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Pramod Kumar Bajaj: फिल्मी सितारों को चमक देनेवाला शख्स, जो खुद सादगी में रहा...

यह संस्मरण लगभग 40 साल पहले की उस यादगार मुलाकात को बयान करता है, जब लेखक पहली बार दिल्ली के मायापुरी स्थित एस.एल. प्रकाशन के दफ्तर पहुंचे। फिल्म पत्रकारिता की शुरुआत करने के बाद उन्होंने अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा का इंटरव्यू लिया था

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प्रमोद कुमार बजाजः फिल्मी सितारों को चमक देनेवाला शख्स, जो खुद सादगी में रहा.jpg
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आज से लगभग 40 साल पहले की बात है। यूं तो मैंने स्वतंत्र पत्रकार के रूप में फिल्म पत्रकारिता के क्षेत्र में 1982 से ही काम करना शुरू कर दिया था। लेकिन जनवरी 1986 या 1987 की बात होगी। मैंने मुंबई के चांदिवली स्टूडियो में एक फिल्म के सेट पर अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा का इंटरव्यू किया था। उसके दो दिन बाद ही मेरा दिल्ली में अपने मित्र स्व. रघुनंदन शर्मा के यहां जाना हुआ। उन दिनों मेरे मित्र स्व. रघुनंदन शर्मा ‘दिल्ली बिजली विभाग’ में नौकरी करने के साथ ही एक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘कजरारी’ प्रकाशित किया करते थे। दूसरे दिन मेरे मित्र अपने ऑफिस जा रहे थे। उन दिनों उनकी ड्यूटी ‘मायापुरी’ इलाके में स्थित बिजली विभाग के कार्यालय में थी। अपने मित्र के कहने पर मैं उनके साथ उनके ऑफिस चला गया। मित्र के ऑफिस यानी कि बिजली विभाग के ऑफिस से पहले ही ‘मायापुरी’ के एस.एल. प्रकाशन का ऑफिस था। मेरे मित्र ने बताया कि यहीं से ‘मायापुरी’ फिल्म पत्रिका प्रकाशित होती है। अपने मित्र के ऑफिस पहुंचने के बाद मैंने अपने मित्र से पूछकर ‘मायापुरी’ के ऑफिस पहुंच गया। कंपाउंड में बनी इमारत में चंद सीढ़ियां चढ़कर मैं अंदर पहुंचा और एक कमरानुमा कैबिन में झांका तो वहां पर लंबी टेबल के पीछे तीन लोग अपनी कुर्सी पर बैठे हुए थे। मैंने कहा कि मुझे संपादक जी से मिलना है। किनारे की कुर्सी पर बैठे शख्स ने मुझे बुलाकर बैठने के लिए कहा। फिर उसी ने बातचीत शुरू की। इसी बीच बिना पूछे मेरे लिए चाय व पानी भी आ गया। जब मैंने ‘मायापुरी’ में लिखने की अपनी इच्छा जाहिर की, तो बीच वाली कुर्सी पर बैठे शख्स ने पूछ दिया, ‘कोई इंटरव्यू किया है या कोई लेख लिखकर लाए हो।’ मैंने उनसे कहा कि, ‘मैंने दिल्ली आने से पहले शत्रुघ्न सिन्हा का इंटरव्यू किया है, जिसे अभी तक लिखा नहीं।’ मेरी बात सुनते ही उनके बगल में बैठे तीसरे शख्स ने कहा, ‘अच्छा... शत्रुघ्न सिन्हा से किस बारे में बात की।’ मैंने कुछ चीजें बताईं। उन्होंने कहा कि बहुत अच्छी बात है। फिर बीच वाली कुर्सी पर बैठे शख्स ने कहा कि, ‘ठीक है, लिखकर भेज देना। हम देखेंगे। अच्छा होगा तो छपेगा।’ उसके बाद जब मैं ऑफिस से वापस आना चाहा तब उसने कहा कि, ‘रुकिए, नाश्ता मंगवा रहे हैं, नाश्ता करके जाइएगा।’ फिर इधर-उधर की बातें होती रहीं। इस बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि पहले मुझसे जे. एन. कुमार ने बात शुरू की थी। फिर बीच वाली कुर्सी पर बैठे शख्स प्रमोद कुमार बजाज जी थे और उनके बगल में उनके पिता ए.पी. बजाज जी बैठे हुए थे। उस दिन जब मैं ‘मायापुरी’ के ऑफिस से बाहर निकला तो ऐसा लग रहा था जैसे हम अपने ही एक घर से दूसरे घर की तरफ जा रहे हों।

