फिल्म जगत की जानी पहचानी महिलायें

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मायापुरी अंक 46,1975

एक जमाना था जब महिलाऐं फिल्मों में काम करने से कतराती थीं। पर्दे पर दर्शको के समक्ष नाच-गाने करना उन्हें कतई पसंद नहीं था। उस जमाने में महिलाओं का फिल्मों में अभिनय करना बुरा समझा जाता था। इसी कारण फिल्म-पितामाह दादा साहब फाल्के को अपनी प्रथम मूक फिल्म ‘राजा हरिशचन्द्र’ में स्वयं को तारामती की भूमिका निभानी पड़ी बाद में भी दादा साहब फाल्के की कई फिल्मों में महिलाओं की वास्तविकता लाने के लिए वेश्याओं ने भी अनुरोध किया पर वेश्याओं ने भी फिल्मों में काम करने से इंकार कर दिया। इसी कारण तब माधुरी, कज्जन, सविता देवी, गौहर जैसी रूपवाम महिलाऐं भी फिल्मों में प्रवेश कर गईं। महिलाओं का फिल्मों में अभिनय करने से दर्शक फिल्मों में जाने लगे। यदि देखा जाये तो उस काल में फिल्मों की सफलता का रहस्य हो अभिनेत्रियां होती थी क्योंकि फिल्मों का प्रचार ही कुछ इस प्रकार होता था जैसे सरस्वती सिनेटोन की फिल्म ‘श्याम सुन्दर’ में शान्ता आप्टे को देखिये मदन थियेटर की फिल्म ‘हटीली दुल्हन’ में मिस मुख्तार बेगम अपना अभिनय कौशल बिखेर रही हैं। विज्ञापन पढ़कर दर्शक गण भी नसीम बानो, सविता देवी, माधुरी तथा कज्जन को देखते जाते।

मूक युग में सुलोचना ने फिल्मों में प्रवेश करके तहलका मचा दिया। क्योंकि उस काल में सुलोचना जितनी रूपवती कोई अन्य अभिनेत्री नहीं थी। उस काल में सुलोचना का फिल्मों में कार्य करना साहसिक कदम था। जब तक सुलोचना फिल्मों में रही, जमाने को पल्लू से बांधे रखा फिल्म जगत में सर्वप्रथम बंगले और कार का सुख देखने वाली भी सुलोचना ही रही। इसी कारण गत वर्ष भारत सरकार की ओर से इन्हें ‘दादा साहब फाल्के’ पुस्कार’ द्वारा सम्मानित सवाक् युग की प्रथम अग्रणी महिला ‘देविका रानी’ रही है निर्माता-निर्देशक हिमांशु राय के सहयोग से मशहूर फिल्म निर्माण संस्था बॉम्बे टॉकीज की स्थापना की। सदाबहार अभिनेता अशोक कुमार, उत्कृष्ट अभिनेत्री लीना चिटनिस, महिला संगीतकार सस्वती देवी, गायक मन्नाडे तथा अभिनय सम्राट दिलीप कुमार बॉम्बे टॉकीज की ही देन है। देविका रानी रूपवती होने के साथ ही प्रतिभाशाली हीरोइन थी। अशोक कुमार के साथ ‘जीवन नैया’ अछुत कन्या, वचन सावित्री आदि उनकी अविस्मरणीय फिल्में हैं। इस संस्था की ‘किस्मत’ भी ऐसी ही फिल्म है। इस संस्था ने 37 अद्धितीय फिल्में दी हैं। बॉम्बे टॉकीज की फिल्मों के गीत घर घर में दिवाली… (किस्मत) आयेगा आयेगा, आने वाला.. (महल), ऊपर गगन विशाल..(मशाल) आज भी श्रोताओं को मुग्ध कर देते हैं। बॉम्बे टॉकीज जैसी विशाल फिल्म निर्माण पर्दे पर सर्वप्रथम नग्नता दर्शाने का साहसिक कार्य मूक युग में सकीना बाईं ने तथा सवाक् युग में मेहताब ने कर दिखाया। मेहताब मिनर्वा यूवीटोन के संस्थापक सोहराब मोदी से विवाह रचाकर फिल्मों से अलग हो गई। आगे चलकर वैजयन्तीमाला, पद्मनी, राधा सलूजा, रेहाना सुल्तान, सीमा कपूर तथा फरियाल विभिन्न कोणों द्वारा नग्नता दर्शाती रही। यह सिलसिला जारी है।

