Birthday Special: यही थी जगदीप के जीवन भर की कमाई, जीवन जीने के दौरान भी और जीवन खत्म होने के बाद भी

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By Sulena Majumdar Arora
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Birthday Special: यही थी जगदीप के जीवन भर की कमाई, जीवन जीने के दौरान भी और जीवन खत्म होने के बाद भी

अपनी कॉमेडी से बॉलीवुड जगत में दीप जलाने वाले जगदीप उस गोल्डन इरा के अंतिम स्तम्भ थे जिसमें आगा, मुकरी, जॉनी वाकर, महमूद, आई एस जौहर, केश्टो मुखर्जी, असित सेन जैसे कॉमेडी किंग्स का राज था. जगदीप के वो पान खाए हुए लाल दाँतों की चैड़ी हंसी, वो हर डायलॉग के साथ 'खंबा उखाड़ के' कहना, वो सूरमेदार आंखों को मटका कर 'मैं हूँ सूरमा भोपाली' कहना, वो चेहरे को तरह तरह की भंगिमाओं में तोड़ मरोड़ के हास्य उत्पन्न करना, सब कुछ अब सिर्फ यादों और पर्दे पर रह गया है.

वे हमेशा कहा करते थे 'मैं हूँ आम आदमी का एक्टर, लोग जो करवाते गए मैंने किया हालांकि हमेशा सिर्फ कॉमेडी रोल करते रहना मुझे पसंद नहीं आता था.' अरुणा ईरानी को आज भी याद है, कि जब वे जगदीप के साथ शूटिंग करते थे, तो दो शॉट्स के बीच के बोरिंग इंटरवल में जगदीप उन्हें अपने जोक्स से हँसा-हँसा कर लोटपोट कर देते थे, लेकिन एक बार बेहद तनाव में जगदीप थोड़ा नशा करके सेट पर आए थे, और इसलिए आते ही माफी मांगने लगे. अरुणा जी ने कहा, 'कोई बात नहीं, ऐसा होता है कभी कभी, टेंशन ना लें' उसके बाद अगली मुलाकात में जगदीप ने अरुणा ईरानी को अपना बेहतरीन दोस्त कहा क्योंकि उन्होंने उनका दर्द समझा था. जगदीप के निधन के आठ महीने पहले भी अरुणा जी अपने उस दोस्त से मिलने गई थी, उस वक्त उन्हें चलने में बेहद दिक्कत थी लेकिन होंठो पर वही चैड़ी मुस्कान बरकरार थी. ये मुस्कान आखिर तक उनके साथ बनी रही भले ही आंखों की चमक धुंधली पड़ गई थी या माथे की झुर्रियां गहरा गई थी, और चेहरे पर उनके पूरे जीवन का इतिहास लिखा हुआ था. 

क्या उनका बचपन कम दुखदायक था कि बैरिस्टर सय्यद यावर हुसैन जाफरी का बेटा होने के बावजूद, पार्टीशन की त्रासदी और पिता की असमय मृत्यु ने उन्हें मुंबई की सड़कों पर पूरे परिवार, माँ कनीज हैदर और बूढ़ी दादी के साथ बिना छत के दर-दर ठोकरें खाने पर मजबूर किया? 

जिस दरी पर सोते उसी को बारिश के वक्त सर पर ताने बैठा रहता पूरा परिवार. सड़क पर कितने चोर उचक्कों ने नन्हे जगदीप (जिनका असली नाम था इश्तियाक अहमद जाफरी) को चन्द सिक्को की लालच देकर अपने दल में शामिल करवाना चाहा पर भद्र परिवार के इस बच्चे ने इंकार करते हुए साबुन, पतंग, अगरबत्ती, कंघी बेचकर दो चार आना कमाना ज्यादा बेहतर समझा. उन्ही दिनों सड़क के ही एक हमउम्र दोस्त ने कहा, कि फिल्म इंडस्ट्री में छोटे-मोटे काम के लिए भी एक रुपया मिलता है. ये सुनकर 9 वर्ष के नन्हे इश्तियाक (उनका जन्म 29 मार्च 1939 को हुआ था) रोज पैदल माहिम से दादर, रंजीत स्टूडियो चलकर वहां काम की तलाश करने लगे. उनका इंतजार सफल हुआ और एक दिन फिल्म 'अफसाना' के लिए जब कुछ बच्चों की जरूरत एक्सट्रा के रूप में पड़ी तो उन्हें मौका मिला ताली बजाने की भूमिका में जिसके लिए तीन रुपये मिलने थे. 

