आखिर रजनीकांत ने अपने लोगों को जंग के लिए तैयार होने का एलान कर ही दिया – अली पीटर जॉन

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वह शाम (19 मई) जब थलाइवा (लीजेंड) रजनीकांत, अपने रोजमर्रा के वेशभूषा (साधारण टी शर्ट, जीन्स, चप्पल) में, अपने आधे गंजे सर को बिना छिपाएं, लहराते मूड की तरह लहराते काले सफेद बालों के साथ, वहां जमा भीड़ को संबोधित करते हुए राजनीति क्षेत्र में खेले जा रहे खेलों को सही दिशा देने की तैयारी के लिये सबको आगाह कर रहे थे और सिर्फ तमिलनाडु में ही नहीं बल्कि देश भर को स्तब्ध करते हुए सब की भौहे तनवा रहे थे तब मैं इस थलाइवा, (जिन्हें मैं पिछले 30 वर्षों से भी ज्यादा समय से जानता हूं ) से कई निम्नलिखित प्रश्न पूछने को प्रेरित हो रहा था –रजनीकांत कौन है?  यह रजनीकांत कहलाये जाने वाले शख्स क्या है? यह रजनीकांत कहलाए जाने वाले शख्स वह सब कैसे कर लेते हैं जो कोई सोच भी नहीं सकता?  कैसे यह हंबल इंसान अपनी हुमिलिटी की पराकाष्ठा के परे जाकर अपने जीवन काल में ही एक लीजेंड बन गए?  क्यों उनके करोड़ों प्रसंशक और उन्हें पूजने वाले लोग उन्हें धरती का ईश्वर मानते हैं? क्यों वे इतने नम्र हैं जबकि वे  सफलता की उच्चतम चोटी से भी ऊपर विराजमान है? क्यों लोग चेन्नई में, उनकी फिल्मों के रिलीज से पहले, उनके पोस्टर और कटआउट चित्रों पर दूध की नदियां बहाते हुए उनका अभिषेक करते हैं? क्यों जापान जैसे दूर-दराज देश के लोग भी उसी श्रद्धा से उनकी पूजा करते हैं जैसे चेन्नई या भारत के कई भागों में लोग उन्हें पूजते हैं? क्यों वे हर विवरण से ऊपर के स्टार बन गए? क्यों ईश्वर, कोल्हापुर के इस शिवाजीराव गायकवाड़ नामक इंसान के प्रति इतने मेहरबान हो गए, जो इंसान चेन्नई में जाकर पहले एक बस कंडक्टर बने फिर उसी चेन्नई में भगवान बन गए? यह सारे प्रश्न मेरे मन में उभरने लगते हैं जब-जब मैं रजनीकांत के बारे में सोचता हूं, जिन्हें मैं एक साधारण इंसान के रूप में जानता हूं, लेकिन जिन्हें मैं विश्व रचयिता द्वारा रचित एक अद्भुत रचना के रूप में भी पहचानता हूं। मैं अपने इन सारे प्रश्नों के उत्तर का इंतजार करते हुए यादों की उन गलियों में गोते लगाता रहता हूं, जहां उनसे मेरी कई मुलाकात हुई थी। पहली बार मेरी मुलाकात रजनीकांत से षणमुखानंदन हॉल में हुई थी। तब वे आज की तरह एक थलाईवा (लीजेंड) नहीं बने थे लेकिन फिर भी बतौर स्टार वे सफलता पा चुके थे और उस दिन उदयमान सिंगर एस पी बालासुब्रमण्यम के साथ आये थे। सौभाग्य से मैं उनके बगल की उस सीट पर बैठा था जो दरअसल मेरे एक दोस्त की सीट थी जो उस दिन उस उत्सव में आ नहीं पाए थे। उस अवॉर्ड उत्सव को शुरू हुए अभी बीस मिनट भी नहीं हुए थे कि मैंने उन दोनों को कुछ बेचैन होते हुए महसूस किया। रजनीकांत ने मेरी तरफ देखा और पूछा ‘आसपास कहीं अच्छी देसी दारु मिल सकती है?’  