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मुंबई वापस लौटते ही मैंने शत्रुघ्न सिन्हा का इंटरव्यू लिखकर ‘मायापुरी’ को डाक से भेज दिया। कुछ दिन बाद ‘मायापुरी’ पत्रिका और मानदेय के चेक के साथ मिली। इस अंक में कवर पेज पर शत्रुघ्न सिन्हा का इंटरव्यू छपा हुआ था। तब से ‘मायापुरी’ के साथ मेरा रिश्ता बना हुआ है। यह रिश्ता समय के साथ प्रगाढ़ होता गया। मुझे यह स्वीकार करने में भी कोई हिचक नहीं है कि मेरी बातचीत सदा प्रमोद कुमार बजाज जी से होती रही। पिछले 40 वर्षों के अंतराल में कई पत्रकार ‘मायापुरी’ पत्रिका के संग जुड़े और फिर बाहर हो गए। दिल्ली में उनके ऑफिस में भी लोग आते-जाते रहे, पर मेरे व प्रमोद बजाज जी के बीच कभी कोई दूरी नहीं पैदा हुई। बल्कि स्नेह, प्यार, आत्मीयता का रिश्ता ही रहा। हम तो रात में बारह बजे भी एक-दूसरे से फोन पर बातें कर लिया करते थे।

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आज जब प्रमोद कुमार बजाज जी, जिन्हें ‘मायापुरी’ के दफ्तर व दिल्ली में ज्यादातर लोग ‘बाबूजी’ कहकर बुलाते थे, वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके साथ की यह पहली मुलाकात भुलाई नहीं जा सकती। उस दिन से हमारे संबंध सीधे प्रमोद बजाज जी से बन गए थे। मेरे व उनके बीच पत्रकार व संपादक वाला रिश्ता नहीं रहा, रिश्ता तो केवल अपनापन का ही रहा। हमारे बीच प्रगाढ़ आत्मीय संबंध रहे। जबकि वह दिल्ली और मैं मुंबई में रहता हूं। प्रमोद कुमार बजाज महज पत्रिका के प्रकाशक व संपादक ही नहीं बल्कि एक मृदुभाषी, नेकदिल, अति विनम्र इंसान थे। उन्हें फिल्मी दुनिया की हर छोटी-बड़ी खबर की जानकारी रहती थी।

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वह बॉलीवुड में मशहूर ऐसी हिंदी साप्ताहिक पत्रिका के संपादक रहे, जिन्होंने कभी भी खुद लाइमलाइट में नहीं आए, लेकिन पूरी इंडस्ट्री जिसका सम्मान करती थी, वास्तव में वह आजीवन एक ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाते रहे। एक तरफ उन्होंने अपनी पत्रिका से जुड़े पत्रकारों का साथ दिया, तो दूसरी तरफ उन्होंने निःस्वार्थ भाव से बॉलीवुड के हर छोटे से छोटे कलाकार ही नहीं तकनीशियन की तस्वीरें, उनकी खबरें व उनके इंटरव्यू प्रकाशित कर उन्हें स्टार बनाने में जो भूमिका अदा की, उसके कायल लोगों की कमी नहीं है। यह अलग बात है कि सोशल मीडिया के जमाने में यह सब अब बगलें झांकते नजर आते हैं। प्रमोद कुमार बजाज ऐसे संपादक थे, जिन्होंने कभी भी खुद इंटरव्यू करने या किसी स्टार कलाकार से मिलने के प्रयास नहीं किए, हर बार उन्होंने अपने पत्रकारों को आगे बढ़ाया। उनकी कोशिश हमेशा अपनी पत्रिका से जुड़े पत्रकारों को पहचान दिलाने, उन्हें आगे बढ़ाने में ही रही। यह उनके अहंकार-शून्य व्यक्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है।

