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रेटिंग: दो स्टार
निर्माता: फरहान अख्तर, रितेश सिद्धवानी, शफत काजी और दानिश रेंजू
बैनर: एक्सेल इंटरटेनमेंट, एप्पल टी पिक्चर्स प्रोडक्शंस, रेंजू फिल्म प्रोडक्शंस
लेखक: दानिश रेंजू, निरंजन अय्यंगार और सुनयना काचरू
निर्देशक: दानिश रेंजू
कलाकार: सबा आजाद, सोनी राजदान, जैन खान दुर्रानी, शीबा चड्ढा, तारुक रैना, चित्तरंजन त्रिपाठी, बशीर लोन, और लिलेट दुबे
अवधि: लगभग दो घंटे ओटीटी: अमेजन प्राइम, 29 अगस्त से स्ट्रीमिंग
मुस्लिम समाज में हमेशा से लड़कियों/महिलाओं पर कई तरह की बंदिशें लादी जाती रही हैं. बुरखा ओढ़ने से लेकर उनके नाच-गाने और संगीत से जुड़ने पर भी पाबंदी रही है. कम से कम कश्मीर में तो संगीत या गायन के क्षेत्र में एक महिला/लड़की पर सख्त पाबंदी रही है. लेकिन भला कला कब किसी तरह की बंदिश में रह सकती है (Songs of Paradise movie review). हर कलाकार की कला धर्म, जाति, पंथ और लिंग की सीमाओं से ऊपर उठकर सिर्फ इंसानियत और भावनाओं की जुबान बोलती है. उसकी कला को समाज की बेड़ियां जकड़ नहीं सकतीं. दूसरे शब्दों में कहें तो एक कलाकार को कैद किया जा सकता है लेकिन उसकी कला को नहीं. तभी तो आज से लगभग साठ साल पहले राज बेगम ने सारी बेड़ियों को तोड़ते हुए कश्मीर की पहली महिला गायक बनी थी (songs of Paradise box office), जिन्होंने कश्मीर रेडियो पर गाने वाली पहली महिला गायक का खिताब अपने नाम किया था (Songs of Paradise OTT review) . उन्हें पद्मश्री से लेकर संगीत नाटक अकादमी सहित कई अवार्ड मिले. पर यह भी सच है कि कट्टरपंथियों ने उनके सामने कई चुनौतियां पेश की और उन सभी चुनौतियों का मुकाबला करते हुए राज बेगम लगातार अपनी गायकी से सभी का दिल जीतती रहीं. यहां तक कि उनके स्वरबद्ध एल्बम और कई किताबों को आग के हवाले कर दिया गया. पर कला कहां मिटने वाली (Songs of Paradise review Kashmir biopic). तो उसी राज बेगम के जीवन और कृतित्व पर दानिश रेंजू फिल्म ‘सांग्स ऑफ पैराडाइज’ लेकर आए हैं, जो कि 29 अगस्त से ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन पर स्ट्रीम हो रही है.
दो हजार से अधिक गीत गाने वाली कश्मीर की पहली महिला गायिका राज बेगम ने घाटी से आने वाली दूसरी महिला संगीत कलाकारों के लिए भी राह बनाई. उनकी कला को पहले तो लोगों ने पहचाना नहीं (Songs of Paradise box office prediction), फिर मान्यता देने में भी देरी की, उसके बाद किसी ने उनके संगीत को संजोने की भी कोशिश नहीं की. हालांकि उनके गीत ना सिर्फ कश्मीरियों के बल्कि पूरे भारतवर्ष के दिलों में हमेशा के लिए अमर हो गए (Songs of Paradise review and reaction).