मैं तो इन चीजों का पूर्व खिलाड़ी रह चुका था इसलिए उन्हें बताया कि यहां से पाँच मिनट की दूरी पर स्थित धारावी में कोशिश कर लीजिए। यह सुनते ही दोनों वहां उपस्थित गणमान्य लोगों से यह बहाना बना कर निकल गए कि उन्हें किंग सर्कल में किसी खास दोस्त से मिलने जाना है और आधे घंटे में लौट आएंगे। जब वे लौटे तो उन्होंने मुझे दिल खोलकर धन्यवाद दिया और रजनीकांत ने अपने स्टाइल से मुझे कहा, ‘‘मजा आ गया ब्रदर मैं आपको सदा याद रखूंगा।’’ उस दिन उस भरी-पूरी भीड़ में सिर्फ मैं ही जानता था कि वे देसी दारु चढ़ाके आए हैं और पकड़े ना जाने के फिराक में वे स्टेज पर भाषण देने से भी बचते रहे।

जब रजनीकांत ने अपनी पहली फिल्म साइन की तो उस दिन वे सन एंड सैन होटल में ठहरे हुए थे। उन्होंने अपने मेजबान से कहा कि वह मुझे ढूंढ कर उसी शाम होटल में निमंत्रित करें। बस उसी होटल की राह में रजनीकांत ने मुझे उनके कोल्हापुर के जीवन के बारे में सब कुछ बताया, जब उनका नाम था शिवाजीराव गायकवाड और कैसे एक दिन बिना टिकट एक अनजाने सफर पर ट्रेन में बैठ गए थे और उन्हें पता भी नहीं था कि जिस स्टेशन में वे उतरे वो मद्रास सेंट्रल स्टेशन था जहां से उनका जीवन संघर्ष शुरू हुआ। वे मुझे उस शाम, शराब पीते हुए सब कुछ बताते गए कि कैसे वे स्टेशन के आसपास उद्देश्यहीन घूमते हुए जो भी मिलता था, सबको अपने अभिनेता होने की हुनर दिखाना शुरू कर देते थे। रजनीकांत ने यह भी बताया कि अभिनय के नाम पर वे उन दिनों के प्रसिद्ध विलन शत्रुघन सिन्हा की अदाओं की सिर्फ नकल करते थे। पेट पालने के लिए रजनीकांत ने वहां बस कंडक्टर की नौकरी भी कर ली थी और खाली वक्त में वे नुक्कड़ नाटक और तमिल थियेटर में काम भी करने लगे थे। इस तरह धीरे-धीरे वे आम लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगे। उन्हीं दिनों सुप्रसिद्ध निर्देशक, के बालाचंदर (जो कि कमल हासन श्रीदेवी, जया प्रदा जैसे नए-नए फ्रेश प्रतिभाओं की खोज करने के लिए जाने जाते हैं), उन्होंने एक दिन रजनीकांत को एक्टिंग करते हुए देख लिया और अपनी फिल्म के लिए कास्ट करने की ठान ली। वह अवसर रजनीकांत की शुरुआत थी और यह नाम (रजनीकांत) भी, के बालाचंद्रन ने ही उन्हें दिया था। धीरे-धीरे रजनीकांत थलाइवा यानी लीजेंड बनते चले गए और मैंने सोचा वे मुझे भूल गए होंगे। भला तमिलनाडु के थलाइवा द्वारा मुझे याद रखे जाने का कोई कारण भी तो मेरे पास नहीं था। एक बार मैं मद्रास में, एक शूटिंग कवर करने गया था और ताज होटल में ठहरा था। एक सुबह एक फोन कॉल आया, उधर से आवाज आई ‘‘हाय अली, हमारे शहर में आकर हमको फोन नहीं करता है? हमको भूल गया है क्या? आज शाम को 5.00 बजे तैयार रहना मैं आता हूं। तुमको हमारा शहर दिखायेगा।’’ भला ऐसे निमंत्रण को मैं इंकार कैसे कर सकता था। मैं 5.00 बजे तैयार हो गया और तभी फिरसे उनका फोन आया, उन्होंने कहा, ‘‘नीचे आ जा मैं खड़ा हूं।’’ मैं किसी पॉश कार की कल्पना करते हुए नीचे उतर आया, लेकिन वहां तो एक पुरानी जर्जर फिएट कार खड़ी हॉर्न बजा रही थी और खुद रजनीकांत ड्राइवर सीट पर था। मैं उनकी बगल में जाकर बैठ गया तो वे बोले, ‘‘बोलो किधर जाने का है?’’ मैंने उन्हें बताया कि मुझे मद्रास के बारे में कुछ पता नहीं, तब वे बोले, ‘‘चलो तुमको माउंट रोड दिखाता हूं।’’ मैं उन्हें ड्राइविंग के दौरान डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था लेकिन वे मुझ से मेरे जीवन और स्क्रीन वीकली में मेरे काम के बारे में पूछते रहे। थोड़ी ही देर में हम माउंट रोड पहुंच गए जो मद्रास का दिल माना जाता है। वहां फ्लोरा फाउंटेन (आज जो हुतात्मा चौक है) से भी ज्यादा भीड़ थी। सब ठीक चल रहा था कि अचानक एक युवा भिखारी, रजनीकांत की झलक देखते ही चिल्ला पड़ा, ‘थलाइवा, थलाइवा।’ और तुरंत ही पूरी ट्रैफिक जाम हो गई। मैं उस अपार भीड़ को देख डरते हुए पूछ बैठा, ‘‘अब क्या होगा?’’ उन्होंने मेरी तरफ एक नजर देखते हुए कहा, ‘‘वरी नहीं करने का।’’ और अपना हाथ भीड़ की तरफ लहराते हुए फिएट कार के शीशे बंद कर लिए। उनके उस इशारे पर कुछ ही मिनटों में ट्रैफिक खत्म हो गई। मैंने उनसे कहा कि मैं किसी रेस्तरां में बैठकर उनसे बातें करना ज्यादा पसंद करूंगा। वे बोले, ‘‘चलो तुम्हें चोला होटल ले जाते हैं।’’ वे मुझे चोला होटल ले गए और ‘बार’ के एक खास कोने में हम बैठे। वहां के एक सीनियर वेटर ने मुझे बताया कि यह रजनीकांत का पसंदीदा पीने का कोना है। जहां वे रोज शाम 7.00 बजे से पीने बैठ जाते हैं और तब तक पीते हैं जब तक कि उनकी पत्नी लता, वहाँ आकर उन्हें घर नहीं ले जाती है। लता एक पत्रकार थी और एक बार रजनीकांत का इंटरव्यू लेने आयी थी, उसी दौरान दोनों में प्यार हो गया और फिर एक सादे समारोह में दोनों ने शादी कर ली थी। उस शाम भी उनकी पत्नी लता वहाँ आयी तो रजनीकांत ने उनसे कहा कि वे मुझे ताज होटल सावधानी से छोड़कर वापस आए। उनके पीने की लत की बातों के साथ मुझे याद आ रहा है वह प्रेस कॉन्फ्रेंस, जो मद्रास (उस वक्त मद्रास का नाम चेन्नई नहीं पड़ा था) में आयोजित ‘इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ के दौरान रखी गई थी, जो उन्होंने संबोधित किया था। उस दौरान यूके की एक महिला पत्रकार ने उनसे पूछा था, ‘‘मिस्टर रजनीकांत, आप अपने अगले दिन की शूटिंग की तैयारी कैसे करते हैं?’’ तब रजनीकांत ने हंसते हुए जवाब दिया था, ‘‘क्या तैयारी मैडम? सुबह उठता हूं, शूटिंग के लिए जाता हूं, दिन भर काम करता हूं, लौटते हुए चोला होटल जाता हूं, वहां जी भर कर पीता हूं, फिर घर लौटकर अच्छा खासा डिनर करता हूं और गुड नाइट करके सो जाता हूं, अगले दिन फिर शूटिंग के लिए उठता हूं। तैयारी वैयारी की फुर्सत कहां मिलती है?’’ रजनीकांत हमेशा दिल खोलकर बोलने के लिए मशहूर रहे हैं। एक बार मेरी पत्रिका द्वारा स्पॉन्सर की गई एक उत्सव में मुझे देव आनंद के साथ मद्रास जाना पड़ा, देव साहब (मैं और पूरी इंडस्ट्री, देव आनन्द को देव साहब कहकर ही पुकारते थे) ने यह पुख्ता इंतजाम कर रखा था कि मेरा कमरा उनके कमरे के बगल में हो। तमिल फिल्म इंडस्ट्री के बड़े बड़े सितारों में, देव साहब के दर्शन के लिए होड़ लगी हुई थी। देव साहब ने मुझ पर यह फैसला करने की जिम्मेदारी छोड़ रखी थी कि मैं किसको मिलने की इजाजत दूँ और किसको नहीं। सबसे पहले कमल हासन की तरफ से मिलने का रिक्वेस्ट आया और देव साहब ने अपनी स्टाइल से मुझे कहा, ‘‘उन्हें अंदर आने दो। वह महान एक्टर है, मैं भी उनसे मिलना पसंद करुंगा।’’ उस दिन दोनों देर तक मिले और एक साथ काम करने का फैसला भी कर लिया। अगले दिन दर्शनार्थी रजनीकांत थे, जिन्हें मैं देव आनंद को बताए बिना ही मिलाने ले गया, वे उसी तरह के कपड़ों में आये थे जिसमें मैं उनसे हमेशा मिलता था। अपनी फिएट कार लेकर वे ताज होटल पहुंचे और लगभग दौड़ते हुए सीढ़ियां चढ़कर मेरे कमरे में आए। मैंने उन्हें सीधे देव साहब के सामने पेश करके देव साहब को भी अचम्भे में डाल दिया। रजनीकांत उनके चरणों के पास बैठ गए, वे कुर्सी पर बैठने के लिए तैयार ही नहीं हुए। उस पहली मुलाकात में रजनीकांत, लीजेंडरी देव साहब को अपने सामने बैठे पाकर कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। देव साहब ने जब उन्हें बताया कि उनके लिए किस तरह एक पब्लिक रिसेप्शन रखा जा रहा है तब भी रजनी खामोश रहे। शाम को पूरा ग्राउंड खचाखच पब्लिक से भर गया, लोग दूर-दूर से देवानंद को देखने आए। रजनीकांत भी उसी फिएट में वहां पहुंचे फिर दौड़ते हुए स्टेज पर चढ़ गए और देव आनंद के चरणों में लेट गए। जब वे उठे तो भीड़ को देव आनंद के महान एक्टर होने की कहानी बताने लगे। सारे लोग आश्चर्य में पड़ गए कि उनके लिए जो खुद एक भगवान है वह कैसे किसी दूसरे भगवान (वह भी हिंदी फिल्मों के) के चरणों में गिर सकते हैं? लेकिन रजनी के भाषण और भावनाओं ने सब को खामोश कर दिया।

मैं रजनी की प्रत्येक हिंदी फिल्म की शूटिंग में जाता रहा जैसे ‘गिरफ्तार’, ‘हम’।  वे अमिताभ बच्चन के फैन भी थे और उन्हें ‘गुरु’, ‘सर’, ‘साहब’ कहकर संबोधित करते थे। उनकी दोस्ती मजबूत होकर पारिवारिक संबंधों में बदल गई। दोनों एक दूसरे के पारिवारिक उत्सवों में शरीक होते रहे। अमिताभ जिस तरह हमेशा रजनीकांत की प्रत्येक फिल्म के मुहूर्त, रिलीज, में मुख्य अतिथि बने वैसे ही रजनीकांत भी अमिताभ के फिल्म मुहूर्त, रिलीज के दौरान चीफ गेस्ट रहे।