हमने पहले ही कहा कि शांत स्वभाव के प्रमोद कुमार बजाज हकीकत में ‘किंग मेकर’ थे। प्रमोद कुमार बजाज के व्यक्तित्व की भव्यता का अंदाजा महज इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह दिल्ली में बैठकर मुंबई की ग्लैमरस इंडस्ट्री पर अपना ऐसा प्रभाव रखते थे कि सितारे खुद उनसे मिलने मुंबई से दिल्ली पहुंचते थे। उनकी विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण है। जी हां! वह दिल्ली में बैठते थे। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में जुड़ा शख्स, फिर चाहे वह नवोदित कलाकार हो अथवा स्टार कलाकार हो अथवा तकनीशियन हो अथवा फिल्म पीआरओ हो, हर कोई उनसे मिलने दिल्ली पहुंचता था। पर प्रमोद कुमार बजाज ने कभी भी खुद को स्टार नहीं समझा। यह दर्शाता है कि उनकी साख कितनी मजबूत थी। व ‘गॉसिप नहीं’, बल्कि ‘विश्वास’ के स्तंभ थे। जब भी कोई सितारा दिल्ली आता, तो बजाज साहब से मिलना उनके शिष्टाचार का हिस्सा होता था। यह उनकी व्यक्तिगत साख और विनम्रता का ही प्रभाव था। तभी तो कोविड से पहले सिर्फ न्यूज पेपर स्टाल ही नहीं बल्कि हर नाई की दुकान तक में ‘मायापुरी’ का अंक मौजूद रहता था। कोविड की वजह से उन्होंने ‘मायापुरी’ डिजिटल अंक निकालना शुरू किया। आज जब बड़े-बड़े प्रकाशन समूह डिजिटल अंक या वेब साइट ठीक से नहीं निकाल पा रहे हैं, तब प्रमोद कुमार बजाज की ही दूरदर्शिता व उनके काम करने की शैली के चलते हर सप्ताह यानी कि शुक्रवार को कम से कम सौ पन्नों का डिजिटल एडिशन बाजार में आता है। ‘मायापुरी’ की अपनी वेब साइट भी है। माना कि पिछले कुछ वर्षों से उनके सुपुत्र अमन बजाज उनके काम में हाथ बंटाते आ रहे हैं, मगर जब तक वह जिंदा रहे, संपादकीय जिम्मेदारी का निर्वाह कुशलता के साथ किया।

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भले ही फिल्म नगरी मुंबई थी और है, लेकिन उसकी ‘नैतिक सत्ता’ दिल्ली में ‘मायापुरी’ पत्रिका के उस दफ्तर में मानी जाती रही है, जहां खुद प्रमोद कुमार बजाज बैठा करते थे। वह दफ्तर फिल्म जगत के लिए किसी ‘तीर्थ’ से कम नहीं था, जहां कलाकार महज मशहूर होने के लिए नहीं, बल्कि मार्गदर्शन और सम्मान पाने पहुंचते थे।

इस वक्त मुझे सन याद नहीं आ रहा है। लेकिन मशहूर फिल्मकार बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित चुनिंदा फिल्मों का एक फिल्म फेस्टिवल ‘बी.आर. स्टूडियो’ में मनाया गया था, जहां बी.आर. चोपड़ा के साथ ही कई स्टार कलाकार भी मौजूद थे। उस दौरान हमारी बी.आर. चोपड़ा कुछ बातचीत उनकी फिल्मों के संदर्भ में हुई थी, जिसे प्रमोद कुमार बजाज जी ने ‘मायापुरी’ के अंक नंबर 1457 में प्रकाशित किया था। यह अंक बी.आर. चोपड़ा के पास पहुंचा। उसके बाद एक दिन मेरे पास कूरियर से एक पत्र आया जिसे बी.आर. चोपड़ा ने खुद लिखा था और उन्होंने पत्र में बड़ी साफगोई के साथ लिखा था जिस प्रकाशन में बी.आर. चोपड़ा ने कभी नौकरी की थी, उसी ने उनके बारे में इतना अच्छा छापा। जब हमने यह बात प्रमोद बजाज जी को बताई तो उन्हें कोई घमंड नहीं हुआ, बल्कि बड़ी विनम्रता से कहा था, ‘‘यह तो चोपड़ा साहब का बड़प्पन है। हम लोग तो इमानदारी से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं।’’

