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अपने परिवार की जिम्मेदारी तो संभलती नहीं, देश को संभालना तो और भी कठिन है!

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By Mayapuri Desk
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अपने परिवार की जिम्मेदारी तो संभलती नहीं, देश को संभालना तो और भी कठिन है!

अपने परिवार की जिम्मेदारी तो संभलती नहीं, फिर ऐसे में देश को संभालना तो और भी कठिन है - धमेंन्द्र

-जैड. ए. जौहर

उस दिन धर्मेन्द्र का जन्मदिन था। अन्य फिल्म स्टारों की तरह धर्मेन्द्र उस दिन सिवाय पूजा पाठ आदि के कोई शो बाजी नहीं करता। हमें उसके गेट कीपर रामानंद तिवारी से पता चला कि धर्मेन्द्र अभी तक घर में ही है। हम अन्दर पहुँचे तो नीचे ही धर्मेन्द्र से मुलाकात हो गई। हमने बधाई देकर फोटो खींचने की इच्छा व्यक्त की तो धर्मेन्द्र ने कहाः-

“फोटो लेकर क्‍या करेंगे? मैं यह सब दुनिया वालों के लिए नहीं करता।” आप बाद में आईये दो तीन लेख तैयार करेंगे।
इतना कहकर धर्मेन्द्र ऊपर चला गया जहाँ से हिजड़ों के नाचने गाने की आवाजें आ रही थीं। हम कुँवर अजीत के साथ नीचे ही आफिस रूम में बैठ गए। थोड़ी देर बाद ही धर्मेन्द्र की ओर से हमें बुलाया गया। हम छायाकार सुरेश को लेकर ऊपर धर्मेन्द्र के रूम में पहुँच गए तो धर्मेन्द्र ने कहा “लीजिए अब आप भी अपना शौक पूरा कर लीजिए'

धर्मेन्द्र, ने हार पहनकर फोटो खिचवाये और फिर साथ आकर बैठ गया।

 क्या आप वोट देते है?

पहले तो नहीं दिया किन्तु इस बार जरूर दूँगा।अपने परिवार की जिम्मेदारी तो संभलती नहीं, देश को संभालना तो और भी कठिन है!

 उसकी कोई खास वजह है?

खास वजह यही है कि इस बार सुनील दत्त इस क्षेत्र से खड़े हुए हैं। वह फिल्‍म इंडस्ट्री के आदमी है। इसलिए उनका जीतना जरूरी है।

 फिल्म इंडस्ट्री के-दो और भीं कलाकार चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी जीत से देश की सियासत पर कुछ असर पड़ेगा?

अपने परिवार की जिम्मेदारी तो संभलती नहीं, देश को संभालना तो और भी कठिन है!परिवर्तन तो जरूर आएगा। किन्तु यह सब उनके अपने कार्य पर निर्भर करता है। इतना जरूर है कि यह लोग क्रप्ट नहीं हैं। बड़े साफ क्लीन लोग हैं। उन्हें किसी प्रकार का लालच नहीं है। वह लोग सच्चे दिल से देश की सेवा करना चाहते हैं। धर्मेन्द्र ने कहा। इस वक्‍त देश को सच्चे और ईमानदार नेताओं की जरूरत है। इस कमी को यह लोग ही पूरा कर सकते हैं।

 क्या आप भी उनके लिए कन्वेसिंग कर रहे हैं?

अगर मेरी जरूरत पड़ी तो जरूर करूँगा।

 क्या आप इसके लिए इलाहाबाद भी जाएंगे?

इलाहाबाद में अकेले अमिताभ बच्चन से ही भीड़ नहीं संभाली जा रही है। और ऐसे में अगर मैं भी वहाँ पहुँच गया तो जनता को संभांलना और मुश्किल हो जाएगा। फिर अगर मुझे वहाँ बुलाया गया तो जरूर जाऊँगा।

 क्या आपने कभी स्कूल या कॉलेज के जमाने में कभी इलेक्शन लड़ा है?

कभी नहीं।

 उसकी वजह?

मुझे वह सब तमाशा सा लगता था।

 क्या आपको पॉलिटिक्स में रूचि नहीं है?