कहानीः
फिल्म की कहानी शुरू होती है मौजूदा वक्त की रेडियो कश्मीर की सबसे वरिष्ठ गायिका नूर बेगम (सोनी राजदान) से. जिन्होंने वर्षों से अपने सुरों से कश्मीरी गीतों को देशभर में पहचान दिला दी है. उनका एक रुतबा है. सभी लोग उनकी काफी इज्जत करते हैं, लेकिन आज भी वह अपने जैसे कई कलाकारों के हक और अधिकारों के लिए लड़ती रहीं हैं. नूर बेगम रेडियो कश्मीर पर गाने वाली पहली महिला गायिका बनीं लेकिन ये सफर उन्होंने हजार मुश्किलों को पार करने के बाद तय किया (Songs of Paradise musical drama review). संगीत में पीएचडी कर रहा मुंबई का एक युवक रूमी (तारुक रैना), जो कि नूर बेगम का बहुत बड़ा फैन है, वह नूर बेगम की अनसुनी कहानी को सुनाना चाहता है. इसलिए नूर बेगम का इंटरव्यू करना चाहता है. पहले नूर बेगम मना कर देती हैं, पर फिर रूमी के संगीत को सुनकर नूर बेगम इंटरव्यू देने को तैयार होती हैं.
नूर बेगम की कहानी आजाद भारत में 1954 से शुरू होती है. कश्मीर में एक दर्जी की साधारण सी लड़की जेबा अख्तर सपने तो देखती है, मगर उन्हें पूरा करने की उसे अनुमति नहीं है. उसकी मोजी उसे बार-बार याद दिलाती रहती हैं कि वह एक लड़की है, जिसे शादी करके अपने शौहर के घर जाना है.
जेबा अपनी अम्मी-अब्बू की इकलौती बेटी है और संगीत में उसकी रुचि भी है. पर जेबा को ना तो म्यूजिक सुनने की इजाजत है और ना ही गाने की. पर जेबा के अब्बू (बशीर लोन) के सबसे करीब हैं. कपड़े सिलने वाले जेबा के अब्बू अपनी बेटी की कला और प्रतिभा को पहचानते हैं. अम्मी दिन भर जेबा और अब्बू को ताने मारती रहती हैं. अम्मी यानी कि मोजी (शीबा चड्ढा) अपनी बेटी जेबा को सिलाई-बुनाई और खाना बनाना सिखाना चाहती हैं. वह चाहती हैं कि बेटी को शादी के बाद कोई ताने ना सुनने पड़ें. जेबा उस पिछड़े समाज में पली-बढ़ी है जहां लोग इसी सोच को लेकर चलते हैं कि औरतें धरती पर सिर्फ शादी करने आती हैं. लेकिन जेबा कुछ पैसे कमाने के लिए संगीत सिखाने वाले उस्ताद गुलाम नबी उर्फ मास्टरजी (शिशिर शर्मा) के यहां बर्तन उठाने और घर के छोटे-मोटे काम करने के लिए जाती है. उसी दौरान जब वह मास्टरजी को गाते हुए सुनती है तो मानो संगीत उसकी रूह को छू जाता है. एक दिन अचानक जेबा की सहेलियां उसे गाने के लिए कहती हैं और उसी वक्त उस्ताद गुलाम नबी जेबा की आवाज सुन लेते हैं. उस्ताद पहचान जाते हैं कि यह लड़की खास है.