लेकिन किस्मत से जिस लड़के को थोड़ा बड़ा रोल मिला वो उर्दू डायलॉग 'बा अदब बा मुलाहिजा होशियार' नहीं बोल पाया तो वो रोल जगदीप ने मांग लिया और उसे छः रुपये मिल गए. ये फिल्म जगदीप के लिए भी पहली फिल्म थी और बी आर चोपड़ा जी की भी बतौर निर्देशक डेब्यू फिल्म थी. उसके बाद तो बाल कलाकार के रूप में उन्होंने के ए अब्बास जी कृत 'मुन्ना', एवीएम कृत 'हम पंछी एक डाल के', राज कपूर कृत 'अब दिल्ली दूर नहीं' में काम करके शोहरत हासिल करते रहे. 'हम पंछी एक डाल के' में लालू उस्ताद की बेहतरीन रोल करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने उन्हें अपनी छड़ी गिफ्ट कर दी थी जो जगदीप ने जीवन भर सभांल कर रखी थी. रशियन बच्चों ने भी ये फिल्म देखकर उन्हें एक स्कार्फ, अब्बास साहब के हाथों उन्हें रूस से भेजा था. फिर उनके जीवन में बिमल रॉय कृत 'दो बीघा जमीन' ने एक नया मोड़ दिया, कॉमेडी का मोड़. जगदीप ने बताया था कि लोग सोचते हैं कि बतौर काॅमेडियन उन्होंने फिल्म 'ब्रम्हचारी' से शुरू किया था लेकिन 'दो बीघा जमीन' सें ही वो मोड़ आ चुका था. उसके बाद गुरु दत्त कृत 'आर पार' के साथ बाल चरित्रों का सिलसिला चल पड़ा जैसे फिल्म 'आसमान', 'भाई साहब', 'ढांके की मलमल', 'धोबी डॉक्टर', (जिसमें वे यंग किशोर कुमार बने थे). 'शिकवा' वगैरह. इसी तरह काम करते हुए वे जवान हो गए.

