला था। तो आपको उसके बाद से काम करने में ज़्यादा सहूलियत होने लगी? क्या अवार्ड के बाद ज़्यादा कांम मिलने लगा?

देखिए अवार्ड्स बहुत अच्छे होते हैं। मुझे वो स्टार गिल्ड अवार्ड मिला था। वहाँ जाना एक गेटटुगेदर जैसा होता है। सब मिलते हैं बातें करते हैं क्या कर रहे हैं ये भी डिस्कस होता है पर काम तो आपको काम करने से ही मिलता है। आप काम करते चलिए आपको काम मिलता रहेगा। अवार्ड्स वगरह से काम का क्या लेना-देना।  अवार्ड फंक्शन्स से किस्मतें बदलने वाला कांसेप्ट जो है वो सिर्फ बातों में है। मैं मुंबई में पिछले आठ-दस साल में पच्चीस से तीस फिल्में लिख चुका हूँ। तो यहाँ काम की कमी नहीं है। आपको बस मेहनत करने की ज़रुरत है। मैं बीस घंटे काम करता हूँ, कभी कभी अच्छा लिख देते हैं, पिक्चर ब्लॉकबस्टर हो जाती है कभी अच्छा काम नहीं होता तो फिल्म बैठ जाती है। पार्ट ऑफ लाइफ है।

अच्छा मुझे अब आने वाली फिल्म तूफ़ान के बारे में कुछ तफसील से बताइए, तूफ़ान काफी समय से तैयार पड़ी है लेकिन रिलीज़ नहीं हो पाई। इसके पीछे covid ही वजह रही या कुछ और? फिर आपका इस फिल्म के कैसे जुड़ना हुआ?

देखिए मैं राकेश सर को बहुत समय से जानता हूँ। ह्मने फन्ने खां में साथ काम किया था। फिर मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर उनकी अपनी फिल्म थी, ख़ूब सारे प्यारे-प्यारे बच्चे थे उनमें, वो मैंने राकेश सर के साथ लिखी थी। तो उन्होंने एक रोज़ फोन कर कहा कि यार तेरे लिए एक रोल है, आ देख ज़रा ऑडिशन दे। वो मेरी पर्सनालिटी जानते हैं। राकेश सर असल में बहुत सेंटर्ड पर्सन हैं। वो योग करते हैं। कॉंफिडेंट रहते हैं तो इस तरह मैं इस फिल्म से जुड़ा। फिर ये फिल्म हमने 2019 में तैयार कर ली थी। लेकिन उस वक़्त covid के चलते लोग इतने परेशान थे, इतनी मुसीबतें थी हर घर में की हमारा दिल ही नहीं किया की इसको रिलीज़ करें। जहाँ एक तरफ लोगों के घरों में किसी न किसी की जान जा रही है वहाँ हम किस मुँह से कहेंगे कि आइए हमारी फिल्म देख लीजिए। बस फिर डिले होते-होते OTT platform पर रिलीज़ करने का प्लान बना और अब जब धीरे धीरे मार्केट खुल रहा है, लोग काम कर रहे हैं, तो लगता है कि अब फिल्म देखने के लिए थोड़ा समय भी निकाल सकते हैं।

फ़रहान अख्तर के साथ काम करना कैसा रहा? आपके करैक्टर का नाम क्या है इसमें?