वह जेबा को गाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. उसका नाम रेडियो कश्मीर के सिंगिंग मुकाबले में भी दर्ज करवा देते हैं. जेबा परेशान है कि वह कैसे अम्मी से छुपकर मुकाबले में हिस्सा लेगी और गाना गाएगी. उस्ताद जेबा के काम करने के घंटे बढ़ा देते हैं ताकि वह काम भी कर ले और गाने का रियाज भी. उस्ताद जबरन जेबा को रेडियो प्रतियोगिता में हिस्सा लेने ले जाते हैं, जहां एकमात्र जेबा लड़की है, बाकी सभी लड़के हैं. और ना ही इससे पहले किसी महिला ने कभी मुकाबले में हिस्सा लिया. मुकाबले के दौरान जब जेबा का नाम मंच से अनाउंस होता है तो उसके उस्ताद के अलावा एक भी शख्स उसके लिए तालियां नहीं बजाता. जेबा जब मुकाबले में गाना शुरू करती है तो उस्ताद को छोड़कर वहां मौजूद हर एक शख्स उसकी आवाज को सुनकर हैरान रह जाता है. किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि एक लड़की इतना अच्छा गा सकती है. जेबा को गाते हुए सुनकर शायरी लिखने वाले आजाद (जैन खान दुर्रानी) उससे प्रभावित हो जाते हैं. उन्हें हमेशा अपने परिवार से आजादी मिली है अपनी जिंदगी में वह सब कुछ हासिल करने की, जो वह करना चाहते हैं. जेबा मुकाबला जीत जाती हैं और उन्हें कैश प्राइज के साथ-साथ उसे रेडियो कश्मीर के लिए गाने का मौका भी मिल जाता है. अब जेबा शर्त रखती है कि रेडियो पर उसका नाम नूर बेगम होना चाहिए, जेबा नहीं. जिससे उसकी मां के सामने उसकी पहचान छिपी रहे. हालांकि समाज से जेबा की लड़ाई कभी रुकती नहीं, वह अब भी अपने हक के लिए हाथ-पैर मार रही है. उसके जूनियर्स को उससे ज्यादा पैसे मिल रहे हैं यह देखकर वो सीधा रेडियो कश्मीर के प्रमुख के पास पहुंच जाती है और कहती है कि उसे जब तक बराबर के पैसे नहीं मिलेंगे उसे गाने का प्रोत्साहन नहीं मिलेगा.
आजाद को डरी-सहमी हुई जेबा से कब प्यार हो जाता है पता ही नहीं चलता. फिर अचानक जेबा की जिंदगी में तूफान आ जाता है जब एक पुरस्कार समारोह के बाद उसकी फोटो आजाद साहब के साथ अखबार में छप जाती है. आजाद अपनी मौसी (लिलेट दुबे) के साथ जेबा के अब्बू और अम्मी के पास उसका हाथ मांगने पहुंच जाते हैं. दोनों का निकाह हो जाता है. लेकिन जेबा और आजाद की मुसीबतें कम होने के बजाय बढ़ती हैं. दोनों हर चुनौती का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं.
रिव्यूः
फिल्म की गति काफी धीमी है. जेबा के नूर बेगम बनने की कहानी को फिल्मकार ने बड़ी खूबसूरती से उकेरा है, मगर जिस तरह के इमोशंस उभरकर परदे पर नजर आने चाहिए थे, उनका घोर अभाव है. महिला पर पाबंदी और महिलाओं को संगीत से दूर रखने की पीड़ा का भी सही ढंग से चित्रण नहीं हुआ. इस संवेदनशील मुद्दे को फिल्मकार न्यायोचित तरीके से परदे पर नहीं ला सके. फिल्मकार ने सब्जेक्ट तो बहुत उम्दा उठाया, पर उसके साथ न्याय करने में वह पूरी तरह से विफल रहे. कहानी बहुत जल्दी-जल्दी आगे बढ़ती रहती है और भावनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं. इसके अलावा हर 2-3 मिनट में कोई ना कोई कश्मीरी गाना भी फिल्म में सुनने को मिल जाता है जो कि फिल्म की पहचान है लेकिन बार-बार एक ही गाना सुनने से कहीं ना कहीं थोड़ी बोरियत आ सकती है. लेकिन फिल्मकार ने संगीत पर जिस तरह से बारीकी से ध्यान दिया है, उसके लिए वह बधाई के पात्र हैं. यूं तो फिल्मकार ने आजाद भारत, खासकर कश्मीर के मुस्लिम समाज की उस हकीकत को सामने लाने का साहस दिखाया है, जो कि हमारे देश की हकीकत है. कश्मीर को जिस तरह से परदे पर लाना चाहिए था, उस तरह से नहीं ला पाए.