जगदीप बताते थे, कि वे एकमात्र ऐसे कलाकार हैं जिसने नौ वर्ष की कच्ची उम्र से बुढापे तक लगातार सत्तर वर्षो तक 400 से अधिक फिल्में की. दुनिया को 70 सालों से हँसाया. उन दिनों जगदीप का ऐसा क्रेज था, कि हर फिल्म में उनका होना जरूरी था चाहे कोई रोल हो या ना हो, फिर भी उनके लिए रोल हर हालत में निकाला ही जाता था. लोग उनका ऑटोग्राफ लेने के लिए, उनसे हाथ मिलाने के लिए हर जगह उन्हें घेर लेते थे. एक फैन ने उन्हें एक पोस्ट कार्ड भेजा जिसमें लिखा था, 'मैं जीना नहीं चाहता था लेकिन जब मालूम पड़ा कि आप कई बार दुखों की पहाड़ झेलकर भी लोगों को हँसाते हो तो मुझे जीने की सीख मिली' जगदीप ने आज के जमाने की भी कई फिल्मों जैसे 'फूल और काँटे', 'अंदाज अपना अपना' (बाँकेलाक भोपाली का कैरेक्टर में मशहूर हुए, ये फिल्म उन्होंने अपने जिगरी दोस्त पी एल सन्तोषी के ऑफर पर किया), 'चाइना गेट', 'लाइफ पार्टनर' और 'गली गली चोर है' में भी काम किया. आज के जमाने के फिल्म मेकर्स में से उन्होंने सिर्फ उन्ही लोगों के साथ काम किया जो उन्हें रेस्पेक्ट देते थे. मॉडर्न जमाने की कॉमेडी उनके गले नहीं उतरती थी, वे कहते थे, 'हमारे जमाने के लेखकों को पता था कि सिर्फ डायलॉग्स से ही कैसे कॉमेडी उत्पन्न की जा सकती है. आज तो शूटिंग के वक्त भी डायलॉग्स तैयार नहीं मिलते हैं, फिर हम कैसे हंसाएं दर्शकों को? मजबूरी में मुँह बना-बना कर, हाव-भाव से ही कॉमेडी करनी पड़ती है' जगदीप ने पाँच फिल्मों में बतौर नायक, 'नंद, 'अजरा', 'अमिता','नाज' के अपोजिट भी काम किया, जिनमें प्रमुख थे 'बरखा','भाभी', 'बिंदिया' 'पुनर्मिलन'. वैसे 'बरखा' उनके दिल के करीब थी. इन फिल्मों में उन्हें बेहद हिट गीत भी लिप सिंक करने को मिले जैसे 'पास बैठो तबीयत बहल जाएगी','इन प्यार की राहों में', 'चल उड़ जा रे पंछी', 'चली चली रे पतंग मेरी चली रे', 'प्यार किया नहीं जाता', 'आ गए यारों जीने के दिन'. 

जगदीप ने विलेन का रोल भी किया था (फिल्म 'एक मासूम', 'मंदिर मस्जिद') और कॉमेडी स्टार की पराकाष्ठा में उन्होंने भूत, प्रेतआत्मा की फिल्में भी बड़े चाव से की थी जैसे 'रामसे ब्रदर्स कृत' 'पुराना मंदिर','थ्री डी सामरी', जगदीप ने कभी पैसों की बर्बादी नहीं की. शुरू-शुरू में जो कमाया उससे भायखला में जे.जे हॉस्पिटल के पास एक झोपड़ी खरीदकर परिवार को छत मुहैया किया, फिर माहिम में एक रूम की खोली खरीदी, फिर दक्षिण भारत के एवीएम फिल्म कम्पनी के साथ जुड़े तो मद्रास में उन्होंने बंगला लिया, लेकिन उनकी अम्मी जी चाहती थी कि वे मुंबई में ही हमेशा रहे, तो उन्होंने मुंबई में बंगला बनाया और पूरे परिवार के साथ खुशी खुशी रहने लगे. लेकिन जब माँ ही चल बसी तो जगदीप को दुनिया सूनी लगने लगी और उनका मन एक दम उचट गया. बंगला बेच, वे फ्लैट में रहने चले गए. फिल्मों से भी काफी समय के लिए उन्होंने नाता तोड़ लिया. लेकिन फिर लौटे तो फिल्म की दुनिया वो पहले वाली दुनिया नहीं थी. लेकिन काम की कमी उन्हें फिर भी कभी नहीं रही, टीवी सीरियल्स में वे काम करने लगे. उनके बेटे जावेद जाफरी, नावेद जाफरी को पता है कि उनके पिता का इस इंडस्ट्री में क्या योगदान है, लेकिन बचपन में उन्होंने स्टार काॅमेडियन के बच्चे होने का कभी अभिमान नहीं किया.