पिछली बार संगीत निर्देशक इलयाराजा के, बतौर कंपोजर, एक हजार फिल्में पूरी करने पर, (अमिताभ की फिल्म ‘शमिताभ’ उनकी तब तक की अंतिम फिल्म थी) उन्हें सम्मानित करने के लिए अमिताभ ने एक भव्य उत्सव का आयोजन किया। उस उत्सव में कमल हासन, श्रीदेवी तथा फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी हर छोटी बड़ी हस्ती उपस्थित हुए थे। सभी लोग फॉर्मल पोशाक में आए थे लेकिन रजनी तो रजनी थे, उनके कपड़े असाधारण थे, उन्होंने बेहतरीन शर्ट, अपने बेहतरीन ट्राउजर में इन करके पहना था, बालों को डाई किया था, लेदर के शूज डाले थे। उस वक्त तक वे एक लीजेंड के रूप में पूरी तरह छा चुके थे। मैंने सोचा इतने वर्षों के अंतराल में वे मुझे पहचान नहीं पाएंगे, मैं भीड़ से अपने को बचाकर बाहर निकल रहा था कि अचानक मुझे एक आवाज सुनाई पड़ी, ‘हाय, अली’ मैं हैरानी से देखता रह गया कि यह तो वही रजनीकांत है जो बीस वर्ष पहले मुझे षण्मुखानंदन हॉल में मिला था। वे जरा भी नहीं बदले थे। रजनीकांत जैसे लोग कभी किसी को भूलते नहीं, वे कभी बदलते नहीं, लेकिन यह तीखी, गंदी राजनीति की दुनिया कहीं उन्हें बदल तो नहीं देगी??? यही देखने के इंतजार में मैं हूं, जब भी ऑफिशियली पॉलिटिक्स की दुनिया में वे प्रवेश करेंगे और तमिलनाडु की राजनीति की दुनिया में फैली गंदगी की शुद्धि करने के युद्ध में उतरेंगे और शायद अन्य राजनेताओं को भी सही रास्ता दिखाएंगे, यदि भारत को बचाना है तो।

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रजनी का पॉलिटिक्स के साथ जो हल्का-फुल्का नाता

रजनी कभी पॉलिटिक्स से जुड़ने के पक्ष में नहीं थे, वे कभी किसी पॉलिटिशियन के करीब भी नहीं थे। एक ऐसा भी समय था जब  जयललिता, चेन्नई के पॉश एरिया स्थित ‘पोएस गार्डन’ में उनकी पड़ोसी थी। उन दिनों जय ललिता अपने मेंटर, एम जी रामाचंद्रन के मृत्यु पश्चात, पावर में आकर चीफ मिनिस्टर बन चुकी थी। कहानी कुछ ऐसी है कि एक रात रजनी अपने घर लौटते हुए, नशे की हालत में कुछ बड़बड़ा रहे थे, जिसे अम्मा ने सुन लिया और उसे गंभीरता से लेते हुए इशु बना दिया। उस वक्त तो रजनी ने कुछ नहीं कहा लेकिन मन ही मन पक्का किया की अम्मा को सबक सिखा कर रहेंगे। वे पहले डीएमके के साथ जुड़ी एक पार्टी का खुलकर समर्थन करने लगे फिर वे विदेश यात्रा को निकल पड़े और वहाँ से अपने दो हजार से भी ज्यादा फैन क्लब्स तथा उन सबको जो उन्हें भगवान की तरह पूजते थे, से यह कहलवा भेजा कि हर हालत में वे सब मिलकर, आने वाले ‘इलेक्शन टू द असेंबली’ में अम्मा को जरूर हरा दें। रजनीकांत के शब्द, लोगों के लिए कमांड तो था ही, इसी वजह से अम्मा को ना सिर्फ करारी हार मिली बल्कि उन्हें पूरे टर्म के लिए अपोजीशन में बैठना पड़ा।

 आज जब रजनीकांत राजनीति में अपनी शक्ति से कदम रखने को तैयार लग रहे हैं तो क्या अब भी उनके शब्दों में उतनी ही ताकत होगी???


Mayapuri