आदित्य चोपड़ा जैसे इंसान-जो इस इंडस्ट्री में बहुत कम मिलते हैं 

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अली पीटर जॉन

वो यश चोपड़ा के बेटे थे जिन्होंने  अपने पिता के नाम का फायदा कभी नहीं उठाया. वो स्कूल – कॉलेज के दिनों से ही बहुत ही अलग किस्म के लड़के थे.  आदित्य और  उनके भाई उदय के पास बंगला है जो उनके पिता द्वारा बनाया गया था जिसका नाम है ‘आदित्योदय’. इतने बड़े परिवार से आने के बावजूद उन्हें मुंबई की सड़कों पर बिना किसी से बात किए एक सामान्य सी बैग को कंधे पर टांगे घूमना ज्यादा पसंद है.

अपनी पढ़ाई से ज्यादा उन्हें फिल्में देखने का शौक था. उन्होंने खुद के लिए एक नियम बना लिया कि वो हर शुक्रवार को रिलीज होने वाली नई फिल्म ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ में देखेंगे,फिर फर्क नहीं पड़ता कि फिल्म किस प्रकार की है,उसमें कौन से अभिनेता और अभिनेत्री हैं या फिल्म किस भाषा में है.  आदित्य जहाँ कहीं भी रहते थे हर शुक्रवार फिल्म जरूर जाकर देखते थे और सभी फिल्में अकेले ही देखते थे. फिल्मों के प्रति इस प्रकार का जुनून देखकर उनके पिता यश चोपड़ा ने उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने से कभी नहीं रोका.

उन्होंने कुछ ही समय में यह निर्णय लिया कि वह अपने पिता को उनके कामों में एसिस्ट करेंगे.वो हमेशा अपने पिता  से कहते थे कि वो किसी फिल्म को लेकर क्या सोचते और महसूस करते है चाहे वो उनके पिता की बहुत अच्छी और बड़ी फिल्म ही क्यों ना हो.

बहुत सालों तक अपनी सिनेमा बनाने की प्रतिभा को तराशने के बाद उन्होंने अपने पिता से कहा कि वो एक फिल्म को निर्देशित करने के लिए तैयार हो चुके हैं.उनके पिता ने उन्हें पूरी आजादी दी कि वह अपनी पहली फिल्म को जिस प्रकार से चाहे बना सकते हैं और इसका परिणाम आया ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ जो 25 सालों बाद भी मुंबई के मराठा मंदिर में सफलतापूर्वक चल रही है.

इस फिल्म  की सफलता के बाद उनके पिता ने स्वीकार किया कि उन्हें अपने पुत्र पर गर्व है और अब वो निश्चिंत हो सकते हैं  क्योंकि ,यशराज फिल्मस अब एक सुरक्षित और मजबूत हाथों में है.

फिल्म बनाने के दौरान आदित्य ने कभी ना साक्षात्कार दिया ना ही कभी प्रेस वालों को सेट पर आमंत्रित किया.

आदित्य अपने  पिता से उनके विकास पार्क में अवस्थित ऑफिस में मिले और उन्होंने कहा कि उनकी फिल्म ने करोड़ों की कमाई की है तब उनके पिता ने यह स्वीकार किया कि उनकी सभी फिल्मों को भी मिला दिया जाए तो इतने पैसे नहीं होंगे जितना उनके बेटे की एक फिल्म ने कमा लिया है. फिर आदित्य ने  ‘मोहब्बतें’ बनाई जो अमिताभ बच्चन कि बॉलीवुड में कमबैक फिल्म  के तौर पर माना जाता है, जिसमें पहली बार अमिताभ बच्चन और  शाहरुख खान  साथ दिखे थे. इस फिल्म ने डीडीलजे के इतनी  कमाई नहीं की थी.

उन्होंने दूसरा सरप्राइज अपने पिता को तब दिया जब उन्होंने यशराज  स्टूडियो बनाने की बात अपने पिता से की. इसे स्टूडियो के बनने के दौरान ही उन्होंने स्टूडियो की डिजाइनिंग कर रही आर्किटेक्ट पायल से चुपके से शादी कर ली थी. इस ऑफिस को उनके पिता को ध्यान में रखकर ही बनाया गया थ, जहां नीचे उनके  टहलने के लिए जगह बनाई गई थी.

आदित्य एक प्रमुख फिल्म मेकर होने के बावजूद हमेशा ये कोशिश करते थे  कि वो अपने पिता के हर फिल्म में उनको असिस्ट कर सकें और पिता की फिल्मों के मुहूर्त और प्रीमियर्स में उनकी मदद कर सके. वो कभी भी लोगों के सामने नहीं आते हैं, डीडीएलजे की प्रीमियर में भी  वो मौजुद नहीं थे और ना ही उनको आज तक यशराज बैनर के तले बनी किसी भी फिल्म के प्रीमियर में देखा गया है. स्टूडियो में उनका खुद का भी ऑफिस है जहां वह बड़ी शांति के साथ जाते हैं और साथ में कोई असिस्टेंट नहीं होता है. बहुत ऐसे लोग हैं जो जानना चाहते हैं कि उनका दिमाग इस तरीके से कैसे काम करता है पर ना ही उनके पिता और ना ही कोई और इस रहस्य को जान पाया  है.

कोई एक चीज जिससे वो बचते है वो है  इस फिल्मी दुनिया की चमक-धमक. मैं यश चोपड़ा के निवेदन पर  यशराज फिल्म्स के 25 साल पूरे होने पर एक स्क्रिनिंग का संचालन कर रहा था. मैंने उनके पिता से कहा कि मुझे आदित्य का एक इंटरव्यू लेना है पर उनके पिता ने कहा कि आप मुझसे कुछ भी करने को कह दें सकते हैं पर ये काम मैं नहीं कर पाऊंगा. मैं यह लेख भी उन पर अपने अवलोकन  के हिसाब से लिख रहा हूं या उनके पिता ने जो मुझे बहुत समय पहले उनके बारे में बताया था उसके आधार पर लिख रहा हूं.

वो ‘वन मैन शो’ है जिसने रानी मुखर्जी से शादी भी इटली में की जहां कोई भीड़ ना हो.

ऐसे इंसान को एक  विशेष पुरस्कार मिलना चाहिए क्योंकि आदित्य इस इंडस्ट्री में रहने के बावजूद भी पब्लिसिटी और फिल्मी चकाचौंध से दूर ही रहना पसंद करते हैं.

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Mayapuri