पापा अपने बच्चों से बहुत प्यार करते थे, लेकिन काफी बड़े होने तक उन्हें बस और लोकल ट्रेन में ट्रैवेल करने को कहा, अलग से कार नहीं दी ताकि उन्हें नॉर्मल जिंदगी का एहसास हो सके. पोता मिझान जाफरी ने तो अपने दादाजी जगदीप को दीपावली के पटाखे जैसा कहा था, रोशनी, चमक, तड़क भड़क और ऊर्जा से भरपूर. उन्होंने एक फिल्म 'सूरमा भोपाली' बनाई थी, लेकिन आधी फिल्म बनाने के दौरान उन्हें पता चला कि कोई उनकी फिल्म इसलिए खरीदना नहीं चाहता, क्योंकि उसमें बड़े स्टार नहीं थे, लोगों ने राय दी कि किसी डांसर को भीगे कपड़ों में नचाने का सीन डाल दो लेकिन जगदीप ने ऐसा नहीं किया, उन्होंने अपने नामचीन कलीग्स को गेस्ट के रूप में फिल्म में शामिल होने को कहा तब जाकर फिल्म एक मनोरंजक फिल्म के तौर पर रिलीज हुई. उन्हें इस बात का नाज था कि उन्होंने सिनेमा जगत की दो सर्वश्रेष्ठ और सब से महान फिल्म 'मदर इंडिया' और 'शोले' (सूरमा भोपाली का किरदार) में शानदार रोल किए. उन्होंने बताया था कि रमेश सिप्पी से 'शोले' के लिए मुलाकात के बाद भी किसी कारण वश उन्होंने 'शोले' ना करने का फैसला किया था, लेकिन पत्नी के कहने पर उन्होंने 'शोले' किया जो सिनेमा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया. उन्हें गर्व था, इस बात का कि उन्होंने सुनहरे दौर के बेस्ट फिल्म मेकर्स जैसे के.ए.अब्बास, राज कपूर, ए वी एम, बिमल रॉय, गुरु दत्त, महबूब खान, 'के आसिफ', रमेश सिप्पी के साथ काम किया.

जगदीप ने कहा था, 'ये वो फिल्म मेकर्स थे जो कला और कलाकार को इज्जत देना जानते थे. 'एक घटना उन्हें याद था कि जब एक इमोशनल शॉट बार-बार समझाने पर भी नर्गिस जी सही नहीं कर पा रही थी, तो महबूब खान ने उन्हें एक थप्पड़ लगाया जिससे नर्गिस जी एकदम स्तब्ध हो कर रोने लगी, महबूब खान ने झटपट उनका वो एक्सप्रेशन कैमरे में उतारा और फिर नर्गिस के पैरों में गिर कर माफी भी मांगी कि 'मुझे माफ कर दो मेरी माँ, मुझे सीन के लिए ऐसा ही एक्सप्रेशन चाहिए था'. ऐसे-ऐसे महान फिल्म मेकर्स के साथ काम करने वाले जगदीप को नए जमाने के कई नकचढ़े, झूठी शान के उन्माद में जीने वाले फिल्म मेकर्स से अपमान का भी सामना करना पड़ा तो उन्होंने ऐसे नए जमाने की फिल्मों से किनारा करना ही ठीक समझा और 2012 में अंतिम फिल्म 'गली गली में चोर है' करने के बाद बॉलीवुड से दूर हो गए. उन्हें इस बात का हमेशा मलाल रहा कि बॉलीवुड के कॉमेडियन्स के लिए नेशनल अवाॅर्ड ही नहीं है, तो क्या कॉमेडी किसी अभिनय की श्रेणी में आता ही नही? खबरों के अनुसार वे फिल्म फेयर के लिए चार बार नॉमिनेट भी हुए थे. उन्हें इस बात का गर्व और विश्वास रहा कि उन्हें जनता जनार्दन से जीवन भर, भरपूर प्यार मिलता रहा है और मिलता रहेगा, यही उनके जीवन भर की कमाई थी, जीवन जीने के दौरान भी और जीवन खत्म होने के बाद भी. जगदीप का ये विश्वास शत प्रतिशत सही है. उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट श्ब्प्छज्.. भ्ंसस व् िथ्ंउम अवाॅर्ड, लाइफ टाइम अचीवमेंट आइफा अवाॅर्ड से भी नवाजा गया था.

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