ऐसे माहौल में लखनऊ की शास्त्रीय संगीत की गहरी पैठ वाली सरस्वती देवी महिला संगीतकार ने फिल्म जगत में पदार्पण करके बॉम्बे टॉकीज की फिल्मों द्वारा सिने जगत में धूम मचा दी। ‘कंगन’ ’बंधन’ तथा ’झूला’ के गीत चारों और गूंज उठे। फिल्म ‘अछूत’ कन्या में सरस्वती देवी ने छ: रागों का प्रयोग किया। इस फिल्म का अशोक कुमार और देविका रानी की आवाज में एक गीत मैं बन के चिड़िया डोलू रे.. आज भी श्रोताओं को दिवाना बना देता है। फिल्म ‘बंधन’ का गीत अशोक कुमार और लीला चिटनिस की आवाज में चल चल रे नौजवान…हमेशा जवां गीत बनकर रह गया। बॉम्बे टॉकीड की सर्वाधिक फिल्मों (18 फिल्मों) में सरस्वती देवी ने ही अपना मधुर संगीत दिया है। सिने जगत के संगीत क्षेत्र में सरस्वती देवी ही अग्रणीय महिला संगीतकार का श्रेय भी सरस्वती देवी को ही जाता है। सरस्वाती देवी सन 1935 से 1941 तक फिल्मों में रहीं। बाद में जद्दनबाई, ऊषा खन्ना, तथा शारदा महिला संगीतकार के रूप में आयी।

वही उस काल में सुप्रसिद्ध अभिनेत्री नर्गिस की मां जद्दनबाई संगीतकार के साथ निर्देशिका भी रही। ‘ह्रदय मंथन’ ’मेडम फैशन’ तथा ’मोती का हार’ जैस मशहूर फिल्में जद्दनबाई के मधुर संगीत व श्रेष्ट निर्देशन के कारण सदैव याद की जायेंगी। जद्दनबाई के पश्चात शारदा, ऊषा खन्ना जैसी हस्तियां भी फिल्मोद्योग में आयी पर ये केवल संगीत-निर्देशिका ही थी। जद्दनबाई की भांति फिल्म निर्देशिका नहीं निर्देशिका के रूप में साधना ने भी काफी साहसिक कार्य कर दिखाया। पर साधना निर्देशिका के साथ संगीत कार नहीं है। संगीत के साथ-साथ फिल्म निर्देशिका का श्रेय केवल जद्दनबाई को ही जाता है। वास्तव में जद्दनबाई महिला के रूप में अग्रणीय रही।

लता मंगेशकर फिल्म जगत को अमूल्य निधि हैं। अपने मधुर स्वर नियंत्रण के कारण लता को अनेकों अवार्ड प्राप्त हो सकते हैं। पर लता ने अन्य उभरती हुई प्रतिभाओं को प्रकाश में लाने हेतु स्वंय ही अवार्ड लेने से इंकार कर दिया। एक ओर जहां गायक चांदी फेंक कर अवार्ड प्राप्त करने हेतु लगे रहते हैं। वहां लता अन्य कलाकारों को प्रोत्साहित करने हेतु अवार्डों को सदैव के लिए ठुकरा दिया है। लता को इस अपूर्व कुर्बानी ने उनकी प्रतिष्ठा में और भी चांद लग दिया है। विभिन्न प्रतिभाओं की प्रोत्सहित करने तथा उन्हें मार्केट में लाने में लता अग्रणीय रही हैं। भारतीय फिल्म जगत में बीसों ऐसी महान हस्तियां हैं जो लता द्वारा लायी गयी हैं। यदि लता की कोशिश नहीं होती तो शायद आज संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को कोई नही जानता। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को स्वतंत्र रूप से संगीतकार बनाने वाली लता मंगेशकर ही हैं।


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Mayapuri

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