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Jab Khuli Kitaab पंकज कपूर और डिम्पल कपाड़िया के शानदार अभिनय से सजी दिल को छू लेने वाली फिल्म..’

सौरभ शुक्ला की इमोशनल फिल्म ‘जब खुली किताब’, जो उनके इसी नाम के नाटक पर आधारित है, अब 6 मार्च से ZEE5 पर स्ट्रीम हो रही है और रिश्तों व मां के दिल की गहरी कहानी दिखाती है।

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  • रेटिंगः तीन स्टार
  • निर्माताः समीर नायर, दीपक सहगल, नरेन कुमार, सौरभ शुक्ला, महेश कोराडे
  • लेखकः सौरभ शुक्ला
  • निर्देशकः सौरभ शुक्ला
  • कलाकारः पंकज कपूर, डिम्पल कपाड़िया, अपारशक्ति खुराना, मानसी पारेख, समीर सोनी, नौहीद साइरुसी, सुनील पलवल, देवयानी रतनपाल
  • अवधिः दो घंटे 21 मिनट
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ओटीटी प्लेटफॉर्म: जी5सच हमेशा कड़वा होता है। सच चाहे तुरंत या पचास साल बाद ही उजागर हो, लेकिन रिश्तों पर गहरा असर डालता है। इसी मूल मुद्दे पर लेखक व निर्देशक सौरभ शुक्ला अति इमोशनल फिल्म ‘जब खुली किताब’ लेकर आए हैं, जो कि उनके द्वारा लिखित व मंचित इसी नाम के नाटक का फिल्मीकरण है। यूं तो इस फिल्म का विश्व प्रीमियर दो साल पहले गोवा के इफ्फी फिल्मोत्सव में हो चुका था। मगर अब छह मार्च से यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘जी5’ पर स्ट्रीम हो रही है। यदि रिश्तों की अहमियत व मां के दिल को समझना हो, तो यह फिल्म देखी जानी चाहिए।

Jab Khuli Kitaab (2024) - IMDb

कहानीः

फिल्म शुरू होती है जब उत्तराखंड के रानीखेत में अनुसूया (डिम्पल कपाड़िया) दो माह से कोमा में हैं और उनके पति गोपाल नौटियाल (पंकज कपूर) उनकी सेवा कर रहे हैं। दो बेटे परम (समीर सोनी), परम की पत्नी फरनाज (नौहीद सिरुसी) और ढोलू (अबुली मामाजी), और दामाद जिग्नेश (सुनील पलवल) तथा बेटी सुजता व उनके बच्चे इकट्ठा हो चुके हैं। क्योंकि डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। लेकिन एक दिन अचानक अनुसूया को होश आ जाता है। होश में आने के बाद अनुसूया अपने पति गोपाल को लंबे समय से छिपा हुआ राज़ बताती है। यह राज़ इतना चौंकाने वाला होता है कि गोपाल अपनी 55 साल की साथी के खिलाफ तलाक की कार्यवाही शुरू कर देता है। जबकि वह परिवार के बाकी सदस्यों को अपने और अनुसूया के इस गहरे राज़ से अनजान रखने की पूरी कोशिश करता है। इसके बाद घर में उथल-पुथल शुरू हो जाती है। बच्चे उलझ जाते हैं। तलाक की प्रक्रिया के दौरान गोपाल वकील आर. के. नेगी (अपारशक्ति खुराना) से मिलता है। उनके ऑफिस में बैठकर होने वाली बातचीत फिल्म के सबसे दिलचस्प हिस्सों में से एक है। यहां गोपाल के कई साल पुराने जख्म खुलते हैं और अनुसूया का सच भी धीरे-धीरे सामने आता है। इसके बाद गोपाल और अनुसूया के जीवन की एक भावपूर्ण और अक्सर हास्यपूर्ण कहानी सामने आती है, जिसमें वे अपने रिश्ते की मुश्किल राहों पर चलते हुए प्यार और साथ रहने का नया अर्थ खोजते हैं। अब इनका तलाक होता है या नहीं.. बच्चे सच पता चलता है या नहीं.. इसके लिए तो फिल्म देखनी ही पड़ेगी।

