मूवी रिव्यू: फिल्म‘ बेयरफुट टू गोवा’ अपनों से दूर भागते लोग

1 min


इन्सान का अपने बुर्जुगों के प्रति गैर जिम्मेदराना व्यावहार उसकी बढ़ती आवश्कताओं और रहने की समस्या को लेकर सिकुड़ती सोच को लेकर निर्देशक ‘प्रवीण मोरच्छाले की फिल्म ‘ बेयरफुट टू गोवा’में बर्जुगों को अपनों से दूर रहने को एक सवाल के तौर पर दिखाने की अच्छी कोशिश की है ।

14jul_Barefoot-to-Goa-04
अम्मा(फारूख़ जफर’) गोवा में पंजिम के एक गांव में अकेली रहती है । उसका इकलौता बेटा (कुलदीप दूबे)अपने परिवार के साथ मुबंई रहता है । अम्मा अपने बेटे और पोते पोती से मिलने के लिये तरसती रहती है । लिहाजा वह बार बार बेटे को पत्र लिखती रहती है और अपने पोते पाती के लिये लड्डू और भवंरा जरूर कूरियर करती है । लेकिन बेटे की पत्नि(पूर्वा पराग) अम्मी की चिट्ठियां बेटे तक नहीं पहुंचने देती । एक दिन उनमें से एक चिटठी बच्चों के हाथ लग जाती है । उससे पता चलता है कि उनकी दादी बीमार है । पहले तो वे तय करते हैं कि मम्मी से छुपाकर पापा को सब बता दिया जाये । लेकिन पापा दो सप्ताह के लिये बाहर है, इसलिये वे स्वंय दादी को मुबंई लाकर उनका इलाज करवाने के लिये गोवा की तरफ मां को बिना बताये घर से निकल पड़ते हैं। लेकिन सो तकलीफें उठाकर जब वे अम्मा के घर तक पहुंचते हैं थ्र भी वे दादी से नहीं मिल पाते ।

maxresdefault

बेशक षहरों में जरूरत से ज्यादा आवश्कताओं के तहत अपनों के प्रति सिकुड़ती सोच को लेकर लोगों ने अपने बुर्जुगों को अपने से दूर कर दिया है । ऐसी ही स्थिति का शिकार एक मां अपने बेटे और अपने पोते पोती से मिलने की आस में अकेली रहने के लिये मजबूर है ।उसकी इनके लिये तड़प तब और बढ़़ जाती है जब उसकी चिट्टियों का कोई जवाब नहीं मिलता । बिलकुल ऐसा ही हाल मुबंई में उसके बेटे के बच्चों का है। क्योंकि जब से उन्हें अपनी दादी के बीमार होने का पता चलता है, उसके बाद वे भी अपनी दादी से मिलना चाहते हैं । लेकिन अंत तक नहीं मिल पाते । निर्देशक से ये शिकायत है कि क्या फिल्मों का दुखद अंत फिल्म को ज्यादा प्रभावशाली बना देता है ?

Barefoot-To-Goa-002

अगर बच्चों का उनकी दादी से मिलना हो जाता तो क्या सुखद क्लाईमेक्स लोगों को पंसद नहीं आता ? प्रवीण जैसे निर्देशकों की ये विचारधारा पता नहीं क्यों होती है कि वे कुछ दुखद दिखायेगें तो दर्शक ज्यादा इंप्रेस होगा । अगर फिल्म की बात की जाये तो फिल्म की कहानी पर ही सब का ध्यान रहता है किरदार जो कहानी कहते हैं उन पर नहीं। फिर भी कुलदीप दूबे, पूर्वा पराग के हिस्से में जितना भी काम आया उन्होंने उसे सहजता से निभाया । बच्चे काफी मासूम लगे लेकिन फारूख जफर की बात की जाये तो उन्होंने बिना एक भी संवाद बोले सिर्फ भावों से प्रभावषाली अभिनय कर बच्चों और बेटे के लिये तरसती एक मां और दादी को सजीव कर दिखाया है, लेकिन समझ नहीं आया कि उन्हें फिल्म में मूक क्यों बनाये रखा । फिल्म की सबसे बड़ी खामी कि जो वो कहना चाहती है सरलता से नहीं कहती । इसलिये फिल्म को खास वर्ग देखें तो देखें ।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये