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अपनी फिल्म पत्रकारिता के चार दशक के कैरियर में जितना सरल बातचीत करने का अवसर धर्मेंद्र से मिलता था, शायद ही किसी और सितारे से मिला हो। कुछ ही क्रिटिकल समय आए थे जब वह प्रेस से बातचीत करने में दाएं-बाएं किये थे जैसे- जब वह हेमा जी (हेमा मालिनी) से शादी किए थे या जब वह 'पर डे' वाले दौर में किसी भी निर्माता की फिल्म साइन कर लिया करते थे... और जिसके लिए उनके बेटे सनी और बॉबी उनपर गुस्सा किये थे। वह थोड़ी सी दूरी बरतते देखे गए थे। (Bollywood actor press interaction stories)
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संयोग से मैं दोनों दौर में धरम जी से मिला था। मायापुरी की पत्रकार छाया मेहता की हेमा जी से अच्छी जमती थी। हेमा जी शादी के बाद नटराज स्टूडियो में शूट पर थी। एक अनौपचारिक मुलाकात थी, जब हेमा जी के पास छाया ने कुर्सी खींच लिया और हम भी वहीं बैठ गए। हम कोई बातचीत नहीं किए थे जब धर्मेंद्र वहां आगए थे। धरम जी ने पूछा था- "कैसी चल रही है मायापुरी? एक घरेलू पत्रिका है... कोई गॉसिप मत लिख देना।" और हमें वहां से जाना पड़ गया था। इसीतरह की एक मुलाकात तब हो गयी थी जब चांदीवली स्टूडियो में धर्मेंद्र कांति शाह की शूटिंग पर थे। उनका फिल्म में सिर्फ दो- तीन दिन (पर- डे वाले दौर में) का ही काम था और निर्माता के पीआरओ के ए जौहर ने प्रेस को बुलवा लिया था। तब प्रिंट मीडिया ही हुआ करता था, चैनल और युट्यूबर्स की भीड़ नहीं थी। धर्मेंद्र ने किसी से बातचीत नहीं किया और चले गए थे कहीं जल्दी पहुचने के बहाने के साथ। जाते जाते उनकी नजर मुझपर पड़ी थी, बोले- " कैसी है तुम्हारी मायापुरी? कैसे हैं बजाज साहब? आजकल बम्बई आते हैं कि नहीं?" बजाज साहब से उनका मतलब मायापुरी के मालिक- सबल संपादक स्वर्गीय पी. के. बजाज साहब से था। उनका वह स्नेह से पूछना और एक फिल्म पत्रिका के लिए लगाव किसी और सितारे में हमने महसूस नहीं किया। इसकी एक वजह यह थी कि देओल परिवार से प्रमोद बजाज साहब की व्यक्तिगत बॉन्डिंग थी। जब भी कभी हमने धर्मेंद्र से मुलाकत का समय पाया उनका सवाल 'मायापुरी' को लेकर होता ही था। कोई भी पत्रकार फिल्म पत्रिका लिए जब भी कोई उनके सामने होता था वह पत्रिका के पन्ने पलटकर जरूर देखते थे। हालांकि वह उर्दू में लिखते थे और उनको शैरो-शायरी लिखने का शौक था। उनका कहना था- इन पत्रिकाओं से ही कोई कलाकार अपने फैन्स और चाहने वालों तक पहुंचता है। (Dharmendra interview experience journalists)
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पिछली मुलाकात एक फिल्म की पार्टी में हुई थी। धर्मेंद्र के साथ सब प्रेसवाले फ़ोटो खींचा रहे थे। वह अपने साथ फोटो देने के लिए किसी को मना नहीं करते थे। उसी जमघट में मुझे देखकर बोले - तुम दूर क्यों हो? और मुझे पास बैठाकर, मेरे कंधे पर हाथ रखकर फोटो दिए थे। उस समय भी उन्होंने सवाल मायापुरी को लेकर ही किया था- 'कैसी है मायापुरी, बजाज साहब कैसे हैं, आजकल घर पर तुम्हारी किताब आती नहीं?' उनका तापतर्य मायापुरी के online होने से था। यह जानकर वह बहुत खुश हुए कि ऑनलाइन की दौड़ में भी मायापुरी दूसरी फिल्म पत्रिकाओं से आगे चल रही हैं। "यह बदलाव है, बदलाव रुकता नहीं कभी!"- कहा था धरम जी ने। सचमुच बदलाव रुकता नहीं। बदलाव इतना तेज भाग रहा है कि कब किसके जाने की खबर आजाए, कहा नहीं जा सकता। बदलाव रुकता नहीं, आदमी रुक जाता है। धरम जी का सफर रुक गया और अब बजाज साहब का सफर भी रुक गया है, सदा सदा के लिए। अब सिर्फ यादें हैं। धर्मेंद्र जी के मरने पर मैंने बजाज साहब के मार्फ़त यही संसमरण लिखा था। मेरी फेसबुक पर करीब 1 लाख लोगों ने इसे पढ़ा था।अब बाबूजी नहीं हैं तो मुझे धर्मेंद्र के पूछे जाने वाले वे सवाल याद आरहे हैं - "कैसे हैं बजाज साहब? कैसी है मायापुरी ?" सचमुच आज के दौर में मीडिया और सेलेब्रिटी के संतुलन में हालचाल पूछने का दौर समाप्त हो गया है ! (Dharmendra career anecdotes journalists)
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