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रिव्यूः

इंटरवल से पहले फिल्म पंकज कपूर और डिम्पल कपाड़िया की आपसी बातचीत के साथ आगे बढ़ती है। लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म की रफ्तार साफ तौर पर धीमी पड़ जाती है। कुछ भावनात्मक सीन इतने लंबे हैं कि फिल्म स्टेज ड्रामा जैसी महसूस होने लगती है। कई जगह किरदारों की गहराई और उनकी आपसी टकराहट असली नहीं लगती। फिल्म बीच-बीच में बोर भी करती है। कुछ सीन जरूरत से ज्यादा खिंचे गए हैं। लेकिन फिल्म में फिल्मकार ने बिना बनावटी मिठास या ड्रामेबाजी के उम्रदराज रिश्तों की सच्चाइयों का चित्रण करने में सफल रहे हैं। लेकिन भटकती पटकथा के चलते फिल्म अपने शीर्षक के वादे को पूरी तरह से साकार नहीं कर पाती। सौरभ शुक्ला की पटकथा दशकों पुराने विवाह की जटिलताओं, जरूरत से ज्यादा बातें साझा करने के खतरों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच अलगाव की कठिनाइयों को उजागर करने का प्रयास करती है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी यह है कि पटकथा लेखक फिल्म के शुरू होने के पंद्रह मिनट के अंदर ही अपनी लय खो देती है। लेखक व निर्देशक ने गोपाल की अनुसूया के प्रति शत्रुता की जड़ों या अनुसूया के इस कृत्य के कारणों की गहराई में जाने का प्रयास ही नहीं किया। 55 साल के वैवाहिक जीवन के बाद अलगाव के जटिल पहलुओं का चित्रण करने के बजाय यह धीमी गति वाली फिल्म एक सीधी-सादी फिल्म बनकर रह जाती है। फिल्म की रूढ़िवादी सोच में तलाक एक बुरा शब्द बनकर उभरता है, जिसका सार वकील नेगी को अनुसूया की इस सख्त सलाह में मिलता है कि ‘दूसरों के घर तोड़ना बंद करो और अपना घर बनाओ’। इतना ही नहीं कहानी में ढोलू का ट्रैक मूल कहानी से भटकाने का ही काम करता है। बातचीत के आधार पर निरंतर आगे बढ़ने वाली कहानी को पसंद करने वालों को यह फिल्म काफी पसंद आ सकती है। जबकि जेनरेशन जेड को बोर करती नजर आएगी।

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एक्टिंगः

अभिनय जगत में पंकज कपूर का कोई सानी नहीं है। गोपाल नौटियाल के किरदार को पंकज कपूर ने अपने अभिनय से जीवंतता ही प्रदान नहीं की है, बल्कि इस किरदार को पर्दे पर शिद्दत के साथ जिया है। हर दृश्य में अपने किरदार की टूटन, नाराजगी और भ्रम को बहुत ईमानदारी से जीते हैं। उनकी परफॉर्मेंस शांत भी है और अंदर तक चुभने वाली भी। अनुसूया के किरदार में डिम्पल कपाड़िया का अभिनय भी लोगों के दिलों में बस जाता है। अनुसूया के रूप में गरिमा, पछतावा, हिम्मत और नरमी इन चारों भावनाओं को बहुत खूबसूरती से दिखाती हैं। दोनों की केमिस्ट्री रोमांटिक नहीं है। यह बहुत पुरानी, थकी हुई लेकिन गहरी साझेदारी जैसी लगती है, जो इस फिल्म की आत्मा बन जाती है। एक अनाड़ी वकील नेगी के किरदार में अपारशक्ति खुराना कुछ दृश्यों में ध्यान खींचने में सफल रहे हैं। परम के किरदार में समीर सोनी याद रह जाते हैं। नौहीद साइरुसी, सुनील पलवल, देवयानी रतनपाल और मानसी पारेख भी ठीक-ठाक हैं।  

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FAQ

Q1. ‘जब खुली किताब’ फिल्म किस बारे में है?

यह फिल्म रिश्तों की सच्चाई, मां के प्यार और सच सामने आने के बाद परिवार पर पड़ने वाले भावनात्मक असर की कहानी दिखाती है।

Q2. ‘जब खुली किताब’ किसने लिखी और निर्देशित की है?

इस फिल्म को मशहूर अभिनेता, लेखक और निर्देशक सौरभ शुक्ला ने लिखा और निर्देशित किया है।

Q3. ‘जब खुली किताब’ किस नाटक पर आधारित है?

यह फिल्म सौरभ शुक्ला द्वारा लिखे और मंचित किए गए इसी नाम के लोकप्रिय नाटक ‘जब खुली किताब’ का फिल्मी रूपांतरण है।

Q4. ‘जब खुली किताब’ फिल्म कब और कहां रिलीज हुई है?

यह फिल्म 6 मार्च 2026 से OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर स्ट्रीम हो रही है।

Q5. इस फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर कब हुआ था?

फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर करीब दो साल पहले गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) में हुआ था।

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