फ़रहान के बारे में तो मैं क्या बताऊं आपको, वो मास्टर हैं। जैसे अमूमन एक एक्टर सिर्फ एक्टिंग तक ही सोच पाता है लेकिन फ़रहान हर डायमेंशन पर नज़र रखते हैं। वो एक राइटिंग, एक डायरेक्टर, एक एक्टर हर नाते से करैक्टर को समझते हैं। मेरे करैक्टर का नाम इसमें मुन्ना है। क्योंकि हम दोस्त बने हैं इसमें, तो वो ऐसे ही रहे हैं पूरे शूट में कि जैसे हम दोस्त हैं। अमूमन आपको फिल्मों में हीरो का दोस्त, दोस्त कम उसका हैंडीमैन ज़्यादा नज़र आता होगा पर यहाँ हम उस मोल्ड तो तोड़ रहे हैं। यहाँ हम वाकई दोस्त हैं। फ़रहान और राकेश सर जी आर्टिस्ट ज़माने के साथ चलने वाले लोगों में से हैं।फ़रहान की डेडीकेशन का अंदाज़ा आप इस बात से लगाइए कि जब मैं सेट पर पहुँचता था तो पता लगता था कि फ़रहान पिछले छः घंटे से रिहर्सल कर रहे हैं। आप फिल्म देखना, इंशाल्लाह आप ख़ुद बताना कि हमने वो पुराना ढर्रा तोड़ा है कि नहीं।

ज़रूर देखूंगा हुसैन, मैं आपसे एक बात और पूछना चाहता हूँ कि हमारे देश में बॉक्सिंग उतना कॉमन और पोपुलर स्पोर्ट्स नहीं है। वहीँ वेस्ट में बॉक्सिंग बहुत प्रचलित है। हॉलीवुड की ही एक फिल्म साउथपॉ से तूफ़ान का ट्रेलर काफी मिलता जुलता लगता है। तो क्या ये सिर्फ इत्तेफाक है?

सर मैं आपको कोई भी फिल्म दिखाऊं जिसमें अकबर बादशाह हैं तो आप कहेंगे कि वो मुग़ल-ए-आज़म है।इस फिल्म का कोई कनेक्शन नहीं है साउथपॉ से, आप देखकर जानेंगे कि ये फिल्म बिल्कुल फ्रेश कांसेप्ट है। फिर आपने कहा कि भारत में बॉक्सिंग कॉमन नहीं है, पर अंडरडॉग होना तो कॉमन है न? यहाँ एक आम आदमी से तो लोग कनेक्ट हो सकते हैं। ये फिल्म बॉक्सिंग के साथ साथ इमोशंस की कहानी है। एक आम आदमी, एक आदमी के आम ख्वाबों की कहानी इस फिल्म में बॉक्सिंग से भी बड़ी है। बॉक्सिंग बस एक माध्यम है।

परेश रावल के साथ काम करना कैसा रहा? 

परेश जी के साथ मेरा एक सीन है, मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ। मेरी उनकी बहुत बनती है। हम लंच संग करते हैं। उनसे सीखने को बहुत कुछ मिलता है। वो बहुत डिटेल्ड आर्टिस्ट हैं। एक छोटी सी बात, कोई छोटा सा डायलॉग, वो ऐसे मौके पर मार देते हैं और संग-संग मदद भी बहुत करते हैं। बड़े आदमी हैं, कोई छोटी सी ग़लती हो जाए तो गाइड करते हैं। बहुत बहुत बढ़िया रहा उनके साथ एक सीन शेयर करना।

फ़रहान अख्तर अपने सेन्स ऑफ ह्यूमर के लिए खासे जाने जाते हैं, क्या इस सीरियस फिल्म में भी ये देखने को मिलेगा?

अरे बिलकुल, हमने बहुत बहुत मस्ती की है। फरहान की ह्यूमर पर पकड़ बहुत अच्छी है। आपको बहुत मज़ा आयेगा ये सीन्स देखकर।

क्या बात है हुसैन मैं ये फिल्म ज़रूर देखूंगा, पर आप बताइयें क्या आपने मायापुरी मैगज़ीन पहले पढ़ी है? अपनी मायापुरी से जुड़ी यादें शेयर करना चाहेंगे?

जी बिलकुल मैंने पढ़ी है। पहले मैं पढ़ता ही था। फिर समय थोड़ा कम मिलने लगा, बाकी मुझे कवर्स तो हमेशा याद रहते हैं। रिसेंटली आपका लगान वाला कवर बहुत अच्छा था।

हमें समय देने के लिए शुक्रिया हुसैन, मैं आशा करता हूँ कि आपकी फिल्म तूफ़ान बहुत बड़ी हिट साबित हो


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