बिल्कुल नहीं। ’यह हम जैसों का काम नहीं है। मैं बहुत सीधा सादा आदमी हूँ। पॉलिटिक्स के भी अपने दाव पेंच होते हैं। लोग तो इस छोटी सी फिल्‍मी दुनिया में भी पॉलिटिक्स कर जाते हैं। मगर मैंने यहाँ भी कभी पॉलिटिक्स नहीं बरती। वर्ना लोग अपने हित के लिए ना मालूम क्या क्‍या कर जाते हैं।

 अगर फिल्‍म इंडस्ट्री के तीनों कलाकार जीत जाते हैं तो क्‍या आप भी भविष्य में इलेक्शन में खड़ा होना पसन्द करेंगे?

यह तो समय पर निर्भर करता है किन्तु सियासत के लिए बहुत बड़े कलेजे की जरूरत होती है। यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। जिसे संभालना हर एक के बस की बात नहीं है। लोगों से अपने छोटे से परिवार की जिम्मेदारी नहीं संभलती। ऐसे में पूरे देश को संभालना और भी कठिन काम है।

 पिछले दिनों दिल्‍ली आदि जगहों पर इन्दिरा गाँधी की हत्या के पश्चात जो झगड़े हुए हैं। उसके बारे में आपके क्या विचार हैं?

जो कुछ हुआ उससे यकीनन इंसानियत का सर शर्म से झुक गया है। कोई मजहब बैर रखना नहीं सिखाता। इस तरह की बातों से दुश्मनों में हमारी जग हँसाई हुई है। भाई चारे की-सारी बातों पर पानी फिर गया है। इस विषय को न ही कुरेदें तो अच्छा है। इस बारे में सोचकर सिवाये दुख के और कुछ नहीं मिलता।

 रेगन. एन.टी. रामांराव, एम.जी. राम चन्द्रन जैसे कलाकारों ने सिद्ध कर दिया है कि फिल्म स्टार भी अच्छे और सफल शासक और पॉलिटिक्स सिद्ध हो सकते हैं। फिर आप पॉलिटिक्स से क्‍यों दूर रहना चाहते हैं ? हमने पूछा।

देश सेवा के लिए जरूरी नहीं है कि मंत्री ही बना जाए। यह सेवा बिना कुर्सी प्राप्त किए हुए भी की जा सकती है। बस दिल में देश के लिए प्रेम होना बहुत जरूरी है।

 साउथ कलाकार फिल्‍म और राजनीति दोनों में बड़े सफल रहे हैं। यह बात हमारे कलाकारों में क्‍यों नहीं है?

उसकी वजह आप भी अच्छी तरह जानते हैं। मुझ से क्‍यों मालूम करना चाहते हैं।

 क्या आप समझते हैं कि हमारे कलाकार अच्छे नेता सिद्ध हो सकते हैं? क्योंकि ऐशो आराम की जिन्दगी गुजारने वालों को भला आम आदमी की तकलीफों का कैसे अहसास हो सकता है? उनसे तो आम आदमी मिल भी नहीं सकता।

अपने परिवार की जिम्मेदारी तो संभलती नहीं, देश को संभालना तो और भी कठिन है!आपका यह ख्याल गलत है। इनमें से कोई भी कलाकार ऐसा नहीं है। जिसने जीवन में संघर्ष न किया हो। आम आदमी की समस्याओं को जितना कलाकार आसानी से समझ सकता है कोई नेता नहीं समझ सकता। कलाकार उस पात्र को पर्दे पर पेश करता है अपने अध्ययन और अनुभव के आधार पर। उसका जनता गहरा संबंध होता है। वह आसमान से नहीं टपकता बल्कि जनता का ही आदमी होता है। जहाँ तक जनता से मिलने की बात है तो जनता को उससे मिलने में इतनी परेशानी नहीं होगी जितनी कि नेताओं से मिलने में होती है। इसलिए एक अभिनेता जितना सफल नेता सिद्ध हो सकता है उसका प्रमाण एन.टी. रामाराव और एम.जी. राम चन्द्रन हैं।

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