मुझे आपकी यहां चाहत लेके आई हैं…- उदित नारायण

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उदित से बातें शुरू की इससे पहले फिल्म ‘शौहरत’ में उनके गाये गीत का उल्लेख करना चाहूंगा योगेश लिखित इस गाने की पंक्तियां लाजवाब हैं-

‘मुझे आपकी यहां चाहत ले के आई है,
सच मानिए मेरी बातों में सच्चाई है
मैंने आपसे शौहरत की मंजिल पाई है
अब मैं कहां जाऊंगा, जब तक कहें गाऊंगा…

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सच कहें तो उदित की पूरी ज़िन्दगी के संगीतमय सफर का सार इन पंक्तियों में छिपा है। संगीत के प्रति बेपनाह चाहत की विरासत उन्हें अपनी माता सुश्री भुवनेश्वरी देवी से मिली जो घर में बड़े ही ललित स्वरों जयदेव रचित ‘गीत गोविंदम’ (संस्कृत की पदावलियां) और सस्वर रामचरित मानस पाठ करती थी। उदित कहते हैं- ‘मैं मातृभक्त हूं, और संगीत की विरासत मुझे उन्हीं से मिली है।’ मैं बचपन से ही गाता रहा हूं- बचपन से ही।

‘मैं एक किसान का बेटा हूं। मेरे पिता का नाम स्व. श्री हरे कृष्ण झा है। बिहार नेपाल के मिथिला जनपद में एक गांव है भारदह। यही मेरा पैतृक गांव है। मेरी परवरिश ननिहाल में हुई है। मेरे मामा स्व. ढक्कन मिश्र थे। कहते हैं गंगा नदी की बहन कोसी नदी हैं। कोसी की बाढ़ में हमारे परिवार ने सब कुछ खो दिया। मेरी बहन स्व.इंदिरा मिश्रा बिहार के डगमारा गांव की रहने वाली थीं। यहीं रहकर मैंने मिडिल स्कूल पास किया- तब सातवीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा ली जाती थी। यहीं कुनौली बाजार से मैंने मैट्रिक पास की।
गांव के घरों में गाते-गाते फिर गांव के मेले में भी गाया करता था। मैं यूं मूल रूप से उस जगह से ताल्लुक रखता हूँ जहां चार सीमाओं का सम्मिलन होता है- बिहार-नेपाल की दूरी यहां से कुछ कदमों के फासले पर है।

सामने गोरखपुर – सिलीगुड़ी की सीमा रेखा है। पश्चिम बंगाल के करीब होते हुए भी मुझमें मिथिलांचल के संस्कार हैं- यहीं अयोध्या से बारात लेकर राम मिथिला आये थे जहां उनका विवाह जनक नंदिनी सीता से हुआ था। रामायण में धनुष यज्ञ की कथा से सभी परिचित हैं।

अपने जीवन सफर में इस दौर में मुझे आगे का रास्ता सूझ नहीं रहा था। इसी बीच एक घटना घटित हुईं। हुआ यूं कि नेपाल के मुखिया की लड़की की शादी थी- मुझे बताया गया कि इस विवाह मं बड़े-बड़े लोग आयेंगे और इस विवाह में गाने से मेरा भाग्य उदय हो सकता है। बड़े-बड़े शास्त्रीय गायकों से इजाजत लेकर मैंने यहां गाया। यहां मंत्री श्री चर्तुभुज प्रसाद जी उपस्थित थे।

चर्तुभुज मेरी गायिकी से प्रभावित हुए थे। उन्होंने मुझे जानकारी दी काठमांडु के राजा वीरेन्द्र विक्रम सिंह जी के जन्मदिन पर गायकी का एक भव्य कार्यक्रम होता है- हम लोग तुम्हारे मैथिली लोकगीत गाने की सिफारिश कर सकते हैं। स्व.जगदीश झा की पत्नी ने मुझे वहां जाने के लिए एक सौ रूपये दियें मैंने वहां जो मैथिली गाना गाया उसके बोल थे- सुन सुन पैन भरनी (पानी भरने वाली स्त्रियां) कनी धुरियो के ताक (जरा मेरी तरफ भी एक नजर देखो तो…) इस गाने का असर यह हुआ कि रेडिया नेपाल में मुझे एक सौ रूपये प्रतिमाह की नौकरी मिल गई। मुझे यहां मैथिली गीत प्रस्तुत करने होते थे।