एक्टिंगः
मासूम और डरी-सहमी सी रहने वाली कर्ण प्रिय आवाज की मालकिन जेबा के किरदार में सबा आजाद न्याय करने में सफल रही हैं. जेबा के किरदार में सबा आजाद की संवेदनशीलता का कोई जवाब नहीं. जबकि जेबा उर्फ नूर बेगम के किरदार में सोनी राजदान ने साबित कर दिया कि अभिनय में उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता. सोनी राजदान ने अपने अभिनय का पूरा अनुभव फिल्म में झोंक दिया है. सबसे बड़ी चुनौती जो इन अभिनेत्रियों के सामने थी वो थी कश्मीरी एक्सेंट को अपनाने की, जिसके लिए इनकी तारीफ जरूर करनी चाहिए. नूर बेगम के किरदार में सोनी राजदान पचास के दशक की महिला नजर आती हैं. जेबा की अम्मी के रोल में शीबा चड्ढा नजर आ रही हैं, वहीं आजाद साहब का रोल जैन खान दुर्रानी ने निभाया है. एक्टिंग के मामले में फिल्म में कहीं पर भी कोई खामी नजर नहीं आती. हर एक किरदार अपने-अपने प्लॉट के हिसाब से पूरी तरह खरा उतरता है. फिल्म में तारुक रैना और लिलेट दुबे भी नजर आ रहे हैं. संगीतकार भान के छोटे किरदार में ललित पारिमू अपनी छाप छोड़ जाते हैं. अन्य कलाकार अपनी-अपनी जगह पर ठीक हैं.
FAQ About Songs of Paradise
सॉन्ग्स ऑफ़ पैराडाइज़ कहाँ और कब रिलीज़ हुई? (Where and when did Songs of Paradise release?)
फ़िल्म का प्रीमियर अमेज़न प्राइम वीडियो पर 29 अगस्त, 2025 को हुआ, जिसने दुनिया भर के घरों तक अपनी संगीतमय श्रद्धांजलि पहुँचाई.
सॉन्ग्स ऑफ़ पैराडाइज़ को लेकर आलोचकों की क्या प्रतिक्रिया है? (How are critics responding to Songs of Paradise?)
समीक्षाएँ मिली-जुली हैं. कोईमोई ने कहानी को मज़बूत बताया, लेकिन इसके क्रियान्वयन और कलाकारों की आलोचना की. इंडियन एक्सप्रेस ने सबा आज़ाद की "ताकत और कमज़ोरी" की सराहना की, जबकि एनडीटीवी ने फ़िल्म के आकर्षण के रूप में अभिनय और संगीत की प्रशंसा की.
समीक्षकों ने सबा आज़ाद के अभिनय में क्या ख़ास बात उजागर की? (What standout did reviewers highlight about Saba Azad’s performance?)
इंडियन एक्सप्रेस ने कहा कि उनका अभिनय "ऐसा लगता है मानो वह उस दौर (1950 के दशक) का हो सकता है", जिसमें उनके हाव-भाव और वेशभूषा में उस दौर की प्रामाणिकता झलकती है.
सॉन्ग्स ऑफ़ पैराडाइज़ को दृश्य और संगीत की दृष्टि से क्या विशिष्ट बनाता है? (What makes Songs of Paradise visually and musically distinctive?)
एनडीटीवी ने इसके "पुरानी यादों और संयमित स्मृति" की प्रशंसा की, लोक-आधारित संगीत, कश्मीर के भावपूर्ण दृश्यों और दिल को छू लेने वाली लेकिन कोमल धुनों को रेखांकित किया जो कहानी को आगे बढ़ाने के लिए नाटकीयता पर निर्भर नहीं हैं.
क्या सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइज़ सिनेमाघरों में उपलब्ध है या केवल ओटीटी पर? (Is Songs of Paradise available in theatres or only OTT?)
यह फिल्म सीधे ओटीटी पर रिलीज़ होगी और 29 अगस्त, 2025 से विशेष रूप से अमेज़न प्राइम वीडियो पर उपलब्ध होगी.
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Tags : Songs of Paradise Released on Prime Video | Songs of Paradise Trailer | Soni Razdan and Saba Azad film Songs of Paradise