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वह कई विशेष मौकों पर मुंबई भी आते रहे हैं, लेकिन वहां भी वह अपने पत्रकारों को ही आगे रखते थे। ‘मायापुरी’ से जुड़े पत्रकार और फिल्मी हस्तियां ही नहीं अन्य पत्रकार भी उनके मुंबई आने का इंतजार किया करते थे। इससे यह बात उभर कर आती है कि लोगों से उनका रिश्ता ‘प्रोफेशनल’ से ज्यादा ‘इमोशनल’ था। प्रमोद बजाज जी को इंसान की भी बहुत बेहतरीन पहचान थी। एक बार मुंबई में जीटीवी की तरफ से एक फाइव स्टार होटल में बहुत बड़ा समारोह था, जहां पर दिल्ली, चंडीगढ़, भोपाल, लखनऊ सहित देश के कई शहरों से वरिष्ठ पत्रकारों व संपादकों को भी बुलाया गया था। उस दिन दिल्ली से आया हुआ एक पत्रकार मुझसे बड़ा अपनापन दिखा रहा था, इस बात को प्रमोद जी ने समझा और धीरे से मुझे उसके प्रति आगाह करते हुए जो कुछ कहा था, वह बाद में शत-प्रतिशत सच निकला था। मैं जानबूझकर उस पत्रकार का नाम नहीं लेना चाहता। वह कभी किसी का नुकसान करने में यकीन नहीं रखते थे। प्रमोद बजाज जी के संग हमारी कई मुलाकातें, कई यादगार लम्हे हैं, पर सभी को हम यहां समेट नहीं सकते। मेरे सामने स्थिति यही है कि ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’। मैं प्रमोद जी के साथ के अपने भावनात्मक संबंधों पर विस्तार से लिखकर कुछ भी साबित नहीं करना चाहता।

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30 अगस्त 2014 का जिक्र करना तो लाजमी है। इस दिन मुंबई के जुहू इलाके में स्थित ‘इस्कॉन ऑडिटोरियम’ में ‘अश्वमेघ अवार्ड’ का आयोजन था। बॉलीवुड की बड़ी-बड़ी हस्तियां मौजूद थीं। मुकेश खन्ना, सुरेंद्रपाल, गायिका पलक मुच्छल सहित कई बड़ी-बड़ी हस्तियां सम्मानित हुई थीं। उस दिन मुझे भी ‘अश्वमेघ अवार्ड’ से नवाजा गया था और मेरे लिए यादगार बात यह है कि यह अवार्ड मुझे श्री पी.के. बजाज के कर-कमलों से मिला था। इस अवार्ड को देते हुए उन्होंने मुझसे कान में जो कुछ कहा था, वह अति महत्वपूर्ण संदेश था, जिसने मुझे आगे बढ़ने में काफी मदद की।

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पिछले चालीस वर्षों के अंतराल में उनके जीवन के अंतिम एक माह को छोड़कर लगभग हर सप्ताह एक या दो बार हमारी बातचीत हो ही जाती थी। मुझे आज भी याद है कि नौ जनवरी 2026 को शाम पांच बजे हमारी प्रमोद बजाज जी से मोबाइल फोन पर बातचीत हुई थी, तब उन्होंने बताया था कि उनका स्वास्थ्य दो-तीन दिन से कुछ ठीक नहीं है। पर मेरे कुरेदने पर उन्होंने कहा था कि वह पूरी तरह से स्वस्थ हैं। तब हमें अहसास ही नहीं हुआ था कि वह 26 फरवरी को हमसे जुदा हो जाएंगे। संपादक और प्रकाशक श्री पी.के. बजाज जी का निधन फिल्म पत्रकारिता के एक स्वर्ण युग का अंत है। दिल्ली में बैठकर मुंबई की मायानगरी पर दशकों तक अपनी पकड़ बनाए रखना उनकी अद्भुत कार्यक्षमता का प्रमाण था। 1974 में शुरू हुई मायापुरी को श्री ए.पी. बजाज के बाद श्री पी.के. बजाज ने भारत की पहली और सबसे लोकप्रिय हिंदी फिल्म साप्ताहिक पत्रिका बनाया। और जाते-जाते वह वही गुण अपने बेटे अमन बजाज को देकर गए हैं।

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