लेकिन इतने कम पैसे में मैं काठमांडु में गुजारा कैसे करूं? इसका रास्ता यह निकाला कि रात में यहां के पंच सितारा होटलों में गाता, जिससे मुझे डेढ़ – दो सौ रूपये मिल जाते थे। दिन में रेडियो की नौकरी रात में होटलों में गाना और नाइट काॅलेज में पढ़ाई की। ये दिन बड़े ही जद्दोजहद के थे इंटरमीडियट पास करने के बाद नेपाल के भारतीय दूतावास में मित्रों के सहयोग से नववर्ष, दशहरा – दिवाली जैसे पर्वों पर गाने लगा था। इन अधिकारियों से मैंने अपने मन की बात कही- ‘मैं बंबई जाकर शास्त्रीय गायन सीखना चाहता हूं।’ और संभवतः भाग्य को मुझ पर तरस आ गया था और मुझे बंबई आने का अवसर इस रूप में मिला कि मुझे संगीत सीखने के लिए दो सौ रूपये की छात्रवृति मिलने लगी। ‘फिर इतने कम पैसों में बंबई में रहना-खाने पीने की अव्यवस्था सामने खड़ी थी।

लेकिन ‘नो रिस्क -नो गेन की तर्ज पर जुलाई-अगस्त में सन् 1978 में बंबई आ गया। घोर बरसात – लेकिन मेरा हौसला बुलंद था। किंतु पार्श्व गायक के रूप एक मुक्कमल पहचान बनाने के लिए मुझे पूरे दस साल खर्च करने पड़े। पहली बार मुझे 1980 में फिल्म ‘उन्नीस बीस’ (स्वरूप कुमार निर्देशित फिल्म) में गायकी की दुनिया के बेताज बादशाह स्व. मो. रफी साहब के साथ फेमस स्टूडियो ताड़देव में गाने का अवसर मिला। एक सप्ताह बाद ही पंचम दा ने (स्व.आर.डी. बर्मन) रफी साहब और आशा जी के साथ फिल्म ‘गहरा जख्म’ के लिए मुझे गाने का मौका दिया। रिकाॅर्डिंग फिल्म सेंटर में हुई थी। फिर मैंने वी. शांताराम जी की फिल्म ‘झंझार’ के लिए भी गाया।

स्व. प्रकाश मेहरा जी की फिल्म ‘घुंघरु’ में गाने साथ राजश्री प्रो. की ‘सुन मेरी लैला’ में भी प्लेबैक किया। संगीतकार राम लक्ष्मण थे। शीघ्र ही राजेश रोशन के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘सन्नाटा’ में गाने का अवसर मिला।

मुझे लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल और बप्पी दा ने भी गाने का मौका दिया। इस तरह लोग मेरे बारे में यह जानने लगे कि कोई उदित नारायण नामक नया सिंगर भी आया है। और तब एक लंबे संगीत-सफर का वह स्वर्णिम अवसर मैंने पाया- जब फिल्म ‘क्यामत से कयामत तक’ रिलीज़ हुई। मंसूर खान निर्देशित नासिर हुसैन के बैनर में बनने वाली यह फिल्म सुपरहिट हुई। आमिर खान – जुही चावला की रोमांटिक जोड़ी थी। इस फिल्म के गीत लिखे थे मजरुह सुल्तान पुरी ने। इस तरह ’ 78 से ’ 88 तक के मेरे संगीत सफर ने मुझे एक पहचान दी- लेकिन इसके लिए दस साल लगे थे।

अब ईश्वर का आशीर्वाद है और मैंने दुनिया की 35 भाषाओं में 18 से 20 हजार गाने गाये हैं। मुझे पांच बार फिल्म फेयर का अवाॅर्ड मिला – तीन बार नेशनल अवाॅर्ड और तीन एम टीवी अवाॅर्ड। आइफा अवाॅर्ड के बाद मुझे भारत सरकार ने पद्मश्री का सम्मान दिया- मैंने पूरी दुनिया में लगभग नौ हजार शोज किये हैं।

अभी लगता है मुझे और सीखना है- संगीत सागर प्रशांत महासागर की तरह गहरा है- यह सब मुझे चाहने वालों की दुआएं हैं- फिर बातें करूंगा। किंतु आखरी बात अब मैं कहां जाऊंगा जब तक कहें गाऊंगा…

जिन फिल्मों में उदित नारायण झा ने गाने गाये हैं उनमें कुछ प्रमुख फिल्में हैं- ‘कयामत से कयामत तक’, ‘दिल’, ‘डर’, ‘कुछ कुछ होता है’, ‘दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ इत्यादि…इत्यादि और अभी हाल की प्रदर्शित वे फिल्में जिनमें उदित ने पाश्र्व गायन किया है वे हैं, हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया, किल दिल, एंटरटेनमेंट तथा स्टूडेंट आॅफ द इयर।

 

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Mayapuri